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नेपाल के पीएम केपी ओली भारत का महत्व समझने में चूक गये

सीके लाल | Updated on: 27 December 2015, 11:53 IST
QUICK PILL
  • पिछले कुछ दिनों में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने मधेसी आंदोलन को जानवरों के आंदोलन की संज्ञा देते हुए उसे कुचलने की चेतावनी दी है. ओली को यह लगता है कि इस समस्या के पीछे भारत का हाथ है.
  • नेपाल के सभी राजनीतिक दलों के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मदद करने में भारत दुनिया के किसी अन्य देश से ज्यादा सक्षम है.

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली संसदीय राजनीति के इतिहास में सबसे अनोखे गठबंधन सरकार की कमान संभाल रहे हैं. गृह, ऊर्जा और वन्य जैस महत्वपूर्ण विभाग माओवादी नेताओं के हाथों में हैं. वहीं विदेश मंत्रालय समेत अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों की कमान दक्षिणपंथी और राजतंत्र समर्थकों के हाथों में है.

ओली अपनी पार्टी को मार्क्सवादी-लेनिनवादी बताते हैं लेकिन वह जो करते हैं उसमें स्टालिनवाद, नस्लीय श्रेष्ठता और मुक्त बाजार के सिद्धांत पूरी तरह से सामने आ जाते हैं. हालांकि फासीवाद को खत्म करना ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का एजेंडा रहा है.

गठबंधन में विरोधी गुटों को बनाए रखने के लिए वैचारिक निपुणता की जरूरत होती है और सरकार ने इससे निपटने के लिए फैसले नहीं लेने का तरीका अख्तियार किया. हर कीमत पर सरकार चलाने की जरूरत को समझते हुए ओली अब बड़े फैसले नहीं लेते. कभी-कभी सक्रिय दिखने वाले ओली अब अपना पूरा कार्यकाल ऐसे ही बिताने का फैसला कर चुके थे.

हालांकि अब उनके रवैये में अचानक बदलाव आया है. ओली बयान के मामले में कुख्यात हो चुके हैं. एक बार उन्होंने नेपाल के पूर्व राष्ट्रपति रामबरन यादव को तीखी सलाह देते हुए उन्हें अपना प्रोफेशन संभालने की सलाह देते हुए संवैधानिक मसलों पर विचार जाहिर किए जाने से दूर रहने की सलाह दी थी. यादव पेशे से फिजिशियन हैं.

करीब एक महीने की चुप्पी के बाद ओली अब वापस आ चुके हैं. उन्होंने मधेशी आंदोलनकारियों को सख्ती से निपटने की चेतावनी दी है. सवाल उठता है कि आखिरकार ओली में अचानक इतना आत्मविश्वास कहां से आ गया ? इसको लेकर अलग-अलग लोगों की अलग राय है. लेकिन ओली के आलोचक और समर्थक इस बात पर सहमत हैं कि तराई-मधेस क्षेत्र में राजनीतिक आंदोलन खत्म होने की संभावना ने उन्हें विपक्ष पर आक्रामक बनने का मौका दिया है.

पिछले कुछ दिनों में उन्होंने मधेसी आंदोलन को जानवरों के आंदोलन की संज्ञा देते हुए उसे कुचलने की चेतावनी दी है. ओली को यह लगता है कि इस समस्या के पीछे भारत का हाथ है. नेपाल की संसद में पिछले हफ्ते पेश किए गए संवैधानिक संशोधन का भारत ने स्वागत किया है और ऐसे में ओली को लगता है कि तराई-मधेस का आंदोलन अब खत्म हो सकता है.

ओली को लगता है कि संविधान संशोधन विधेयक पेश किए जाने के बाद तराई-मधेस में चल रहा आंदोलन थम सकता है

हालांकि उनकी उम्मीद उनकी मान्यताओं की तरह की गलत साबित हो सकती है. प्रस्तावित बिल कहीं से भी मधेसी आंदोलनकारियों की तरफ से उठाई गई चिंताओं का समाधान नहीं करती है. आने वाले दिनों में आंदोलन के हिंसक होने का खतरा बढ़ चुका है.

