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भारत-जापानः वाजपेयी-मोरी के सपनों को पूरा करेंगे मोदी-अबे?

श्रबनी राय चौधरी | Updated on: 12 December 2015, 19:54 IST
QUICK PILL
  • लंबे समय से भारत और जापान के रिश्ते महज अनुदान के लेन-देन तक सीमित रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी संबंधों को बेहतर करने की पहल.
  • नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से दोनों देशों के बीच आपसी संबंधों में मजबूती आई है. आर्थिक और रणनीतिक कारणों से दोनों देश एक दूसरे के करीब आ रहे हैं.

भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय रिश्ते नई ऊंचाई पर हैं. हाल ही में भारत ने जापान के सम्राट का स्वागत किया और प्रधानमंत्री शिंजो अबे को 2014 के गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनाया गया. अबे एक बार फिर से इस हफ्ते भारत के दौरे पर आ रहे हैं. 

ये भारत और जापान के बीच बढ़ते और मजबूत होते रिश्तों के संकेत हैं. इससे पहले भारत और जापान के रिश्ते महज अनुदान लेने और देने तक सीमित रहे हैं.

नई साझेदारी की शुरुआत


21वीं सदी की शुरुआत में भारत और जापान के रिश्तों में बड़ा बदलाव आया जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री योशिरो मोरी ने जापान-भारत ग्लोबल पार्टनरशिप एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किया. दोनों देशों के बीच शुरुआत आर्थिक सहयोग को लेकर हुई थी और आज इसमें रणनीतिक आयाम भी जुड़ चुका है. 

भारत और जापान के बीच का रिश्ता आर्थिक और रणनीतिक पाए पर टिका हुआ है

इसे 2014 में इंडिया जापान स्पेशल स्ट्रैटेजिक ग्लोबल पार्टनरशिप दस्तावेज में साफ-साफ देखा जा सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में टोक्यो दौरे के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था. इसके पीछे घरेलू और विदेशी दोनों वजहें रहीं. 

भारत के लिए फायदा


भारत सरकार 8 फीसदी से अधिक की विकास दर के लिए प्रतिबद्ध है. इस आर्थिक वृद्धि दर को हासिल करने के लिए भारत को एक साथ कई मोर्चे पर काम करना है जिसमें पूंजी, तकनीक से लेकर कौशल विकास तक शामिल है.

सरकार इस वृद्धि दर को हासिल करने के लिए मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, विदेशी पूंजी निवेश की सीमा बढ़ाया जाने और डिफेंस मशीनरी जैसे सेक्टर में विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति देने का फैसला कर चुकी है. इन सभी फैसलों की मदद से सरकार आर्थिक वृद्धि दर को तेज करना चाहती है.

वाजपेयी और मोरी के अहम समझौतों पर दस्तखत करने के बाद भारत-जापान संबंधों में आई उछाल

दूसरी तरफ जापान के पास जबरदस्त पूंजी है जिस पर उसे घरेलू तौर पर बेहद कम रिटर्न मिलता है. जापान अपनी तकनीक के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. चाहे वह स्मार्ट सिटी बनाने का मामला हो या फिर हाई स्पीड ट्रेन का मामला या फिर ईंधन बचाने वाली ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी.

जापान दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर, दिल्ली मेट्रो और चेन्नई-बेंगलुरू कॉरिडोर में निवेश के माध्यम से दोनों देशों के बीच के रिश्तों को मजबूती देता रहा है. 

जापान ने मानव संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से अपने को कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से इकनॉमी का पावरहाउस बनाया है. मेक इन इंडिया के तहत जापान भारत के मानव संसाधन को टूल डिजाइन और उसके रख-रखाव और फाइव एस के फॉर्मूले को अमली जामा पहनाने में अहम भूमिका निभा सकता है.

जापान को फायदा


भारत का औद्योगिक विकास विदेशी पूंजी निवेश पर निर्भर करता है और इस मामले में जापान की भूमिका बहुत बड़ी है. ऑटोमोबाइल और ऑटो उपकरण को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा क्योंकि जापान इस क्षेत्र में अग्रणी रहा है. हाल ही में जापान ने फॉर्मास्यूटिकल्स, अक्षय ऊर्जा और हेल्थ डायग्नॉस्टिक में प्रवेश किया है.

जापान की कंपनियों का भारत में दिलचस्पी लेने के दो आयाम है. पहला तो यह कि भारत में उपभोक्तावाद का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. इसकी वजह न केवल आय में बढ़ोतरी है बल्कि भारत की आबादी में हर साल युवाओं की तादाद का शामिल होना भी है. 

यही वजह है कि दोनों देशों के बीच के संबंध और अधिक मजबूत होते जा रहे हैं. एक सर्वे में 89 फीसदी जापानी कंपनियों ने इस बात को स्वीकार किया कि भारत में निवेश बढ़ाने के पीछे यह उनका प्रमुख कारण है. 

दूसरा जापान के निवेश के लिए भारत की आर्थिक और रणनीतिक पोजिशनिंग है. पारंपरिक तौर पर जापान ऑटोमोबाइल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स की असेंबलिंग का काम दक्षिण-पूर्व एशिया में करता रहा है. भारत सस्ते प्रशिक्षित मजदूरों और मध्य-पूर्व एवं अफ्रीका से करीब होने की वजह से जापान के लिए बेहद अहम है. चीनी अर्थव्यवस्था में आई मंदी ने भी भारत में जापान के निवेश को प्रोत्साहित किया है. 

