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इतिहास बदल रहा है, अलेप्पो की आज़ादी और राजनीतिक धरातल पर उसका असर

नीरज श्रीवास्तव | Updated on: 20 December 2016, 8:21 IST
QUICK PILL
  • अलेप्पो की आज़ादी के बाद राष्ट्रपति बशर अल असद ने कहा है कि इससे न केवल सीरिया के हालात बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय हालात भी अलग होंगे. 
  • उन्होंने यह भी कहा है कि यह इतिहास जो बनाया गया है, वह बधाई के शब्दों से कहीं अधिक बड़ा है. उन्होंने इसे सोवियत संघ के विघटन के बाद की सबसे बड़ी घटना करार दिया है.

सीरियाई सेना ने 15 दिसम्बर को पूर्वी अलेप्पो पर नियंत्रण करने के साथ ही आतंकियों के कब्जे से अलेप्पो को आज़ाद करा लिया है. यहां ज्यादातर आतंकवादी जिहादी संगठनों जैसे अल कायदा से सम्बद्ध नुसरा फ्रंट से जुड़े हुए थे. 

अलेप्पो को मुक्त कराने के बाद राष्ट्रपति बशर-असल-असद ने एक महत्वपूर्ण बयान जारी किया. उन्होंने सोवियत संघ के विघटन के बाद इसे इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक बताया है. उन्होंने कहा कि इतिहास (अलेप्पो को विद्रोहियों के कब्जे से मुक्त कराने के बाद ) पहले जैसा और बाद में भी वैसा नहीं रहेगा... मैं सोचता हूं कि अलेप्पो के लिबरेशन के बाद न केवल सीरिया के हालात बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय हालात अलग होंगे. यह इतिहास जो बनाया गया है, वह बधाई के शब्दों से कहीं अधिक बड़ा है.

यहां यह समझना उपयोगी होगा कि राष्ट्रपति असद के बयान का क्या असर होगा. यह जानना ज्यादा अर्थपूर्ण है बजाए इसके कि जो सीरिया में पिछले 25 सालों से जारी संघर्ष के इतिहास को नहीं जानते, और पिछले 25 सालों में संसार में क्या-क्या घटनाएं हो चुकी हैं.

इतिहास से सबक

अलेप्पो का लिबरेशन वैश्विक भू-राजनीति का “इनफ्लैक्शन प्वाइंट” है. 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद से जो चीजें शुरू हुईं थीं, वह रुकी हैं और रुझानों पर विपरीत असर पड़ा है. सोविय़त संघ के विघटन के बाद से संसार के सत्ता संतुलन में अचानक खालीपन आ गया था जिसके चलते कई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हुईं जिसमें बड़े पैमाने पर लोगों की जानें गईं और कई देशों में विध्वंसक घटनाएं हुईं.

कोई भी देश अमरीका, यूनाइटेड किंगडम, यूरोपीय संघ और खाड़ी देशों को रोकने में समर्थ नहीं था. ये देश वही करते थे, जो वे चाहते थे. संयुक्त राष्ट्र ने अपने को सीमित कर लिया था और वह सिर्फ मूक-दर्शक हो गया था.

अनेक विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी है कि मिखाइल गोर्वाचोव पूर्वी बर्लिन से अपने पांच लाख से ज्यादा सोवियत बलों को वापस बुलाने पर सहमत हो गए थे. इस आधार पर कि अमरीका ने 1990 में जो प्रतिबद्धता (उत्तरी अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन-नाटो का पूर्व की तरफ विस्तार नहीं किया जाएगा) जताई थी, उस पर स्पष्ट समझ हो.

इस सबके बाद भी मार्च 1991 में वारसा संधि को समाप्त कर दिया गया, नाटो के अस्तित्व को बनाए रखने का औचित्य क्या था?

लेकिन अमरीका अपनी प्रतिबद्धता को बनाए नहीं रख सका. हालांकि, रणनीतिकार जार्ज केनन ने बिल क्लिंटन को चेतावनी दी थी कि वे नाटो का विस्तार न करें. लेकिन तत्कालीन नए कंजरवेटिवों ने अमरीका के नीति-निर्धारण में अपना प्रभाव दिखाना करना शुरू कर दिया था.   

