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युद्ध की ओर बढ़ते भारत-पाक और चीन

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 7 November 2016, 15:25 IST
QUICK PILL
  • भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर तनाव और सेना की हलचल में बढ़ोतरी है. 
  • बड़ा सवाल यह है कि अगर युद्ध हुआ तो किसके-किसके बीच होगा. भारत के साथ कौन होगा और पाकिस्तान के साथ कौन जाएगा?

पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर से लगती भारतीय सीमा पर सेना तैनात करना शुरू कर दिया है. रेंजरों को पीछे कर दिया गया है. चर्चा यह भी है कि, बढ़ते तनाव के मध्य दोनों देश अपने-अपने उच्चायुक्तों को भी वापस बुला सकते हैं. दिल्ली स्थित पाक दूतावास के एक अधिकारी के जासूसी में पकड़े जाने के बाद दोनों ही ओर से अधिकारी-कर्मचारियों की वापसी का सिलसिला पहले से ही चल रहा है. 

उधर चीन से भी हमारे सम्बन्ध बहुत अच्छे नहीं चल रहे. न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) में भारत को शामिल करने और जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र से आतंकी घोषित कराने के भारतीय प्रयासों का चीन जिस तरह ताल ठोककर विरोध कर रहा है, उससे दोनों के सम्बन्ध पटरी पर आते नहीं लग रहे. पिछले दिनों में जिस तरह पाकिस्तान ने सीज फायर का वायलेशन किया है वह तो और भी गौर करने लायक है. 

इसी तरह चीन भी जैसे मौका ढूंढता है, भारतीय सीमा में घुसने का. भारत से जुबानी जंग लडऩे का. देमचोक और तवांग के उदाहरण सामने हैं. पाकिस्तान ने वर्ष 2003 में खुद आगे बढ़कर जिस युद्ध विराम की घोषणा की, पिछले पांच सालों में एक-दो बार नहीं, पूरे 1100 बार उसका उल्लंघन कर चुका. चार सौ से अधिक मर्तबा तो यह वायलेशन उसने अकेले वर्ष 2015 में किया है. 

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद के महज 38 दिनों में वह अब तक 300 बार भारत पर फायरिंग कर चुका. चीन ने भले सीधे गोलियां नहीं चलाई लेकिन हर ऐसे मौके पर उसने पाकिस्तान की हौंसला अफजाई की है. कभी उसे समझाया नहीं.

दो दिन पहले ही चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यांग जिएची भारत आए. दिल्ली की बजाय हैदराबाद में अपने भारतीय समकक्ष अजीत डोवाल से मिले पर बात नहीं बनी. चीन हमारी सुनने के तैयार ही नहीं है. वैसे ही जैसे सीमाई मसलों पर पिछले 55 सालों से नहीं सुन रहा. उल्टे उसने तो पाकिस्तान में बन रहे चीन-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडोर को सिक्युरिटी कवर देने के नाम पर पाकिस्तान में अपने फौजी भी तैनात कर दिए हैं. 

युद्ध का मंडराता बादल

सारी बातों को एक साथ रखकर देखें तो स्वाभाविक रूप से एक सवाल उठता है कि, क्या भारत की यह सर्दी एक बार फिर युद्ध की सर्दी होगी? यदि यह युद्ध की सर्दी होगी तो वह युद्ध अकेले पाकिस्तान से होगा या फिर चीन भी उसमें कूद पड़ेगा? आज जो हालात दिख रहे हैं उसमें लगता है कि, युद्ध हो सकता है और वह किसी एक देश से नहीं, दोनों से हो सकता है. दोनों से इसलिए कि पाकिस्तान की नजरों में आज चीन से बड़ा उसका कोई हमदर्द नहीं है. वैसे ही जैसे 1962 की सर्दियों में चीन से हुई आमने-सामने की लड़ाई से पहले भारत सोचता था. 

हो सकता है, वैसा ही या उससे भी बड़ा कोई झटका किसी वक्त चीन पाकिस्तान को दे दे लेकिन आज की स्थिति में तो वह पाक का साथ देता ही लगता है. कारण पाकिस्तान में उसका बड़ा दांव लगा है. सीपीइसी के जरिए उसने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की पांच हजार किमी लम्बी जमीन लीज पर ले रखी है. वहीं इसी कॉरिडोर पर वह 56 बिलियन अमरीकी डॉलर भी खर्च कर रहा है.

इसके अलावा भी कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा उसने दबाया हुआ है. चीन की खुद की भारत से लगती करीब चार हजार किमी लम्बी सीमा है. पाकिस्तान की सीमा तो भारत के जम्मू-कश्मीर, पंजाब, गुजरात और राजस्थान चार राज्यों में करीब 33 सौ किमी ही है जबकि चीन की सीमा जम्मू-कश्मीर के साथ हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, अरुणाचल और सिक्किम पांच भारतीय राज्यों से लगती है. 

पाकिस्तान की सेना वैसे भी अभी बलूच और तालिबान विद्रोह के साथ अन्दरूनी झगड़ों में उलझी है. चीन की सेना पूरी तरह से फ्री है. ऐसे में भारतीय तैयारी दोनों से एक साथ निबटने की होनी चाहिए. इस बात में कोई शक नहीं कि, भारतीय सेना विश्व की सर्वोत्तम सेनाओं में है. वर्ष 1971 की लड़ाई में हमारे छोटे से नैट विमानों ने पाकिस्तानी पैटन टैंकों के छक्के छुड़ा दिए थे. वक्त के साथ हमारे संसाधन बढ़े हैं. जरूरत इन संसाधनों को और बढ़ाने और सेना का मनोबल बनाए रखने की है. 

राजनीति से रखें दूर

सेना, सरकार और समाज यानी देश, इन तीनों ही स्तरों पर यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि, हमारी सेना हमेशा की तरह मजबूत बनी रहे. हमारी सरकारों को उसे वह सब उपलब्ध कराना चाहिए जिसकी उसे जरूरत है. इसी तरह हमारे राजनीतिक दलों को उसे, ओआरओपी जैसे तमाम विवादों-राजनीति से बचा कर रखना चाहिए. खा सकें तो तमाम राजनीतिक दलों को स्वयं अपने-अपने अस्तित्व की कसम खा लेनी चाहिए कि, वह अपनी वोटों की राजनीति में सेना का नाम भी नहीं लेंगे. उसका काम देश की सीमाओं की रक्षा करना है, उसे वही करने दीजिए. नाहक ही बोफोर्स और ताबूत घोटाले जैसे विवाद खड़े कर सेना का मनोबल मत तोडि़ए. दे सकें तो चीन और पाकिस्तान की सीमाओं से लगते भारतीय क्षेत्रों में, कुछ किमी तक जमीन और हथियार देकर पूर्व सैनिकों को बसा दीजिए. आधी लड़ाई तो वे ही लड़ लेंगे.

First published: 7 November 2016, 15:25 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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