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आईएसआईएल में भारतीय लड़ाके न के बराबर, यूरोपियों में लगी है होड़

सादिक़ नक़वी | Updated on: 21 April 2016, 8:08 IST
QUICK PILL
  • इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लेवांत (आईएसआईएल) के आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है कि जिन 4,000 लड़ाकों का विश्लेषण किया गया, उनमें से महज एक भारतीय नागरिक था.
  • ये आंकड़े खैलिफेट्स ग्लोबल वर्कफोर्स नाम की एक रिपोर्ट में पेश किये गये हैं जो हाल में वेस्ट बैंक के कम्बेटिंग टेररिज्म सेंटर ने प्रकाशित की है. यह रिपोर्ट 4,000 से अधिक विदेशी लड़ाकों के बारे में किये गये विश्लेषण पर आधारित है.

अगर इस्लामिक स्टेट के विदेशी लड़ाकों के बारे में साल 2014 के आखिर में हुए खुलासे पर यकीन किया जाये, तो यह कहा जा सकता है कि इसकी हिंसक विचारधारा मोटे तौर पर भारतीय मुसलमानों को आकर्षित करने में असफल रही है.   

इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लेवांत (आईएसआईएल) के आंकड़े यह खुलासा करते हैं कि जिन 4,000 लड़ाकों का विश्लेषण किया गया, उनमें से महज एक भारतीय नागरिक था. छह अन्य के बारे में यह कहा गया कि वे भारतीय मूल के हैं, लेकिन उनकी नागरिकता की पुष्टि नहीं की जा सकी. 

इस आंकड़े की तुलना इस तथ्य के साथ भी की जा सकती है कि भारत में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, या पूरी दुनिया के कुल मुसलमानों के तकरीबन 11 फीसदी भारत में रहते हैं.  

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अगर आप प्रति दस लाख नागरिकों पर आईएसआईएल लड़ाकों की तुलना करें तो भारत के लिए यह आंकड़ा महज 0.01 बैठता है. ये आंकड़े उन विदेशी लड़ाकों के दस्तावेजों पर आधारित हैं जिन्होंने साल 2013 से 2014 के आखिर तक सीरिया के उन क्षेत्रों में प्रवेश किया और वहां से बाहर निकले जहां आईएसआईएल मोर्चा ले रहा था.  

ये आंकड़े खैलिफेट्स ग्लोबल वर्कफोर्स नाम की एक रिपोर्ट में पेश किये गये हैं जो हाल में वेस्ट बैंक के कम्बेटिंग टेररिज्म सेंटर ने प्रकाशित की है. यह रिपोर्ट 4,000 से अधिक विदेशी लड़ाकों के बारे में किये गये विश्लेषण पर आधारित है जिनकी सूचना इस साल की शुरुआत में इस्लामिक स्टेट के एक भगोड़े ने कुछ समाचार संस्थानों को चोरी-छिपे भेज दी थी.

सीटीसी को ये दस्तावेज अमेरिका स्थित एनबीसी नेटवर्क ने दिये थे, जो उन चुनिंदा मीडिया हाउस में से एक था, जिनका यह दावा था कि उसके पास ये दस्तावेज हैं.

हालांकि यह रिपोर्ट इस बारे में आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साध लेती है कि इन लड़ाकों में से कितने अमेरिकी नागरिक थे.

क्या है इसका मतलब?

यह विश्लेषण मूलतः इस बात की ओर संकेत करता है कि इस्लामिक स्टेट की ओर से दिये गये जिहाद के आह्वान पर भारतीयों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. इन आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि इनमें नॉर्वे, स्विटजरलैंड, त्रिनिदाद एंड टोबैगो और बेनिन जैसे छोटे देशों के लोगों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत अधिक है.   

इस रिपोर्ट के लेखकों के मुताबिक इन आंकड़ों के परीक्षण से कुछ रोचक बातें निकल कर सामने आयी हैं, “हालांकि इसमें सऊदी अरब के लोगों के विवरण सर्वाधिक हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आधार पर देखें तो ऐसा नहीं है. अगर राष्ट्रीयता के आधार पर देखा जाये, तो हमारे पास मौजूद आंकड़ों में ट्यूनीशिया और कोसोवो के लोगों के विवरण अधिक हैं.”

