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कारोबार है दोनों देशों के बीच शांति का हथियार

मनोज पंत | Updated on: 23 October 2016, 7:10 IST
QUICK PILL
  • अब यह साफ़ है कि भारत-पाक संबंधों में जो गिरावट अभी दिखी है, उतनी पहले कभी नहीं रही. इसके नतीजे कोई नहीं जानता. 
  • दोनों मुल्कों की सेनाएं रक्षात्मक रूप से आमने-सामने हैं. सरहदों पर रह रहे लोगों से उनके ठिकाने खाली कराए जा रहे हैं. दोनों देशों के बीच हवाई उड़ानें भी पहले से ज़्यादा हैं.

यह समय का चक्र है कि अब भारत के सिनेमाघरों में पाकिस्तानी कलाकारों की फिल्में नहीं दिखाई जाएंगी. वहीं पाकिस्तान में हमारे कंटेंट को पहले ही बैन कर दिया गया है. पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन को टालना पड़ा है और पाकिस्तान को दिए गए मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) का दर्जा वापस लेने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. 

एक कदम आगे, दो कदम पीछे

एक स्तर पर, सरकार का सेना को मुस्तैद रहने के लिए कहना स्वागत योग्य है. दशकों पुरानी यह रणनीति, कि सीमापार से होने वाली आंतकी घटनाओं को रोकने के लिए सेना का इस्तेमाल कोई हल नहीं है, जबकि दोनों देश परमाणु हथियारों से लैस हैं, अब स्पष्ट रूप से काम नहीं कर रही है.

1999 के ऐतिहासिक लाहौर घोषणा पत्र पर दस्तख़त के बाद कारगिल युद्ध और 2001 के आगरा सम्मेलन के बाद भारत की संसद पर हमला हुआ. 2005 में पाकिस्तान के साथ कारोबार बढ़ाने पर विचार-विमर्श किया गया लेकिन मुम्बई पर आतंकी हमला और 26/11 के बाद दोनों देश फिर युद्ध के करीब आ गए.

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद सरकार ने पड़ोसी देश से निष्पक्ष रूप से शांति के प्रयास किए लेकिन पठानकोट और उरी हमले की घटनाएं हो गईं. और बाकी सब तो इतिहास की बात है.

पाकिस्तान में जमीनी हकीकत

पाकिस्तान की जो घरेलू राजनीतिक स्थिति है, वह बिल्कुल साफ दिखाई दे रही है. इसके लिए डॉन की हालिया रिपोर्ट्स का शुक्रिया किया जाना चाहिए जिसने सरकार और सेना के बीच मतभेद की खबरों को उजागर किया है.

इस तरह, एक बात तो साफ है कि भारत का मूल मुद्दा 'कश्मीर समस्या' है, सही नहीं है. मैंने 2005 और 2014 के बीच कई कांफ्रेंसों में शामिल होने के लिए पाकिस्तान की कई बार यात्रा की है. कई लोगों से मिला हूं. निश्चित तौर पर काफी चीजें उभरकर आईं हैं. 

उनमें से एक यह भी है कि गली-मोहल्लों में रहने वाला आम पाकिस्तानी यह सोचता ही नहीं है कि कश्मीर 'मूल' समस्या है. वह कहता है कि हमा पानी, बिजली, घर जैसी दिक्कतों से जूझ रहे हैं. लगता है कि इन समस्याओं को हल करने से परहेज किया जा रहा है. 

कराची में एक 'पेज-3' प्रोग्राम में कई राजनेताओं, पत्रकारों और वकीलों से मिलने का मौका मिला. सभी का मानना था कि कोई भी नागरिक सरकार को विदेशी राजनीतिक मुद्दों पर गंभीरता से नहीं लेता. सेना ही सब कुछ तय करती है. वह न केवल राजनीति पर नियंत्रण करती है, बल्कि आर्थिक नीतियों पर भी उसी का कब्ज़ा रहता है. 

एक यूनिवर्सिटी में बौद्धिक जनों के बीच दिए अपने भाषण में पीपीपी सरकार में पूर्व विदेश मंत्री रहीं हिना रब्बानी खार ने अपने भाषण में एक वाक़ये का ज़िक्र किया था. उन्होंने बताया था कि किस तरह से एक बार चीनी नेता ने उन्हें सलाह दी थी कि रिश्ते सामान्य करने के लिए यह जरूरी है कि विवादास्पद राजनीतिक मुद्दों (कश्मीर पढ़ा जाए) को कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाए और आर्थिक रिश्तों को बढ़ावा देने के लिए अन्य मुद्दों पर आगे बढ़ा जाए.

आर्थिक हालात

यह बात सच है कि दशकों से शांति बहाली की कोशिश की जा रही थी, वह नाकाम हुई है. भारत सरकार ने विश्वास बहाली के कई उपाय किए हैं जिसके चलते पिछले दशक या उससे पहले लेनदेन को बढ़ावा मिला, लोगों के आपसी सम्बंध भी इस 'मूल'  समस्या का सामाधान नहीं कर सके. वहां नागरिक सरकार और सेना आमने-सामने ही रही.

यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि साल 2001 में दोनों देशों के बीच जो कारोबार सिर्फ 150 मिलियन डॉलर था, वह साल 2014 में बढ़कर 03 बिलियन डॉलर के आसपास हो गया. अनौपचारिक या अनाधिकारिक व्यापार के इससे कम से कम दोगुना तक होने का अनुमान हैं. लेकिन पेमेन्ट मैकेनिज्म जैसे नॉन टैरिफ बैरियर्स तथा अटारी-वाघा के बीच क्रॉस बॉर्डर ट्रेड, वीजा मुद्दा जैसी कठिनाइयों के चलते ढेर सारी परेशानियां सामने आईं हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स से यह भी संकेत मिलते हैं कि यहां तक कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जब तनाव बढ़ा, तब भी व्यापार का होना जारी रहा.

कारोबार के लिए शांति या शांति के लिए व्यापार

पिछले कई दशकों से नीति 'व्यापार के लिए शांति' की रही है. फिर भी राजनीतिक संबंधों का सामान्य होना दूर का सपना ही रहा. यह केवल एक देश के लिए ही आश्चर्यजनक नहीं है जो शांति का इच्छुक रहा है, बल्कि अन्य देश के लिए भी जिसके घरेलू राजनीतिक मुद्दे द्विपक्षीय राजनीतिक प्रक्रिया से नहीं सुलझाए जा सकते.

शायद यह दौर 'शांति के लिए व्यापार' की कोशिश करने का हो सकता है. इसका संकेत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोझिकोड में दिए अपने भाषण में दिया था. उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान का आम आदमी कह रहा है कि अब आर्थिक विकास और गरीबी दूर करने के मुद्दे पर ध्यान दिया जाना चाहिए न कि युद्ध पर.

यह 'शांति के लिए व्यापार' नीति एक नई रणनीति होगी. इसमें पाकिस्तान में नए आर्थिक क्षेत्र का गठन करना निहित है. (इसमें सैन्य नेतृत्व महत्वपूर्ण घटक होगा) इसमें शामिल लोगों की रिश्तों को सामान्य करने की दिशा में रुचि का होना ज़रूरी होगा. फिलहाल, जो औपचारिक व्यापार है, उसमें भारत पाकिस्तान के साथ सरप्लस में है. भारत ने पाकिस्तान को तरजीह राष्ट्र का दर्जा दिया हुआ है, लेकिन पाकिस्तान की ओर से ऐसी कोई पहल देखने को नहीं मिली है. 

दूसरी ओर, भारत का पाकिस्तान को किया जाने वाला निर्यात घट रहा है. ऐसे में रणनीति के तहत पाकिस्तान से यह मांग दोहराई जानी चाहिए कि वह भी भारत को 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' का दर्जा दे. दरअसल, चीन के उदाहरण से यह पता चलता है कि यह रणनीति किस तरह काम करती है. वर्तमान में भारत के चीन के साथ बड़ा सीमाई मुद्दा है. उत्तरी कश्मीर में अरुणाचल से लद्दाख तक का क्षेत्र चीन ने पाकिस्तान से अधिग्रहीत किया हुआ है.

चीन से सीखें

लेकिन पिछले दशक या इससे पहले से भी, चीन हमारा बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है. भारत का व्यापार घाटा 50 बिलियन डॉलर के आसपास है. इससे भारत के अनेक आर्थिक क्षेत्रों में नाखुशी है. देखा जाए तो भारत का चीन के साथ

कारोबार एकतरफा हो चला है. हम जितना माल चीन को निर्यात कर रहे हैं, उससे लगभग दस गुना वहां से आयात कर रहे हैं. भारत को अपनी सौदेबाजी रणनीति के तहत आयात में कटौती करनी चाहिए.

हां, हमें ऐसा करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. इससे दवाओं की कीमतें (भारत अपनी जरूरत का सभी बेसिक इंसुलिन चीन से मंगाता है) बढ़ जाएंगी, टेलीकॉम सेक्टर की ग्रोथ प्रभावित होगी, आवश्यक ऊर्जा उपकरणों की लागत बढ़ जाएगी वग़ैरह-वग़ैरह. 

पाकिस्तान से राजनीतिक रूप से अलग होना शॉर्ट-टर्म की अच्छी रणनीति होगी. लेकिन लम्बे समय तक की शांति बनाने के लिए कारोबार बढ़ाना लॉन्ग टर्म रणनीति होगी, वह भी तब, जबकि राजनीतिक 'वार्ताएं' बाधित होती रही हैं. इसके लिए अब वक़्त आ गया है. इतिहास के पन्नों में कई ऐसे मामले दर्ज हैं जहां इस नीति ने काम किया है.

First published: 23 October 2016, 7:10 IST
 
मनोज पंत @catchhindi

लेखक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं विकास केंद्र में प्रोफेसर हैं

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