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पाकिस्तान: कानून को समझना होगा कि पीड़ित कंदील बलोच है उसका भाई नहीं

दुर्गा एम सेनगुप्ता | Updated on: 19 July 2016, 7:45 IST

भारत उसे पाकिस्तान की पूनम पांडे के नाम से जानता था, एक विवादास्पद माॅडल जिसके बिग बाॅस में भी आने की चर्चा थी. पाकिस्तान के लिए वह एक म्युजिक वीडियो में डांस करने वाली और एक धार्मिक गुरू के साथ सेल्फी लेने वाली लड़की थी. ज्यादातर लोगों ने उसकी इन हरकतों को अपनी तरह से आंका लेकिन कंदील बलोच ने कभी किसी की परवाह नहीं की और अपने ढंग से अपनी जिंदगी जी.

कंदील के इसी निडर रवैये से डर कर शायद उसके भाई ने उसकी जान ले ली. अपनी हत्या से तीन सप्ताह पहले बलोच ने मदद की गुहार लगाई थी. पाकिस्तान के दैनिक पत्र डाॅन के अनुसार, 'कंदील ने संघीय जांच एजेंसी (एफआईए) के आंतरिक मंत्री और महानिदेशक को पत्र लिख कर सुरक्षा की मांग की थी.'

अगर यह हत्या सुर्खियों में रहने वाली कंदील बलोच की न हो कर किसी आम लड़की की होती तो यह पाकिस्तान के लिए आॅनर किलिंग का बस एक और मामला होता. इसमें कोई अचरज नहीं. ‘आॅनर किलिंग’ की आड़ में की गई यह हत्या असलियत में एक सितारे की हत्या है.

असल समस्या यह है

बलोच एक बेबाक पब्लिक फिगर थी जो अक्सर पुरूष प्रधान समाज के खिलाफ आवाज उठाती थी, और इस बात पर शिकायत करती थी कि समाज उन पर किस तरह से पाबंदी लगाना चाहता है. पाकिस्तान में हर साल करीब 1000 महिलाएं आॅनर किलिंग का शिकार हो अपनी जान गंवाती हैं. उनके लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं है.

इसलिए कंदील बलोच की हत्या पर भी अगर पाकिस्तान के लोग आॅनर किलिंग कानून पर चुप्पी साध लेते हैं तो यह बहुत गलत होगा. कानून को उसके भाई को अपराधी मानना ही होगा न कि ऐसा भाई जिसने सही-गलत औऱ समाज की परवाह करते हुए अपनी बहन का कत्ल कर दिया.

पाकिस्तान की बेटियां

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 में ऐसी ही परिस्थितियों में मारी गई औरतों की संख्या 1096 थीं और ये केवल वे आंकड़े हैं, जो सामने आए हैं, यह अधिक भी हो सकते हैं.

वर्ष 2014 में 1000 औरतें मारी गईं और 2013 में 869. वर्ष 2012 में यह संख्या 432 थी और 2011 में 705. पोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2015 में हुई ज्यादातर हत्याओं का कारण घरेलू विवाद थे, जैसे अवैध संबंध, मनपसंद शादी करने की मांग आदि.

वर्ष 2015 मेें पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सीनेटर रही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सदस्य सईदा सुघरा इमाम ने आॅनर किलिंग के खिलाफ एक विधेयक लाने की कोशिश की थी, परन्तु आज तक यह विधेयक पास नहीं हुआ. जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम जैसे रूढ़िवादी समूह की वजह से यह विधेयक अटका पड़ा है. सरकार को आशंका है कि यह विधेयक पास करना इस्लाम के खिलाफ होगा, इसलिए इसकी समीक्षा करनी जरूरी है.

सीनेटर सुघरा इमाम ने कहा, इस विधेयक का उद्देश्य पाकिस्तान आचार संहिता 1860, आपराधिक प्रक्रिया संहिता-1898 और कानून-ए-शहादत-1984 में संशोधन करना है ताकि दोषियों को सजा दिलवा कर पीड़ितों को न्याय दिलाया जा सके.

विधेयक की जरूरत क्यों?

पाकिस्तान के कानून में हत्या को अपराध माना गया है. परन्तु अगर हत्या मृतक के ही किसी निकट संबंधी द्वारा उसकी भलाई के लिए, परिवार के हित में या गैरत के नाम पर की गई है तो अदालत उसे माफ कर सकती है. इस प्रकार अपराध की इस गणित के चलते अपराधी मुआवजे की राशि ले-देकर ‘समझौता’ कर लेते हैं.

