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कट्टर इस्लाम और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हसीना को भारत का समर्थन जरूरी

पिनाक रंजन चक्रवर्ती | Updated on: 4 December 2015, 20:36 IST
QUICK PILL
  • 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हत्याओं के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने से शेख हसीना वाजेद इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं.
  • कट्टर इस्लाम और आतंकवाद से निपटने की कोशिशों के तहत भारत को निश्चित तौर पर शेख हसीना वाजेद की सुरक्षा की चिंता होनी चाहिए.

1971 में देश के आजाद होने के तुरंत बाद ही बांग्लादेश में पाकिस्तानी और बांग्लादेशी युद्ध अपराधियों को कानून के दायरे में लाने की कोशिश शुरू कर दी गई थी. 1974 में हुए त्रिपक्षीय समझौते के बाद 195 युद्ध अपराधियों को सजा देने के फैसले पर रोक लगा दी गई. समझौते के बाद पाकिस्तान ने बांग्लादेश को मान्यता दी और वह ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (ओआईसी) का सदस्य बना. 

बांग्लादेश ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान के युद्ध अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के फैसले से दूरी बना ली. इसकी वजह से पाकिस्तान के युद्धबंदियों और 195 युद्ध अपराधियों को 20वीं सदी के सबसे बड़े जनसंहार की सजा नहीं मिल पाई.

ट्राइब्यूनल से खलबली

1975 में बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या और बांग्लादेश में पाकिस्तान समर्थित सरकार आने के बाद युद्ध अपराध में शामिल बांग्लादेशी सहयोगियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की प्रक्रिया रुक गई थी. इन सरकारों ने राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए युद्ध अपराध में शामिल लोगों से हाथ मिला लिया. 

प्रधानमंत्री हसीना और उनकी बहन रेहाना उस हत्याकांड से बचने में सफल रहीं जिसमें उनके परिवार के ज्यादातर लोगों की हत्या कर दी गई थी. इस हत्याकांड के बाद से हसीना की अवामी लीग को यह संदेह रहा है कि पाकिस्तान ने अपने सहयोगी अमेरिका की मदद से बंगबंधु की हत्या की साजिश रची और अपने भू-राजनीतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए मुक्ति सेना को खत्म करने और पाकिस्तान समर्थित सरकार को बढ़ावा देने की कोशिश की.

2008 में सत्ता में आने के बाद हसीना ने युद्ध अपराधियों को कानून के दायरे में लाने के मकसद से विशेष वॉर ट्राइब्यूनल बनाया. आवामी लीग ने 2008 के चुनावी घोषणापत्र में इसका वादा भी किया था.  उनकी इस मुहिम को गणजागरण मंच की तरफ से जबरदस्त समर्थन मिला. 

गणजागरण मंच युवा बांग्लादेशियों का संगठन है जो 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हत्या, बलात्कार और उत्पीड़न के दोषियों के खिलाफ मुकदमा चलाए जाने की मांग करता रहा है. उनकी इस मांग को देश भर में समर्थन मिला.

युद्ध अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाए जाने की प्रक्रिया की लगातार आलोचना होती रही है. आलोचकों का कहना है कि युद्ध अपराधियों के खिलाफ चलाया जा रहा मामला अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक नहीं है और इसमें भेदभाव किया जा रहा है. 

युद्ध अपराध के दोषियों ने इस्लामी जगत में अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर बांग्लादेश के वॉर ट्राइब्यूनल की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े  करने की कोशिश की

ऐसा होने की उम्मीद भी थी क्योंकि आरोपियों ने इस्लामी जगत में अपने संपर्कों का इस्तेमाल करते हुए वॉर क्राइम्स ट्राइब्यूनल की विश्वसनीयता को खत्म करने की कोशिश की. इसके अलावा पश्चिम के मानवाधिकार संगठनों ने भी इस ट्राइब्यूनल की आलोचना की. 