विभाजनकारी नीति

ऐसा कहा जाता है कि माओवादी-स्टालिनवादी और राजतंत्रशाही सरकार ने नई दिल्ली के साथ चार सूत्रीय पैकेज पर सहमति बना ली है. इस समझौते के बाद संसद में लंबित दो बिल को पास किए जाने में मदद मिलेगी ताकि आबादी के आधार पर राजनीति में आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जा सके. इसका तीसरा मकसद नागरिकता से जुड़े प्रावधानों को सरल बनाना है और चौथा मकसद उच्च स्तरीय आयोग की मदद से प्रांतीय सीमाओं का निर्धारण करना है.

सभी प्रस्ताव व्यावहारिक लगते हैं लेकिन सतही रूप से. हालांकि इसकी समीक्षा करने से असलियत सामने आ जाती है. जब तक शक्तिशाली समुदायों को लाभार्थियों की सूची से बाहर नहीं किया जाता है तब तक आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिए जाने का कोई मतलब नहीं है.

वहीं जिलों का निर्माण राजशाही में किया गया था. इन जिलों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ईकाई मान लेना जनसंख्या आधारित चुनाव के मकसद को खारिज कर देता है जिसमें सभी को एक वोट देने का अधिकार दिया गया है. प्रस्तावित विधेयक एक बार फिर से तराई-मधेस की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रहा है.

नागरिकता को लेकर बने कानून की वृहत आधार पर समीक्षा किए जाने की जरूरत है ताकि भारत और नेपाल के बीच होने वाली शादी को कानूनी मान्यता दी जा सके. वहीं संघीय सीमा को लेकर उच्च स्तरीय आयोग को बनाए जाने का प्रस्ताव सबसे भ्रामक है.

ऐसा इसलिए क्योंकि संविधान में ऐसे किसी आयोग का जिक्र नहीं किया गया है. प्रांतों की सीमा में फेरबदल करने के लिए संबंधित विधानसभाओं की मंजूरी लेनी होगी. इसलिए किसी भी आयोग की सिफारिश महज सलाह तक ही सीमित होगी और इसका कोई संवैधानिक आधार नहीं होगा.

नई शुरुआत की जरूरत

ओली बेशक ताव में नजर आ रहे हैं लेकिन ऐसा लगता है कि वह कई बीमारियों को साथ लेकर चल रहे हैं. भारत, चीन या किसी अन्य देश के साथ किया गया समझौता जो मधेसियों की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल होगा, किसी भी कीमत पर नेपाल में जारी संकट का समाधान नहीं कर पाएगा.

अगर शांतिपूर्वक प्रदर्शन से कोई नतीजा नहीं निकल रहा है तो आने वाले समय में आंदोलन में शामिल युवाओं के हिंसक होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

देश की एकता और अखंडता को सुनिश्चित बनाए रखने के लिए नेपाल को नए राजनीति समाधान की जरूरत पड़ेगी

यह सुनने में कड़ा लग सकता है लेकिन मौजूदा गठबंधन अपनी राजनीतिक पूंजी गंवा चुका है. गठबंधन का एकमात्र मकसद यथा स्थिति बनाए रखना है.

नेशनल मीडिया विवादित मसले के कवरेज में संतुलन बनाए रखने में विफल रहा है. नेपाली सिविल समुदाय नपुंसक प्रतीत हो रहा है.

क्या कर सकता है भारत

भारत के साथ हुए समझौते की अटकलों ने तराई-मधेस को फिर से आंदोलित कर दिया है. अब मधेसी राजनीतिक पार्टियां किसी भी तरह का राजनीतिक समझौता करने के मूड में नहीं है. अब इसे खोखला राष्ट्रवाद ही कह लीजिए कि सत्ताधारी गठबंधन ने देश की राजनीतिक जटिलता को उस मुकाम तक पहुंचा दिया है जहां किसी तीसरे पक्ष के बिना इसके समाधान के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता.

अन्य अंतरराष्ट्रीय समुदायों के मुकाबले नेपाल के मामले में भारत ही एकमात्र वैसी शक्ति है जिसके पास नेपाल के सभी राजनीतिक दलों को शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में एक साथ करने की क्षमता है. कोई भी समझौता भारत के दायरे से बाहर रखकर नहीं हो सकता. भारत को अपने पड़ोसी देश में शांति और न्याय का दूत बनना होगा. उसे नेपाल में यथास्थिति बनाए रखने की स्थिति का पक्षधर नहीं होना चाहिए.

First published: 27 December 2015, 11:53 IST
 
सीके लाल @CatchNews

The writer is a noted journalist and political columnist from Nepal.

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