अंग्रेजी भाषी कामगारों की भारी संख्या की वजह से भी कई जापानी कंपनियां भारत में अपने शोध और विकास केंद्र बना रही हैं

रणनीतिक कारण


द्विपक्षीय रिश्तों के आर्थिक पहलू ने दोनों देशों को फायदा पहुंचाया है और इसी वजह से 2011 में समग्र आर्थिक भागीदारी समझौता भी हुआ. आंकड़ों के आधार पर देखा जाए तो भारत में जापानी कंपनियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है. वहीं दूसरी तरफ भारत और जापान के बीच हर साल होने वाली प्रधानमंत्री स्तर की बातचीत की वजह से एशियाई देश भारत पर ध्यान दे रहे हैं.

चीन के उभार को क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर सख्त रुख माना जाता है. इस वजह से एशिया के छोटे देश क्षेत्रीय संतुलन के लिए भारत और जापान के रिश्तों को अहमियत दे रहे हैं

अबे ने 2007 में भारत और जापान के रिश्तों को सागर का मिलन कहा था. उन्होंने हिंद और प्रशांत महासागर के मिलने का जिक्र करते हुए इसका उल्लेख किया था. उन्होंने कहा था कि जापान और भारत एशिया के हितों की रक्षा के लिए दो बड़े अहम बिंदु हैं.

फिलहाल जापान चीन, उत्तरी कोरिया और रूस के साथ क्षेत्रीय विवाद में उलझा हुआ है. उत्तरी कोरिया के न्यूक्लियर एजेंडे की वजह से जापान के साथ उसके रिश्ते सहज नहीं है. संयुक्त राष्ट्र के मामले में दखल नहीं देने का जिक्र किए जाने के बाद जापान इस मामले में अपने को अलग-थलग महसूस कर रहा है.

इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रुख ने भी जापान को सक्रिय विदेश और रक्षा नीति की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया है.

पाकिस्तान और श्रीलंका में चीन की मदद से बनने वाले बंदरगाह भी भारत के लिए रणनीतिक चिंता का मुद्दा है

हिंद महासागर में समुद्री डकैती ने भी भारत और जापान के द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूती दी है और यही वजह है कि दोनों देशों ने संयुक्त सैन्य अभ्यास करना शुरू किया है. पाकिस्तान और श्रीलंका में बंदरगाह बनाने में चीन की मदद भारत के लिए चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि इससे भारत के ईद गिर्द 'समुद्री घेरा' बनाने की चीन की नीति को मजबूती मिलेगी. चीन के आक्रामक रवैये की वजह से एबे ने 2007 में जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका को मिलाकर 'क्वाड्रिलैटरल डायमंड' का विचार सामने रखा था.

हालांकि इस पहल को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका क्योंकि इसे चीन के  विरोध के तौर पर देखा गया. हालांकि अबे के 2012 के कार्यकाल से जापान अमेरिका-भारत और जापान एवं अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया त्रिकोणीय सीमरकण बनाने और उसे मजबूत करने की दिशा में काम करता रहा है.

रिश्तों को बढ़ावा


जापान में हाल में ही हुए कुछ घटनाक्रम भारत और जापान के बीच और अधिक गहरे संबंध को प्रोत्साहित करते हैं.

सैन्य उपकरण: अबे की सरकार ने कुछ निश्चित शर्तों के साथ मिलिट्री इक्विपमेंट के एक्सपोर्ट को मंजूरी दी है. इसके अलावा आर्टिकल 9 की मौजूदा व्याख्या को बदलकर उसे 'राइट टू सेल्फ डिफेंस' के बदले 'राइट टू कलेक्टिव सेल्फ-डिफेंस' कर दिया गया है.' इस व्याख्या ने एबे को भारत के डिफेंस सेक्टर में बड़ी भूमिका अदा करने की छूट दे दी है जो कि जापान के हित में है क्योंकि भारत रक्षा उपकरणों का बड़ा आयातक है.

  • परमाणु ऊर्जा: भारत और जापान के बीच हुई असैन्य परमाणु संधि को लेकर दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच चर्चा हुई. आखिरी संयुक्त बयान में इस समझौते को जल्द से जल्द अमली जामा पहनाने का फैसला किया गया. हालांकि फुकुशिमा आपदा के बाद घरेलू स्तर पर विरोध को देखते हुए इस डील को पूरा करने में देरी हो सकती है.
  • रेलवे: भारतीय रेल विस्तार की योजना पर काम कर रही है. जापान की तकनीकी विशेषज्ञता को देखते हुए इस क्षेत्र में मजबूत भागीदारी की संभावना है.
  • पर्यावरण: सीओपी-21 की विफलता को देखते हुए इस बात की उम्मीद है कि मोदी और एबे इस मामले पर विचार करेंगे. बेहतर पर्यावरणीय स्थिति हासिल करने में भारत जापान की मदद लेगा. 

अबे को फिलहाल मंदी का सामना करना पड़ रहा है और उनकी एबेनॉमिक्स अभी तक अपना असर दिखाने में विफल रही है. जापान को इससे बाहर निकालने के लिए  उन्हें प्रॉडक्ट और कैपिटल के मामले में बाजारों की जरूरत होगी. भारत का आर्थिक माहौल फिलहाल आकर्षक बना हुआ है.

दोनों देशों के लिए रणनीतिक रूप से चीन बड़ी चुनौती है. एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखना उनके लिए बेहद जरूरी है. एबे और मोदी आपसी रिश्तों को मजबूत करने के एजेंडे से मिलेंग. उनका निजी संबंध इसे और भी मजबूत बनाएगा.

First published: 12 December 2015, 19:54 IST
 
श्रबनी राय चौधरी @catchhindi

भारत और जापान के कारोबारी रिश्तों की विशेषज्ञ. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर ईस्ट एशियन स्टडी के जापानी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर.

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