हालांकि पश्चिमी की किसी सरकार ने ऐसा करने से अपने को दूर रखा. उसकी वजह यह रही कि बांग्लादेश में इस ट्राइब्यूनल को जबरदस्त समर्थन हासिल है. बांग्लादेश में पश्चिमी देश विशेषकर अमेरिका को पाकिस्तान के सहयोगी के तौर पर देखा जाता है. 

बांग्लादेशियों को लगता है कि अपने भू-राजनीतिक हितों को पूरा करने के मकसद से नरसंहार को अंजाम देने में पाकिस्तान को अमेरिका की सहमति मिली हुई थी.

हालिया सजा

हाल ही में बांग्लादेश के पूर्व दो मंत्रियों को 22 नवंबर को फांसी दे दी गई. इनमें से एक जमात-ए-इस्लामी का सदस्य था तो दूसरा बेगम खालिदा जिया की पार्टी बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी का सदस्य था. मुजाहिद जमात के महासचिव थे तो चौधरी बेगम खालिदा जिया के सलाहकार रह चुके थे.

मुक्ति संग्राम के दौरान जहां 30 लाख लोगों की हत्या कर दी गई वहीं 4 लाख महिलाओं और बच्चों के साथ बलात्कार किया गया

अली हसन मोहम्मद मुजाहिद जमात के महासचिव थे जबकि सलाहुद्दीन कादर चौधरी खालिद के सलाहकार थे. चौधरी ने चटगांव नरसंहार को अंजाम दिया जबकि मुजाहिद अल-बद्र के कमांडर थे. 

अल-बद्र ऐसा संगठन था जिसने मुक्ति संग्राम के दौरान बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों की लगातार हत्याएं कराई. यह सब कुछ 1971 के मुक्ति संग्राम के आखिरी चरण में हुआ जब पाकिस्तानी और उनके सहयोगियों ने देश के बुद्धिजीवियों के सफाए की योजना बनाई ताकि नए देश को विचारों के तौर पर कंगाल बनाया जा सके. 

Bangladesh war

जमात के नेताओं और चौधरी ने सामान्य लोगों, बुद्धिजीवियों और पाकिस्तान के खिलाफ लड़ रहे लोगों की हत्याएं करवाईं. करीब 30 लाख लोगों की हत्या हुई और चार लाख महिलाओं और बच्चों के साथ बलात्कार किया गया. इसके अलावा करीब 1 करोड़ लोगों को बांग्लादेश छोड़ भारत में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा.

जनसंहार में अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाया गया. पाकिस्तान की सेना के सहयोग से अल-बद्र और अल-शम्स जैसे संगठित गिरोह ने बड़े पैमाने पर हत्याकांड को अंजाम दिया. जमात ने पश्चिम और इस्लामी दुनिया में ट्राइब्यूनल की विश्वसनीयता को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर मुहिम चलाई. उन्होंने इसके लिए कानूनी और तकनीकी तर्कों का भी सहारा लिया.

मसलन मौत की सजा का यूरोपीय मानवाधिकार संगठनों ने विरोध किया क्योंकि यूरोपीय संघ अपने देशों से मौत की सजा को खत्म कर चुका है. बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी ने ट्राइब्यूनल को राजनीति बदले का साधन बताया. बांग्लादेश में अभी तक चार दोषी कराए दिए जा चुके युद्ध अपराधी को फांसी की सजा दी जा चुकी है और कई लोगों को आजीवन कारावास की सजा दी गई है. चौधरी के अलावा सभी जमात के सदस्य थे. 

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त ने सुनवाई की प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाते हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था जिसमें उन्होंने मौत की सजा खत्म किए जाने की अपील की थी. बांग्लादेश ने इसके बाद तुरंत जवाब देते हुए अपना विरोध जताया. लेकिन इसे लेकर चिंता का कोई विशेष कारण नहीं बनता है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र अब केवल बयानबाजी ही कर सकता है.

