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पाकिस्तान की दुखती रग को छुएगी एनएसजी में भारत की सदस्यता: चीन

अभिषेक पराशर | Updated on: 14 June 2016, 18:55 IST
QUICK PILL
  • परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता का चीन ने आधिकारिक तौर पर विरोध किया है. 
  • चीन ने कहा कि भारत को एनएसजी में शामिल किए जाने का फैसला न केवल पाकिस्तान की \'\'दुखती रग\'\' को छुएगा बल्कि परमाणु हथियारों के होड़ को भी बढ़ावा देगी. 
  • एनएसजी में भारत की सदस्यता लगभग पक्की होने के बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी सरकार और कांग्रेस से उसे भी इस क्लब में शामिल किए जाने की दावेदारी का समर्थन किए जाने की मांग की थी.

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता का चीन ने आधिकारिक तौर पर विरोध किया है. चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि भारत को एनएसजी में शामिल किए जाने से भारतीय उपमहाद्वीप में परमाणु टकराव की शुरुआत होगी.

चीन ने पहली बार आधिकारिक रूप से भारत को एनएसजी क्लब में शामिल किए जाने का विरोध किया है. चीन ने कहा कि भारत को एनएसजी में शामिल किए जाने का फैसला न केवल पाकिस्तान की ''दुखती रग'' को छुएगा बल्कि परमाणु हथियारों के होड़ को भी बढ़ावा देगा. 

चीन ने कहा कि एनएसजी में भारत की सदस्यता से चीन के राष्ट्रीय हितों को भी ''नुकसान'' होगा. ग्लोबल टाइम्स चीन का सरकारी अखबार है. अखबार में छपे लेख के मुताबिक, 'इस क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु शक्ति हैं. दोनों ही देश एक दूसरे की परमाणु क्षमता को लेकर सतर्क रहते हैं. एनएसजी की सदस्यता के लिए भारत की कोशिश और उसके संभावित नतीजे निश्चित तौर पर पाकिस्तान की दुखती रग को छुएंगे.'

लेख में कहा गया है, 'पाकिस्तान भारत के साथ परमाणु ताकत के मामले में बड़े असंतुलन को बर्दाश्त नहीं कर सकता. ऐसे में अगर भारत परमाणु क्लब में शामिल होता है तो दोनों के बीच परमाणु होड़ की शुरुआत हो सकती है. इससे न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ेगी बल्कि चीन के राष्ट्रीय हितों को भी नुकसान होगा.'

24 जून को सोल में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की बैठक होने जा रही है. बैठक में भारत की सदस्यता पर विचार किया जाना है. बैठक के पहले भारत की सदस्यता के लिए समर्थन जुटाने की कोशिशों के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेअमेरिका समेत पांच देशोें की यात्रा की थी. अमेरिकी यात्रा के दौरान बराक ओबामा सेे भारत की एनएसजी सदस्या को लेकर उन्होंने विचार विमर्श किया था. 

ओबामा ने इस दौरान एनएसजी में भारत की दावेदारी के समर्थन को दोहराया था. मैक्सिको और स्विट्जरलैंड ने भी भारत की दावेदारी का समर्थन कर चुके हैं.

चीन, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रिया ने भारत की दावेदारी का विरोध किया है

लेख में कहा गया है कि एनएसजी की बैठक से पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की सदस्यता के लिए दुनिया के कई देशों का दौरा किया. अमेरिका और एनएसजी के कुछ सदस्य ने भारत की सदस्यता के प्रयास को समर्थन दिया है, लेकिन कई देशों विशेषकर चीन के विरोध किए जाने की वजह से भारत की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

एनएसजी में कुल 48 देश शामिल हैं और इनमें से अधिकांश ने भारत को इस क्लब में शामिल किए जाने के प्रयास का समर्थन किया है. हालांकि चीन, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, तुर्की, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रिया ने भारत की दावेदारी का विरोध किया है.

ग्लोबल टाइम्स में कहा गया है, 'चीन इस बात पर जोर देता है कि भारत को एनएसजी में सदस्यता देने से पहले उसे एनपीटी पर हस्ताक्षर करना चाहिए.' 

