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क्या विश्व बैंक कानून से ऊपर है? मछुआरोंं की व्यथा यही कहती है

निहार गोखले | Updated on: 30 March 2016, 19:28 IST
QUICK PILL
  • गुजरात के मुंद्रा इलाके में टाटा द्वारा स्थापित की जा रही 4000 मेगावाट की विद्युत परियोजना को विश्व बैंक भी वित्तीय मदद मुहैया करवा रहा है.
  • स्थानीय मछुआरों की व्यथा है कि इस पॉवर प्लांट की वजह से उनका स्वास्थ्य, पर्यावरण और आजीविका सब पर संकट आन पड़ा है.
  • एक अमेरिकी जनहित संस्था ईआरआई ने मछुआरों की तरफ से अदालत में याचिका दायर कर विश्व बैंक के ऊपर आरोप लगाया है कि यह संस्था अपने ही वायदों की अनदेखी कर रही है.

क्या विश्व बैंक सभी कानूनों से ऊपर है? उसकी एक शाखा इंटरनेशनल फाइनेंस कार्पोरेशन (आईएफसी) के साथ शायद ऐसा ही है.

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी की अदालत ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि आईएफसी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता क्योंकि आईएफसी को कानूनी विशेषाधिकार प्राप्त है.

अमेरिकी अदालत गुजरात के मुंद्रा में स्थित टाटा के 4000 वाट के पावर प्लांट से जुड़े मामले पर सुनवायी कर रहा थी. इस प्लांट को आईएफसी ने भी आंशिक वित्तीय मदद की थी.

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कोयले से संचालित इस प्लांट के नजदीक रहने वाले मछुवारों ने आरोप लगाया कि इससे उनके जीविका, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ा है.

पीड़ितों ने आईएफसी पर आरोप लगाया था कि उसे इस प्लांट के नकारात्मक असर के बारे में पता था फिर भी उसने प्लांट के निर्माण के लिए 45 करोड़ डॉलर दिए थे.

अदालत के इस फैसले मछुवारों की उम्मीद को बड़ा धक्का लगा है. हालांकि ऊपरी अदालत में इस फैसले को चुनौती दी जाएगी.

विश्व बैंक की संस्था आईएफसी के खिलाफ भारतीय मछुवारे के दावे को अमेरिकी अदालत ने किया खारिज

मुछवारों की तरफ अमेरिका स्थित एनजीओ आर्थराइट्स इंटरनेशनल(ईआरआई) ने 2015 में वाशिंगटन डीसी की फेडेरल जिला अदालत में मामला दायर किया था. आईएफसी का मुख्यालय वाशिंगटन डीसी में है.

ईआरआई का दावा है कि आईएफसी को 'शुरू से ही'पता था कि इस प्लांट का स्थानीय समुदायों पर 'गहरा नकारात्मक असर' होगा.

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याचिकाकर्ताओं का दावा है कि पावर प्लांट की वजह से खारा पानी भूजल में पहुंच जा रहा है जिससे मछलियों की तादाद घट रही है. उनका ये भी दावा है कि प्लांट से उड़ने वाली राख के कारण आसपास के खेत प्रदूषित हो जाते हैं और लोगों को सांस संबंधी सस्याएं भी हो रही हैं.

इस मसले पर आईएफसी ने अपने लोकपाल कम्प्लायंस एडवाइजर ओम्बड्समैन(सीएओ) की भी बात नहीं सुनी. जुलाई 2012 कंपनी के सीएओ ने मछवारों की ज्यादातर शिकायतों को सही पाया था.

आईएफसी का कानूनी विशेषाधिकार


आईएफसी को विशेषाधिकार का बीज उसकी स्थापना में है. आईएफसी विश्व बैंक का एक अंग है.  दुनिया के 184 देश विश्व बैंक के सदस्य हैं. इन सभी देशों ने 1945 में सहमति पत्र(आर्टिक्लस ऑफ एग्रीमेंट) पर दस्तखत किए थे.

इस समझौते के तहत आईएफसी को कानूनी विशेषाधिकार प्राप्त है. सभी सदस्य देशों के लिए इस समझौते का पालन करना कानूनी बाध्यता है.

अमेरिकी जज जॉन डी बैट्स ने 24 मार्च को दिए अपने फैसले में कहा है कि विश्व बैंक और आईएफसी ने अपनी 'विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए' पहले कुछेक मामलों में इस विशेषाधिकार का लाभ नहीं लिया. इनमें वो मामले भी शामिल हैं जिनमें विश्व बैंक की किसी संस्था का 'सीधा कारोबारी संबंध' रहा हो. अदालत के अनुसार भारतीय मछुवारों का मामला ऐसे मामलों में नहीं आता.

2015 की रिपोर्ट के अनुसार विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं के कारण पूरी दुनिया में 33 लाख लोग बेघर हुए हैं

आईएफसी के वकील ने अमेरिकी अदालत में कहा कि अगर इस मामले में विशेषाधिकार में छूट दी गयी तो उसपर पूरी दुनिया से होने वाले 'मुकदमों की बाढ़' आ जाएगी. जबकि याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे आईएफसी की विश्वसनीयता बढ़ेगी.

अदालत ने उनकी बात से सहमति जताते हुए भी आईएफसी को छूट का लाभ दे दिया. जबकि ईआरआई को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की रोशनी में इस मामले में अपनी जीत का पूरा भरोसा था.

ईआरआई के रिक हर्ज़ ने फैसले के बाद जारी एक बयान में कहा, "आईएफसी द्वारा कानुुन से परे होने का दावा समस्याप्रद है, नीतिगत तौर पर भी और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के लिहाज से भी. हमें भरोसा है कि ऊपरी अदालत हमारी बात मानेगी."

फैसले का होगा दूरगामी असर


आईएफसी विकासशील देशों की निजी क्षेत्र की परियोजनाओं को वित्तीय मदद देता है. ये मदद इस शर्त के साथ दी जाती है कि परियोजना से किसी स्थानीय समुदाय या पर्यावरण पर नकारात्मक असर नहीं होगा. उम्मीद की जाती है कि आईएफसी ऐसे किसी असर की निगरानी भी करता रहेगा.

अगर इस मामले में आईएफसी पर कार्रवाई नहीं होगी तो इससे गलत नजीर बन जाएगी. कई देशों में विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं पर सामाजिक और पर्यावरण क्षति के आरोप लगते रहे हैं.

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ऐसे मामलों में नर्मदा बांध का मामला सर्वाधिक चर्चित है. इस परियोजना का विरोध कर रहे लोगों ने विश्व बैंक के लोकपाल के पास इसके खिलाफ अपील की है. जिसके बाद विश्व बैंक परियोजना से अलग हो गया.

2015 में जारी एक जांच रिपोर्ट के अनुसार विश्व बैंक ने ऐसी कई परियोजनाओं को मदद दी थी जो उसी के नियमों की अनदेखी करते थे. इस रिपोर्टि के अनुसार पूरी दुनिया में 33 लाख लोग विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं के कारण बेघर हुए हैं. इन बेघर हुए लोगों में करीब 3.8 लाख लोग भारतीय हैं.

First published: 30 March 2016, 19:28 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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