नाटो के पूर्व सुप्रीम कमांडर जनरल वेस्ले क्लार्क ने तत्कालीन अंडर सेक्रेटरी डिफेन्स पॉल वोल्फोवित्ज को यह कहते हुए उद्धृत किया है कि अमरीका को चाहिए कि वह पुराने सोवियत से जुड़े रहे सीरिया, ईरान और इराक का सफाया कर दे ताकि ये देश हमें चुनौती देने के लिए अगला सुपर पावर न बन सकें. पॉल वोल्फोवित्ज ने यह बात 1991 में कही थी.

वैश्विक प्रभुत्व

नाटो का विस्तार अमरीका के आधिपत्य को यूरोप तक बढ़ाने की ओर पहला कदम था. अंततोगत्वा इसका मकसद वैश्विक प्रभुता कायम करना था.  नाटो की एक नई भूमिका तय की गई कि वह -अपने सदस्य देशों के बाहर- उन देशों को नष्ट कर दे जो अमरीका की राह में खड़े हों. नाटो पूरे संसार के लिए आतंक उत्पन्न करने वाला एक हथियार बन गया.

नाटो का पहला अवैध इस्तेमाल यूगोस्लाविया में 1999 में बमबारी के लिए किया गया. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा इसके लिए अनुमति नहीं दी गई थी. रूस भी इसे रोक पाने में काफी कमजोर था.

इसके बाद तो अमरीका और उसके सहयोगी देशों ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा. नाटो राष्ट्रों को विध्वंस करने का एक या अन्य कारणों से उनका हथियार बन गया.

तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बुश जूनियर (जार्ज बुश) ने 1972 की एंटी-बैलेस्टिक संधि को वर्ष 2002 में एकतरफा खत्म कर दिया. यह अमरीका के एकाधिकारवाद की घोषणा थी जो उनके व्यवहार का हॉलमार्क बन गया.

यह रूस और बाकी संसार के लिए सुस्पष्ट संकेत था कि अमरीका ने अपने वैश्विक एकाधिकारवाद का बिगुल बजा दिया है और उस यात्रा पर निकल पड़ा है.

इसी के बाद उसने 2003 में इराक पर धावा बोला कि उसके पास भारी विध्वंसक हथिय़ार (डब्ल्यूएमजी) है. निश्चित रूप से यह झूठा दावा था. बाद में इराक के पास कोई भारी विध्वंसक हथियार नहीं मिले.

इराक पर धावा बोलने का अमरीका का वास्तविक उद्देश्य तेल कुओं पर कब्जा करने का था और इजराइल का उद्देश्य इराक और सीरिया जैसे बड़े अरब/इस्लामिक राज्यों को खत्म करने का था.

बड़ा गेम प्लान

वर्ष 1982 में ग्रेटर इजराइल बनाने के लिए एक मास्टर प्लान बनाया गया जिसे -ओडेड यीनोन प्लान पॉर ग्रेटर इजराइल- कहा जाता है. यह मध्य-पूर्व उत्तरी अफ्रीका में इजराइल की रणनीति का ब्लूप्रिन्ट है. अक्टूबर 2007 में जनरल वेस्ले क्लार्क ने अपने एक भाषण में खुलासा किया था कि पेंटागन ने वर्ष 2001 में पांच सालों में सात देशों पर हमला करने और उन्हें नष्ट करने का खाका खींचा था. उन्होंने कहा था कि इन देशों की सूची इराक से शुरू होती थी और इसमें सीरिया, लेबनान, लीबिया, सोमालिय़ास सूडान और ईरान शामिल थे.  

क्लार्क झांसा नहीं दे रहे

लीबिया पर नाटो द्वारा सात माह तक बमबारी की गई. यह बमबारी 19 मार्च 2011 से शुरू होकर 20 अक्टूबर तक हुई. लीबिया के शासक मुअम्मर अल गद्दाफी के ठिकानों पर नए हमले किए गए थे. इसमें एक ऑपरेशन में गद्दाफी मारे गए थे.

अमरीका, यूके और फ्रांस ने 17 मार्च 2011 को संरा. सुरक्षा परिषद को धोखा देकर एक प्रस्ताव पारित करने के लिए दबाव बनाया कि वह लीबिया को 'नो फ्लाई जोन' घोषित करे. यह झूठा आरोप लगाया गया था कि मुअम्मर गद्दाफी की सेनाओं ने नागरिकों की बड़े पैमाने पर हत्याएं की हैं. इस बमबारी में गद्दाफी समेत कई हजार निर्दोष नागरिक मारे गए थे.