दूसरा, अगर अपराधी यह साबित कर दे कि उसने परेशान हो कर अचानक उकसावे में आकर यह अपराध किया तो भी अदालत उसे बरी कर सकती है.

पाकिस्तान में आॅनर किलिंग का दस्तावेज

शार्मीन ओबैद की पुरस्कृत डॉक्युमेंट्री ‘ए गर्ल इन द रिवर’, माफ करने की कीमत, एक बेटी सबा की कहानी है जिसे उसके पिता और चाचा ने इसलिए पानी में डुबा दिया क्योंकि उसने अपने प्रेमी से शादी की थी. परन्तु किसी तरह सबा की जान बच गई. वह घिसटते हुए झील से बाहर आ गई. उसके चेहरे और हाथ पर गोलियों के घाव थे, फिर भी वह पास के गैस स्टेशन तक पहुंच गई.

वह अपनी जिंदगी बचने के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करती है और कसम खाती है कि वह अल्लाह से बोले गए झूठ के लिए अपने परिवार को कभी माफ नहीं करेगी क्योंकि उन्होंने कुरान की कसम खाई थी कि वे उसे कभी नुकसान नहीं पहुंचाएंगे और वह दुआ करती है कि उनका बाकी समय जेल में ही कटे.

डॉक्युमेंट्री के अंत मेे सबा पर दबाव डला जाता है कि वह अदालत में अपने पिता और चाचा को माफ कर दे. चौबीस घंटे के अंदर दोनों जेल से छूट गए.

सबा के एक वकील असद जमाल ने कहा, समुदाय के पुरूष सदस्य ही दोनों पक्षों में सुलह करवाते हैं और यह अधिकतर पीड़ित के खिलाफ ही होता है.

जमाल सबा के पड़ोसियों से पूछता है कि आपको परिवार की इज्जत की चिंता है, एक लड़की के अधिकारों की नहीं? इस पर एक बुजुर्ग आदमी जवाब देता है जमीन और इज्जत दो ही बड़े मसले हैं.

फिल्म के अंत में सबा कहती है- 'भले ही मैंने उन्हें अदालत में माफ कर दिया हो लेकिन दिल से कभी माफ नहीं किया.'

अल्लाह ने मुझे उनकी गोलियो से बचा लिया और मैं बच गई, हो सकता है कल वह न बचाए और वे मुझे फिर से मार दें.

समाज की भूमिका

सबा की कहानी लाखों ऐसी ही कहानियों में से एक है. उसका पति कैसर उसे प्यार करता था और नहीं चाहता था कि वह कोई समझौता करे. लेकिन उसके ससुराल में केवल उसकी ही तो नहीं चलती थी. कैसर के सबसे बड़े भाई शफाकत ने यह फैसला किया कि केवल माफ करना ही एक उपाय है, क्योंकि हमें सदा पड़ोस में रहना है. हमारी भी बहू-बेटियां हैं.

सबा के ससुराल वाले वैसे ही गरीब भी हैं, इसलिए उन्हें अपने पड़ोसियों की दया पर निर्भर रहना पड़ता है. इसीलिए उन्होंने न्याय के बजाय समझौता करने का फैसला किया.

जैसा कि जमाल कहते हैं, 'अगर वे दोषी ठहराए जाते तो उन्हें पांच साल की सजा होती और जेल से बाहर आने पर वे बदला जरूर लेते; इसलिए उन्होंने समझौता कना बेहतर समझा.'

दोनों परिवारों ने लड़की की जिंदगी की कीमत पर अपने सामाजिक और आर्थिक स्तर को अधिक तरजीह दी. इस लिंगभेद के सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला है.

तथ्य यह है कि पाकिस्तान का कानून अपराधियों को छूट देता है. इस प्रकार आॅनर किलिंग समाज के संदर्भ में ‘अच्छी औरत और ‘पुरुष की इज्जत’ जैसे ढकोसलों का समर्थन करता है.

कानून को यह समझना होगा कि इन हत्याओं का वास्ता इज्जत से नहीं है. ये लोग हत्यारे हैं और यहां पीड़ित कंदील का भाई या सबा का पिता नहीं है, वे औरतें हैं जिन्हें मार दिया गया.

First published: 19 July 2016, 7:45 IST
 
दुर्गा एम सेनगुप्ता @the_bongrel

Feminist and culturally displaced, Durga tries her best to live up to her overpowering name. She speaks four languages, by default, and has an unhealthy love for cheesy foods. Assistant Editor at Catch, Durga hopes to bring in a focus on gender politics and the role in plays in all our interactions.

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