सऊदी अरब को मानवाधिकार समिति में शामिल करने के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग अपना मजाक बना चुका है. सऊदी अरब में मानवाधिकार की स्थिति दुनिया में सबसे बुरी है

युद्ध अपराध के दोषियों को सजा दिए जाने के मसले को लेकर बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच तनाव पैदा हो चुका है. इस बार भी पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की तरफ से दिए गए बयान पर बांग्लादेश ने जबरदस्त तरीके से प्रतिक्रिया दी. हसीना के शासनकाल में पाकिस्तान का हस्तक्षेप पूरी तरह से खत्म हो चुका है और वह इस बात को लेकर बेहद नाराज है कि बांग्लादेश में उसके समर्थकों और एजेंटों को ठिकाने लगाया जा रहा है.

पाकिस्तान भारत के खिलाफ अपनी नीतियों को बांग्लादेश के जरिये अमली जामा पहनाता रहा है. चाहे नकली करेंसी की डंपिंग हो या फिर भारत में आतंकवादियों की घुसपैठ का. बांग्लादेश में पाकिस्तान ने सरकारी एजेंसियों में पाकिस्तानी इस्लामी कट्टरपंथियों, बीएनपी और अपने समर्थकों को घुसाने की कोशिश करती रही है. लेकिन हसीना की सरकार में पाकिस्तान की यह सभी कोशिशें नाकाम हो रही हैं.

संभावित संघर्ष

बांग्लादेश अभी भी हाई अलर्ट पर है. सुरक्षा के भारी भरकम इंतजाम को हर जगह देखा जा सकता है. सोशल मीडिया और ब्लॉगिंग पर प्रतिबंध लगा हुआ है. इस बात की आशंका बनी हुई है कि इस्लामी कट्टरपंथी और उसके काडर वापसी की कोशिश कर सकते हैं. इस्लामी कट्टरपंथियों का हिंसा फैलाने का पुराना इतिहास रहा है.

संदिग्ध इस्लामी कट्टरपंथियों ने चुनिंदा विदेशी, सेक्युलर ब्लॉगरों और उनके प्रकाशकों को पिछले कुछ महीने में निशाना बनाया है. एक शिया जुलूस को हाल ही में निशाना बनाया गया जिसमें कई लोग हताहत हुए. इस्लामिक स्टेट ने इन हमलों की 'जिम्मेदारी' ली है. ऑनलाइन घोषणापत्र दाबिक में आईएस ने दावा किया है कि बांग्लादेश अब उसके निशाने पर है.

हसीना एक परिपक्व और साहसी नेता के तौर पर उभरी हैं जो कड़े फैसले लेने की क्षमता रखती हैं. उन्होंने भारत विरोधी विद्रोहियों को भारत को सौंपने का कठोर फैसला लिया

ऐसे में इस बात को लेकर कोई विवाद नहीं है कि उन्हें इस्लामी कट्टरपंथी और पाकिस्तान समर्थक निशाना बना सकते हैं. भारत को उनकी सुरक्षा की चिंता होनी चाहिए क्योंकि उनकी गैर-मौजूदगी में बांग्लादेश कट्टर इस्लाम का केंद्र बन सकता है. 

अगर कट्टर इस्लाम और आतंकवाद की समस्या से निपटना है तो दोनों देशों की सरकारों को निश्चित तौर पर सुरक्षा और खुफिया गतिविधियों से जुड़ी सूचनाओं का आदान-प्रदान करना होगा. भारत पहले ही इस बात के संकेत दे चुका है कि वह युद्ध अपराध पर गठित ट्राइब्यूनल और दोषियों को सजा दिए जाने की प्रक्रिया की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश को बदनाम किए जाने की हर कोशिश का विरोध करेगा. 

First published: 4 December 2015, 20:36 IST
 
पिनाक रंजन चक्रवर्ती @catchnews

फ़ेलो, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली. भारत के पूर्व विदेश सचिव, बांग्लादेश के पूर्व भारतीय उच्चायुक्त और थाईलैंड में पूर्व भारतीय राजदूत रह चुके हैं.

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