ये युद्ध अपराध थे और मानवता के खिलाफ अपराध थे, जो पहले इराक में और बाद में सीरिया में किए गए.

शांति, क्षमा और क्या?

जब 2011 की शुरुआत में -अरब बसंत- की रोशनी में सीरिया में शांतिपूर्ण प्रदर्शन चल रहे थे, तब कुछ देशों ने इसे असद शासन को खत्म करने के अवसर के रूप में देखा. 2001 की शुरुआत में भी ऐसा ही प्रयास किया गया था. इसमें इजराइल, अमरीका, यूके, फ्रांस, टर्की, सऊदी अरब और कतर थे. उन्होंने भाड़े के सैनिकों के रूप में सीरिया में घुसपैठ की थी. उनमें से अधिकांश आतंकी और जिहादी संगठनों जैसे अल कायदा से जुड़े हुए थे.

 ये विदेशी लड़ाके, जिन्हें टर्की और जॉर्डन में प्रशिक्षित किया गया था और शस्त्र दिए गए थे, वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों में घुलमिल गए और उन्होंने सीरिया के सुरक्षा बलों पर फायरिंग कर दी जो भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे. जब उन्होंने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की, कुछ नागरिक इस क्रासफायरिंग की चपेट में आ गए और मारे गए.

पश्चिमी देश और उसके सहयोगी देश इन घटनाओं में कूद गए और आरोप लगाया कि सीरियाई शासन में 'जानबूझकर अपने ही लोगों की हत्याएं' की जा रही हैं. इन देशों की मांग थी कि राष्ट्रपति असद पद छोड़ें.

टर्की और जॉर्डन ने शिविर उपलब्ध कराए जहां भाड़े के सैनिकों को प्रशिक्षित किया गया, सऊदी और कतर के लोगों ने आपरेशन्स के लिए फंडिंग की, हथियारों की खरीद के लिए भुगतान किया. अमरीका, यूके और उनके पश्चिमी सहयोगी देशों ने उन्हें राजनीतिक संरक्षण दिया.

एक लम्बी सड़क

लीबिया में शासन बदलाव में सात माह लगे. पश्चिमी देशों ने सोचा कि ऐसा ही सीरिया में भी किया जा सकता है. यहां उनका आंकलन गलत साबित हुआ.

सीरिया, लीबिया नहीं था. सीरिया की सेना पांच साल तक वीरता के साथ लड़ी, लेकिन 4,00,000 लोग मारे गए, लाखों लोग बेघर हो गए. पूर्वी अलेप्पो को जिहादी संगठनों जैसे कि नुसरा फ्रंट ने जुलाई 2012 में अपने कब्जे में कर लिया.

रूस सितम्बर 2015 में सीरिया के आमंत्रण पर सीरिय़ा के युद्ध में कूदा. यह वह वक्त था जब देश के ज्यादातर हिस्से पर आतंककारी कब्जा करते जा रहे थे.

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और लेबनान के हिजबुल्ला भी जिहादियों से लड़ने के लिए सीरिया की सेना में शामिल हो गए. रूसी वायु सेना ने आतंककिरयों के ज्यादा ठिकाने नष्ट कर दिए. टर्की से आने वाली आपूर्ति लाइन ठप कर दी और आईएसआईए/दाएश के तेल स्मगलिंग नेटवर्क का विध्वंस कर दिया.

रूस के दखल के बाद से अलेप्पो को मुक्त कराने में एक साल से ज्यादा का वक्त लगा और अलेप्पो 15 दिसम्बर 2016 को मुक्त करा लिया गया.

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद से यह पहली दफा है जब पश्चिम और उसके सहयोगी देशों की स्पष्ट सैन्य पराजय हुई है. यह एक अन्य संकेत भी है कि रूस एक बड़ी वैश्विक शक्ति में फिर उभर रहा है.

इन सब कारणों से अलेप्पो का महत्व सीरिया से बढ़कर है. राष्ट्रपति के कथन का सीधा मतलब यही है-कि “इतिहास पहले जैसा नहीं है और बाद में भी वैसा (अलेप्पो की आज़ादी) नहीं रहेगा”.

First published: 20 December 2016, 8:21 IST
 
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