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27 दिसंबर और एचएमएस बीगल: एक ऐतिहासिक यात्रा का वाहक

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 December 2015, 8:41 IST
QUICK PILL
  • चार्ल्स डार्विन की करीब पांच सालों की लंबी समुद्री यात्रा\r\n जिस एचएमएस बीगल जहाज में पूरी हुई उसका प्रारंभ आज ही के दिन यानी 27 दिसंबर 1831 को हुआ था. जीव प्रजातियों के प्राकृतिक चयन का महान सिद्धांत चार्ल्स डार्विन की इसी पांच वर्ष की तपस्या का फल था.
  • कम ही लोगों को पता है कि बीगल का निर्माण खोजी अभियानों के लिए नहीं हुआ था. बीगल \r\nनौसेना का युद्धपोत हुआ करता था जिसमें 120 सैनिकों के बैठने की व्यवस्था थी.
  • डार्विन\r\n की यात्रा के दौरान इसमें चालक दल समेत 66 लोग सवार थे. ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी ने उन्हें इस यात्रा के लिए जरूरी संसाधन और वित्तीय सुविधा मुहैया करवायी थी.

एचएमएस बीगल वह ऐतिहासिक जहाज था जिस पर महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने 1831 से 1836 के बीच पांच सालों का लंबा समय बिताया था. चार्ल्स डार्विन की यात्रा के दौरान गैलापगॉस द्वीप और ग्रेट बैरियर रीफ बीगल का ठिकाना बना.

बीगल के लंबे सफर के दौरान डार्विन ने बड़ी संख्या में जानवरों और पौधों की प्रजाति को देखा और यही आगे चलकर उनके नेचुरल सिलेक्शन सिद्धांत का आधार बना. चार्ल्स डार्विन के उत्पत्ति के सिद्धांत ने पूरी दुनिया में जीव अध्ययन को एक नया वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया.

बीगल की खोजी यात्रा तीन चरण में पूरी हुई. पहली यात्रा 1826 से 1830 के बीच दक्षिण अमेरिका की थी और इस दौरान जहाज की कमान कैप्टन कमांडर प्रिंजल स्टोक्स के हाथों में थी. हालांकि उन्होंने डिप्रेशन की वजह से खुद को गोली मार लिया. बाद में रॉबर्ट फिजोरी ने उनकी जगह ली. उन्हें दक्षिण अमेरिका की दूसरी यात्रा और फिर बीगल की दुनिया की लंबी यात्रा का कमान मिला.

फिजोरी ने चार्ल्स डार्विन को अपने साथ आने का न्यौता दिया और फिर बीगल पांच सालों तक समुंदर में रहा. यह दुनिया की महानतम खोजी यात्रा थी. हालांकि इस पूरी यात्रा के दौरान डार्विन कई तरह की बीमारियों से घिर गए थे.

बीगल की तीसरी यात्रा ऑस्ट्रेलिया के सर्वेक्षण से जुड़ी थी और इसके बाद यह जहाज कोस्ट गार्ड का निगरानी जहाज बन गया. 1870 तक यह समंदर में तैरता रहा. इसके बाद इस ऐतिहासिक जहाज को कबाड़ घोषित कर नष्ट कर दिया गया.

पोर्ट कनेक्शन

एचएमएस बीगल का निर्माण खोज यात्राओं के लिए नहीं किया गया था. बल्कि इसका निर्माण बंदरगाहों से बंदूक ढोने के लिए किया गया था. यह जहाज ब्रिटिश रॉयल नेवी के बेड़े का हिस्सा था और इसका नाम कॉफिन ब्रिग्स रखा गया था क्योंकि एचएमएस बीगल जिस जहाजी बेड़े का हिस्सा था उसमें 107 जहाज थे. उनमें से 26 समुंदर में लापता हो गए थे.

1820 में वूलिच डॉकयार्ड में बीगल का निर्माण किया गया था. जॉर्ज चतुर्थ के सम्मान समारोह में 1820 में इसे लंदन ब्रिज के नीचे से गुजरने का गौरव भी हासिल हुआ. इस शानदार शुरुआत के बाद बीगल बाद के पांच सालों तक गुमनामी के अंधेरे में पड़ा रहा.

आंकड़ों में बीगल

लंबाई: 27.5 मीटर (90 फीट 4 इंच)

चौड़ाई: 7.5 मीटर (24 फीट 6 इंच)

वजन: 235 टन

गहराई: 3.8 मीटर (12 फीट 6 इंच)

बीगल शुरुआत में दो लंगरों वाला जहाज था, बाद में इसमें एक और लंगर जोड़ दिया गया. खोजी जहाज बनाने के दौरान बीगल में तीसरा लंगर जोड़ा गया. युद्धपोत के तौर पर इसमें 10 बंदूकें लगी हुई थीं जिसे बाद में घटाकर छह कर दिया गया.

बीगल को एक खोजी अभियान वाला जहाज बनाने में पहली बार 5,913 पॉन्ड का खर्चा आया था. युद्ध पोत के तौर पर इसमें 120 लोगों के बैठने की क्षमता थी. हालांकि डार्विन की पूरी यात्रा के दौरान इसमें 66 लोग मौजूद थे.

एचएमएस बीगल की जीवन यात्रा

1820

एचएमएस बीगल को 11 मई को वुलविच डॉकयार्ड में बनाया गया था. जुलाई में इसने नौसैनिक समीक्षा में हिस्सा लिया.

1825

बीगल को खोजी जहाज में तब्दील कर दिया गया.

1826-30

22 मई को प्लाईमाउथ से पहली खोजी यात्रा पर निकला. 15 दिसंबर 1828 को कैप्टन स्टोक्स की मौत के बाद रॉबर्ट फिजोरी इसके कमांडर बने.

1831-36

दूसरी खोजी यात्रा के दौरान यह टिएरा दे फूगो की यात्रा पर निकला. इसी यात्रा पर डार्विन भी साथ थे.

1837-43बीगल की तीसरी यात्रा ऑस्ट्रेलिया के सर्वेक्षण को लेकर थी और इसकी कमान जॉन विखम के हाथ में थी. विखम के बीमार पड़ने के बाद 1840 में इसकी कमान जॉन लॉर्ट स्टोक्स के हाथ में चली गई.

1845

बीगल को कॉस्ट गार्ड सर्विस के हवाले कर दिया गया और फिर यह आखिरी समय तक निगरानी जहाज ही बना रहा.

1870

बीगल को कबाड़ में बेच दिया गया.

2003

समुद्री विशेषज्ञों ने बीगल के अवशेषों को खोज निकालने का दावा किया.

First published: 27 December 2015, 8:41 IST
 
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