लेख कहता है कि एनएसजी में शामिल होने के लिए भारत के अपने आकलन हैं. सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दर्जा बरकरार रखने के लिए एनएसजी में भारत की पहुंच से भारत के घरेलू परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार खुल सकता है.

एनएसजी की मजबूत दावेदारी

एनएसजी की सदस्यता के लिए दावेदारी से पहले भारत हेग कोड ऑफ कंडक्ट पर हस्ताक्षर कर चुका है और साथ ही वह अब मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्र्रोल रिजीम की सदस्यता ले चुका है.

परमाणु व्यापार के लिए एनएसजी की सदस्यता जरूरी होती है. अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु करार होने के बाद भारत एनएसजी के सदस्य देशों मसलन फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और रूस समेत 11 देशों के साथ परमाणु आपूर्ति करार पर हस्ताक्षर हो चुका है. फ्रांस, रूस और कजाकस्तान से भारत को लगातार यूरेनियम की आपूर्ति हो रही है. पाकिस्तान शुरू से ही भारत को परमाणु व्यापार में छूट दिए जाने का विरोध करता रहा है.

अमेरिका का समर्थन

नवंबर 2010 में भारत के दौरे पर आए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एनएसजी, वासेनार एग्रीमेंट, ऑस्ट्रेलिया ग्रुप और एमटीसीआर में भारत को चरणबद्ध तरीके से शामिल किए जाने का समर्थन किया था. 

2010 में ही तत्काली फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने भी भारत को एनएसजी में शामिल किए जाने का समर्थन किया था. 

करीब पांच सालों बाद जनवरी 2015 में बराक ओबामा जब गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत आए थे तब उन्होंने कहा था कि भारत एनएसजी की सदस्यता के लिए तैयार है. भारत के लिए यह बड़ी कूटनीतिक जीत थी. ब्रिटेन और रूस भी भारत की दावेदारी का समर्थन कर चुके हैं. 

अमेरिका के समर्थन के बाद चीन ने एनएसजी में भारत की दावेदारी का सशर्त समर्थन करते हुए कहा था कि  ऐसा करने के दौरान विशेष सावधानी बरती जाने की जरूरत है. चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने मीडिया को दिए गए बयान में कहा, 'हम मानते हैं कि किसी देश को शामिल किए जाने से एनएसजी की एकता और उसकी क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए और यह फैसला सर्वसम्मति से लिया जाना चाहिए.' 

हालांकि अब अधिकांश सदस्य देशों का समर्थन मिलने के बाद चीन ने आधिकारिक तौर पर भारत की सदस्यता का विरोध किया है.

पाकिस्तान की दावेदारी

एनएसजी में भारत की सदस्यता लगभग पक्की होने के बाद पाकिस्तान ने अमेरिकी सरकार और कांग्रेस से उसे भी इस क्लब में शामिल किए जाने की दावेदारी का समर्थन किए जाने की मांग की थी. 

पाकिस्तानी अखबार द डॉन में प्रकाशित खबर के मुताबिक पाकिस्तान ने पिछले महीने वियना को औपचारिक तौर पर आवेदन देकर उसे भी इस ग्रुप में शामिल किए जाने की मांग की थी. हालांकि अमेरिका ने पाकिस्तान की इस मांग पर कोई जवाब नहीं दिया. 

2010 में तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने एनएसजी में भारत की दावेदारी का समर्थन किया था

अमेरिकी सीनेट समिति को लिखे गए पत्र में पाकिस्तान के राजदूत जलील अब्बास जिलानी ने कांग्रेस को बताया था कि पाकिस्तान ने एनएसजी की सदस्यता हासिल करने के लिए कई सारे कदम उठाए हैं. 

उन्होंने कहा, 'एनएसजी में शामिल होने की पाकिस्तान की दावेदारी तकनीकी अनुभव, परमाणु सुरक्षा को लेकर स्थापित मानक के जबरदस्त अनुभव पर आधारित है. पाकिस्तान ने परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा के लिए पिछले 42 सालों के दौरान पर्याप्त इंतजाम किए हैं. पाकिस्तान की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक विकास को पूरा करने के लिए सुरक्षित और टिकाऊ  असैन्य परमाणु ऊर्जा की जरूरत होगी.'

First published: 14 June 2016, 18:55 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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