Home » इंटरनेशनल » India should start dialogue with china in clear manner
 

चीन से बातें हों, पर साफ-साफ

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 4 November 2016, 7:47 IST
QUICK PILL
  • हम मानें या न मानें लेकिन चीन के साथ हमारे रिश्ते दिन-ब-दिन खराब ही होते जा रहे हैं. निश्चित रूप से पाकिस्तान इसका एक बड़ा कारण है लेकिन अकेला कारण नहीं है. 
  • ख़ुद चीन और एक सीमा तक भारत भी इन बिगड़ते रिश्तों के लिए जिम्मेदार है. चीन की भूमिका इसमें ज्यादा बड़ी है. उसे ही यह साबित करना होगा कि वह अब दिल से साफ है.

भारत-चीन के रिश्तों में खराबी किस हद तक पहुंच गई है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे युद्ध के हालात बनते हैं तो वह पाकिस्तान नहीं वस्तुत: चीन के साथ होगा. ऐसा इन देशों के रिश्तों पर नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है. 

आखिर ऐसा क्या हुआ कि, ढाई साल में हालात इतने खराब हो गए. मई 2014 में जब केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी और कांग्रेस की सरकार गई, तब हालात इतने खराब नहीं थे. बीच में एक दौर तो ऐसा भी आया, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर हुई नियमित मुलाकातों ने बेहतरी का संकेत दिया. 

इससे बढ़कर कई मौकों पर तो यह भी लगने लगा कि अगर सम्बंध सुधार की यही रफ्तार जारी रही तो दो अविश्वसनीय पड़ोसी 'दो विश्वस्त दोस्त' बन जाएंगे. 

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल की अपने चीनी समकक्ष और अन्य अधिकारियों से नियमित मुलाकातें भी इस धारणा का मजबूत आधार बनी. लेकिन आज जो हालात हैं, उनसे लगता है कि, यह सब इल्युजन (एक आभासी दृश्य) ही था. वर्ना इतनी जल्दी रिश्तें क्यों बिगड़े? क्यों हिन्दी-चीनी, भाई-भाई और पंचशील के दौर से निकलकर हम फिर एक बार 1962 के उसी अक्टूबर-नवम्बर के दौर में पहुंचे से लगते हैं जब दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हो गई थीं. 

चीन, एक रोड़ा

क्यों चीन हमें एनएसजी का सदस्य नहीं बनने दे रहा? क्यों चीन जैश-ए-मोहम्मद के चीफ मसूद अजहर को यूएन से आतंकी घोषित होने पर 'वीटो' लगा रहा है? क्या दो हज़ार किमी लम्बा 'चीन-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडोर' (सीपीइसी) ही इसकी वजह है या फिर और भी कारण हैं.

सचाई यह है कि हम दूध के जले हैं और छाछ को भी फूंक-फूंक कर पी रहे हैं. उधर चीन और उसका नेतृत्व चाहे वह माओ त्से तुंग हों या चाऊ एन लाई, डेंग जियाओ पिंग हो या जियांग जैमिन अथवा फिर अब शी जिनपिंग, सबके दिमाग में भारत की तस्वीर एक ऐसे देश की रही है जो इस क्षेत्र में चीन के मुकाबले खड़ा हो सकता है. 

चीन के पास पांच बड़े नेताओं के नाम हैं तो भारत के पास भी जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और अब नरेन्द्र मोदी के नाम है. पीवी नरसिंह राव ने भारत में जिस उदारीकरण की शुरुआत की, भारत उसमें भी आज मजबूती से खड़ा है. आज की तारीख में हमारी इकोनोमी चीन से ज्यादा मजबूत है. यही कारण है 51 बिलियन अमरीकी डॉलर से सीपीइसी बनाकर भी चीन भारत की ओर देख रहा है. वह ग्वादर को उस चाबहार बंदरगाह से जोडऩा चाहता है जिसे भारत ईरान में बना रहा है. 

कॉरिडोर से पहले कंटेनर

इन सब ख्वाहिशों के बीच जब वह भारत की अमरीका और जापान से बढ़ती नजदीकियां देखता है तो बिगड़ जाता है. फिर उसे भारत की हर बात और हर नेता खराब लगने लगते हैं. खुद भले 'पाक अधिकृत कश्मीर' में कॉरिडोर बनाए लेकिन अरुणाचल के तवांग में अमरीकी राजदूत का जाना भी उसे बुरा लगने लगता है. वह हर बात का जवाब देने की कोशिश करता है. कभी सीधे कभी घुमा-फिराकर, जैसा कूटनीति में होता है. 

दो दिन पहले ही चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर पर सौ कंटेनर भेजना भी वैसा ही संदेश है. अभी कॉरिडोर पूरा बना भी नहीं है तब काहे का व्यापार. फिर उन कंटेनरों में क्या है, यह न कोई खोलकर देख सकता और ना ही उस पर कोई कस्टम ड्यूटी. यानी उनमें भारत से लडऩे के लिए हथियार भी हों तो किसे पता?

चीन की सेना पहले ही पाक फौज के साथ इस दो हजार किमी लम्बे कॉरिडोर की सुरक्षा की निगरानी कर रही है. पंजाब, बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनवा और इस्लामाबाद तक. यानी, कभी पाकिस्तान से युद्ध के हालात बने तो चीनी फौज भारत से लगती अपनी सीमा के साथ भारत-पाक सीमा पर भी मौजूद.

फिर बंधी उम्मीद

अब जबकि भारत और चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इसी सप्ताह भारत में फिर मिल रहे हैं, तब यह सारे मुद्दे साफ हो जाने चाहिए. यह स्पष्ट हो ही जाना चाहिए कि, चीन अकेले पाकिस्तान का ही दोस्त है (जैसे उसके नेता जब-तब कहते रहते हैं) या फिर वह भारत से भी अच्छे सम्बंध चाहता है. भले वह पाकिस्तान को अपना पिछलग्गू बनाकर रखे लेकिन भारत की चिंताओं और उससे जुड़े मुद्दों पर अपना स्टैण्ड क्लियर कर दे. 

उदाहरण के लिए संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई सदस्यता, एनएसजी की सदस्यता, मसूद अजहर सहित पाक समर्थित आतंक पर उसका दृष्टिकोण, पाक अधिकृत कश्मीर में उसकी व्यापारिक और सैन्य गतिविधियां. बदले में हमें भी चीनी सामान के बहिष्कार जैसी छेडख़ानियों से बचना चाहिए. वो अपने दोस्त बनाए और हम अपने लेकिन दोनों एक-दूसरे के दुश्मन नहीं बनें, यह रोड मेप तो बनना ही चाहिए. 

बेशक इसमें चीन की भूमिका ज्यादा बड़ी है. उसे ही यह साबित करना होगा कि, वह अब दिल से साफ है. नहीं तो हमारे पास तो यह मानने के लिए उसका 55 साल का इतिहास है कि उसके हमसे रिश्ते मुंह में राम, बगल में छुरी जैसे हैं. दोनों देशों के बीच अविश्वास की इस खाई को, उसे ही पाटना होगा, अन्यथा रोज-रोज की इन बातों का कोई लाभ नहीं मिलेगा. कहीं चीन एक बार फिर हमें हमारे प्यार का वैसा ही सिला नहीं दे जैसा पहले दे चुका है या फिर आज पाकिस्तान दे रहा है.

First published: 4 November 2016, 7:47 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी