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पाकिस्तान के तीन सुलगते सवाल जिसका भारत से चाहिए जवाब

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 October 2016, 16:53 IST
(कैच)
QUICK PILL
  • पाकिस्तान के अखबार डॉन में छपा एक लेख भारत-पाकिस्तान के संबंधों को लेकर काफी प्रासंगिक है.
  • पाकिस्तान की खामियों से तुलना करते हुए ताहिर मेहदी ने इस लेख में भारत से तीन सवालों के जवाब मांगे हैं.

भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के दिनों में संबंध बेहद बुरे दौर में हैं. नियंत्रण रेखा और सरहद पर दोनों तरफ से जबरदस्त फायरिंग का दौर जारी है. भारत ने पिछले महीने सर्जिकल स्ट्राइक का दावा किया और उसके बाद संबंधों में तनातनी का नया दौर शुरू हो गया.

भारत के रुख के चलते इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क सम्मेलन खटाई में पड़ गया. यूएन में पाक पीएम नवाज शरीफ के भाषण के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आतंकवाद पर पाकिस्तान को पानी पी-पीकर कोसा.

पाकिस्तानी अभिनेताओं को भारतीय फिल्मों से बाहर करने की मांग जोर-शोर से उठने लगी. यहां तक कि अहमदाबाद में आयोजित हुए कबड्डी वर्ल्ड कप में भी पाकिस्तान को न्योता नहीं भेजा गया.

हालांकि यह सवालों के जवाब देने का शायद माकूल वक्त नहीं है. फिर भी पाकिस्तान के अखबार डॉन में छपा एक लेख भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर काफी प्रासंगिक नजर आ रहा है. एक नजर ताहिर मेहदी के इस लेख में पूछे गए सवालों पर:    

पहला सवाल

आजादी मिलने के बाद से ही पाकिस्तान में लोकतंत्र को हमले झेलने पड़े हैं. 1958 में जनरल अयूब से शुरू होकर  हमने तीन दशक लंबा सैनिक शासन झेला है.

इस दौरान सियासी पार्टियों ने लोकतंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए काफी प्रयास किए, लेकिन उन्हें पाकिस्तानी इस्टैबलिश्मेंट (व्यवस्था) से ताकत हासिल करने में बहुत मुश्किल से ही कामयाबी मिली.

हमने तीन साल पहले ही लोकतांत्रिक संक्रमण से आगे निकलते हुए नई सरकार बनाई है. चुनी हुई सरकार अब भी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इसके पास हकीकत में क्या शक्तियां हैं?

भारत ने कभी भी सैन्य शासन को नहीं झेला है. पिछले 70 साल के चुनावी परिदृश्य को देखें तो वहां बेहद मजबूत चुनाव आयोग है, चुनाव परिणामों पर शायद ही कभी विवाद हुआ है.

लेकिन राजनीति शास्त्र का अध्ययन करने वाले पाकिस्तानी छात्र जब भारत का अनुभव बताते हैं तो तकरीबन पाकिस्तान की तरह ही लोगों की प्रतिक्रिया होती है, "ज्यादातर राजनेता भ्रष्ट हैं. वे चोर और अपराधी हैं."

फिर भारत से मेरा सवाल है कि तमाम लोकतांत्रिक संक्रमण के बीच बेदाग चुनाव के बावजूद स्वच्छ और मजबूत राज्यव्यवस्था क्यों नहीं उत्पन्न होती है. क्या यह लोकतंत्र का लोगों से बुनियादी वादा नहीं है.

क्या राजनैतिक दूरदर्शिता के जरिए व्यवस्था को धीरे-धीरे मजबूत और परिपक्व बनाने के साथ ही सरकार और जनता के बीच के अंतर को नहीं पाटा जाना चाहिए? लोकतंत्र में भरोसा वापस पाने के लिए मैं हर हाल में इसका जबाव चाहता हूं.  

दूसरा सवाल

पाकिस्तान ने अपने धार्मिक झुकाव को लेकर शुरुआत से ही कोई बाधा नहीं रखी है. संविधान सभा ने 12 मई 1949 को प्रस्ताव भी पास किया था. यह बिल्कुल साफ है और हमने कभी इस फैसले को पीछे मुड़कर नहीं देखा. 

हकीकत में हम जब कभी यह एहसास करने के करीब होते हैं कि यह एक समस्या हो सकती है- धर्म और राजनीति को जोड़ना, हम इसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं और इसके बजाए इसका हल इस डोज को दोहराकर निकालने की कोशिश करते हैं.

फिर हमारे राजनीतिक तत्वों के इस नुस्खे को अंतरराष्ट्रीय खरीदार मिल जाते हैं. यह विधर्मी साम्यवाद से लड़ने का सिद्धांत बन जाता है. यह अपने आप में इतना बड़ा रूप ले लेता है कि हमारा अपना राज्य इसके सामने बौना हो जाता है.

अब तक तो नहीं लेकिन भारत भी यह सब अब गंवा रहा है. फिल्म बनाने वालों को जुबान बंद रखने को कहा जाता है. बीफ खाने के संदेह में बर्बर हत्या होती है.

हर किसी को राष्ट्रवाद को अपनी आस्तीन पर चढ़ाने को मजबूर किया जाता है, महिलाओं को गली में रोक लिया जाता है और उनसे कहा जाता है कि वे क्या पहन सकती हैं और क्या नहीं.

और सबसे बड़ा राष्ट्रीय सवाल कि क्या कोई हाथ उठाकर सवाल पूछने का साहस कर सकता है?

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) है. इसे अपनी विविधता पर गर्व है और उन्होंने कभी अपनी सीमाओं पर जिहाद नहीं छेड़ा है. फिर धार्मिक कट्टरपंथी कैसे सरकार को बंधक बना लेते हैं और समाज को उसके घुटनों पर बैठने को मजबूर कर देते हैं. मुझे कोई जवाब नहीं मिल सका. मुझे आश्चर्य होगा अगर भारत यह जवाब दे दे.

तीसरा सवाल

भारतीय फिल्मों में एक पुलिस वाला हमेशा घृणित चरित्र होता है, जिससे आप नफरत करना पसंद करते हैं. वह निचले स्तर तक भ्रष्ट होता है, दिमाग से अपराधी और कई मौकों पर देशद्रोही भी होता है.

वहीं तुलनात्मक रूप से वर्दी वाले दूसरे संस्थान परफेक्ट हीरो के रोल में दिखते हैं. बॉलीवुड में एक सैनिक हमेशा ईमानदार, बिना थके काम करने वाला, पूर्ण प्रोफेशनल जो अपने देश की रक्षा करने के लिए हर तरह का खतरा मोल लेने को तैयार रहता है. चाहे वह सड़कछाप गुंडा से लड़ने की बात हो या फिर निर्दयी आतंकी से सामना.

एक जवान कभी भ्रष्ट या गलत नहीं होता और सार्वजनिक रूप से सेना की किसी भी कार्यवाही पर सवाल उठाना राष्ट्रद्रोह और विश्वासघात माना जाता है. पाकिस्तान में राष्ट्र निर्माण में सेना की भूमिका सीक्रेट नहीं है, लेकिन भारत में यह हमेशा चुनी हुई सरकार के नियंत्रण में रहता है. ज्यादातर मध्य वर्ग का सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता के साथ राष्ट्रीय गर्व से छुटकारा पा लेना भी एक सवाल है.

पाकिस्तान भी कुछ अलग नहीं सोचता सिवाय इसके कि जिहाद उनकी रक्षा रणनीति का केंद्रबिंदु है और इसी पर वह आरोप मढ़ देते हैं.

दिवंगत जनरल हामिद गुल ने कहा था, "हमारी रक्षा के लिए दो चीजें हैं. पहला न्यूक्लियर ताकत का प्रतिरोध और दूसरा जिहाद की भावना. मदरसे इस भावना को जीवित रखने में काफी अहम हैं."

लेकिन लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत में सैन्यवाद कैसे राष्ट्रवाद की भावना का मुख्य स्तंभ हो सकता है. भारत को एक जवाब ढूंढ़ना चाहिए और इसे हमसे साझा करना चाहिए. 

First published: 28 October 2016, 16:53 IST
 
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