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लेखक इस बात को ले कर सावधान भी करते हैं कि इन आंकड़ों को सीरिया में चल रहे संघर्ष में इन देशों से आये कुल लड़ाकों की मोटी-मोटी संख्या नहीं मान लेना चाहिए. रिपोर्ट के मुताबिक, “जैसा कहा गया है... ये आंकड़े इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों तक ही सीमित हैं और वह भी एक निश्चित समयावधि के दौरान के हैं.”

जहां तक हमारे पड़ोसियों का सवाल है, लड़ाकों के इस विश्लेषण में चीन के 138, पाकिस्तान के 12, बांग्लादेश के तीन और श्रीलंका का एक नागरिक मिला.  

इन लड़ाकों में यूरोपीय लोगों की संख्या सबसे अधिक है जो आईएसआईएल की विचारधारा से आकर्षित हो कर युद्धग्रस्त सीरिया व इराक पहुंचे और खिलाफत की स्थापना के लक्ष्य के लिए सत्ताधारी सैन्य बल से लड़े. रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें 57 ऐसे लोगों के विवरण मिले जो यूनाइटेड किंगडम के रहने वाले थे. इसके अलावा इसमें फ्रांस के 128, कोसोवो के 52 और जर्मनी के 80 लोग शामिल थे. रिपोर्ट कहती है कि इसमें 11 ऑस्ट्रेलियाई नागरिक भी थे.  

क्या बच्चों को लड़ाकों के तौर पर तैयार किया जा रहा है?

सीटीसी का विश्लेषण इस बात की पुष्टि भी करता है कि आईएसआईएल बच्चों को भविष्य के लड़ाकों के तौर पर तैयार कर रहा है. आंकड़े के मुताबिक इनमें से लगभग 400 ऐसे थे जिनकी उम्र 18 साल से कम थी. इसके अलावा 41 अन्य तो 15 साल या इससे भी कम उम्र के पाये गये.

सीटीसी के विश्लेषण में दो ऐसे बच्चों का उल्लेख है जो शायद भाई हैं और उजबेकिस्तान के ताशकंद से 4 जुलाई 2014 को सीरिया के तेल अबायद पहुंचे. रिपोर्ट के मुताबिक जब वे पहुंचे तब वे 14 और 12 साल के थे और प्राइमरी स्कूल के छात्र के तौर पर नामांकित थे.

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रिपोर्ट के मुताबिक, “इन दोनों के नाम के सामने यह लिखा है कि ये बच्चे हैं और एक कैम्प में जा रहे हैं. कैम्प के बाद इन्हें इनके पिता के पास पहुंचाना है, जिससे संगठन परिचित है.”

रिपोर्ट आगे कहती है, “खास तौर पर इस मामले की बात करें तो ऐसा लगता है कि बच्चों को वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में लड़ाकों की भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है. हालांकि इस पूरे आंकड़े में नाबालिगों की जो बाकी संख्या है, वह इस पूर्वज्ञात तथ्य की ओर ही इशारा करती है कि इस्लामिक स्टेट बच्चों को हिंसक गतिवधियों में सक्रिय रूप से इस्तेमाल करता है.”

क्या भारत पर है नजर?

ये आंकड़े केवल उन्हीं लड़ाकों की बात करते हैं जो साल 2014 तक वहां पहुंचे थे, लेकिन हाल में कुछ ऐसी घटनायें हुई हैं जो इस बात का संकेत देती हैं कि भारत पर अब आईएसआईएल की खास नजर है. 

पड़ोसी बांग्लादेश में पिछले दिनों हुई कई घटनाओं में आईएसआईएल का नाम आया है और हाल ही में जारी एक साक्षात्कार में, जो बांग्लादेश में कथित तौर पर आईएसआईएल के मुखिया का है, इस बात का संकेत दिया गया है कि किस तरह इस्लामिक स्टेट अब भारत पर हमलों की योजना बना रहा है.  

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गृह मंत्रालय को भी इस धमकी की गंभीरता का एहसास है और इसने मुस्लिम समुदाय के सदस्यों और धर्मगुरुओं को शामिल करते हुए कुछ अतिवाद विरोधी उपाय शुरू किये हैं. इसके अलावा, एनआईए ने भी इस्लामिक स्टेट के कुछ संदिग्धों की गिरफ्तारियां की हैं.

एजेंसी का दावा है कि इनमें से अधिकांश को इस्लामिक स्टेट में भर्ती करने वालों ने ऑनलाइन तरीके से अतिवाद की ओर प्रेरित किया और देश में हमले करने के लिए संगठन के साथ जुड़ने के लिए ललचाया.

First published: 21 April 2016, 8:08 IST
 
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