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ईशनिंदा के नाम पर सज़ा-ए-मौत कितना जायज़?

फहद सैयद | Updated on: 14 March 2016, 8:28 IST
QUICK PILL
  • मुमताज कादरी को हीरो करार देना और ईशनिंदा के नाम पर हत्या को जायज़ \r\nठहराया जाना गलत है. जो इसको सही कहते हैं, वे इस्लाम की मूल भावनाओं को \r\nनजरअंदाज कर रहे हैं
  • क्या कोई कुरान का जानकार बता सकता है कि कुरान में ऐसा कहां लिखा है की ईशनिंदा करने वाले को सजा-ए-मौत दे देना चाहिए.

सलमान तासिर के हत्यारे को फांसी के बाद एक बार फिर पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून पर बहस होने लगी है. पाकिस्तान में यह मुद्दा एक बड़ी बहस की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है.

29 फरवरी को पाकिस्तान में मुमताज कादरी को फांसी दे दी गई थी. मुमताज कादरी के ऊपर पाकिस्तानी पंजाब के पूर्व गवर्नर सलमान तासिर की हत्या करने का दोष सिद्ध हुआ था.

सलमान तासिर पाकिस्तान के कुछ प्रभावशाली और प्रगतिशील राजनेताओं में शुमार थे. उन्होंने पाकिस्तान में लागू विवादित ईशनिंदा कानून को खत्म करने का समर्थनन किया था.

कादरी को फांसी पाकिस्तान समेत सारी दुनिया में सुर्खियों में रही. लेकिन इस घटना पर पाकिस्तानी आवाम की तरफ से  के मुख्तलिफ प्रतिक्रिया सामने आई. पाकिस्तान का एक बड़ा तबका कादरी को आशिक-ए-रसुल, पाकिस्तान का हीरो करार दे रहा था.

आवाम में कादरी की लोकप्रियता का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि उसके जनाज़े के वक्त लाश के साथ सेल्फी खिंचवाने के लिए लंबी कतार लगी थी.

कादरी के जनाज़े के वक्त लाश के साथ सेल्फी खिंचवाने के लिए आवाम की लंबी कतार लगी थी

Pak-murtaza

इसके विपरीत दूसरा तबका इस घटना पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने या कोई स्टैण्ड लेने से बच रहा था. ज्यादातर पाकिस्तान की सियासी पार्टी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से मुमताज कादरी मामले में जनता की राय को समर्थन दे रही थीं.

ये अजीब विंडबना है कि एक मुस्लिम बहुल मुल्क में मुमताज कादरी को एक अपराधी और और उसके किये को गलत ठहराने के लिए कोई सामने नही आया. जबकि पाकिस्तान की अदालतों ने कादरी के किये को अपराध का दर्जा दिया था.

पढ़ें: पाकिस्तान: पूर्व गवर्नर सलमान तासिर के हत्यारे को फांसी

यह उम्मीद की एक रोशनी भी है कि पाकिस्तान की अदालत जनभावना को दरकिनार कर पाकिस्तान के कानून को प्रासंगिक बनाए रखा. कादरी के सजा-ए-मौत से सलमान तासीर कत्ल का मामला खत्म नही होता.

मुमताज़ कादरी को दी जाने वाली फांसी महज़ एक जुर्म नहीं था. विरोध और मजहब के नाम पर कानून हाथ में लेने के खिलाफ भी ये जुर्म था.

इस्लाम बनाम इस्लाम के बेजा इस्तेमाल की बहस

मुमताज कादरी की पहचान पाकिस्तान की जनता के सामने क्या होना चाहिए. उसके कानून को हाथ में लेना और उसके बाद मुमताज कादरी के पक्ष में एक बड़ी तादाद में समर्थकों का खड़ा होना और मौलानाओं के द्वारा उसके किये गये अपराध को सही साबित करना इसी मामले का एक पहलू है.

यह कत्ल करने की सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं रहता बल्कि मुस्लिम समाज की कट्टरता की छवि को उच्चतम स्तर तक पहुंचा देता है. जहां सही और गलत की बहस खत्म हो जाती है. जहां कानून और अदालत की आवाजें खामोश हो जाती है. शोर इतना होता है कि हमें मजहब का सही नजरिया पेश करने वाली तार्किक आवाजें सुनाई ही नहीं देती.

ईशनिंदा के नाम मुमताज कादरी को हीरो करार देना गलत है

मुमताज कादरी को हीरो करार देना और ईशनिंदा के नाम पर हत्या को जायज़ ठहराया जाना गलत है. जो इसको सही कहते हैं वे इस्लाम की मूल भावनाओं को नजरअंदाज कर रहे हैं, वे नजरअंदाज कर रहे हैं कुरान के अल्फाज़ को, वे नजरअंदाज कर रहे हैं अपने नबी करीम की नसीहतों को, वे नजरअंदाज कर रहे हैं ईश्वर के अस्तित्व को.

मैं भी एक आस्तिक हूं और मुमताज की कार्रवाई को गलत मानता हूं

अगर मैं गलत हूं तो आप मुझे सही कर दिजिएगा. इस्लाम के मुताबिक हर अपराध की सज़ा उस अपराध की गंभीरता के दर्जे की होनी चाहिए. यानी कोई जान ले तो उसके बदले जान लेना तार्किक लग सकता है. लेकिन एक सूरत यह भी है कि जिसके साथ अपराध हुआ वो माफी दे दें तो माफी भी है.

लेकिन क्या इस्लाम में जुर्म की सजा देने के ये सारे मानक ईशनिंदा कानून पर सही ठहराये जा सकते हैं. मैंने किसी को बाल बराबर भी नुकसान नही पहुंचाया लेकिन क्या मेरी सजा का निर्धारण मेरे नहीं किये गये कृत्य से आंका जा सकता है.

ईशनिंदा की सजा के तौर पर हत्या को जायज़ ठहराना इस्लाम के उस बुनियाद के खिलाफ क्यों नहीं है, जहां इस्लाम में सजा के आधार अपराध की गंभीरता होती है.

mumtaz

अगर आप इस बात पर यकीन करते हों की कुरान मे खुदा के फरमान साफ तौर पर कहे गये हैं तो सजाए मौत के बारे में निर्देश दिया गया होगा. क्या कोई कुरान का जानकार बता सकता है कि कुरान में ऐसा कहां लिखा है की ईशनिंदा करने वाले को सजा-ए-मौत दे देना चाहिए.

हदीस में यह दर्ज है कि पैगंबर मोहम्मद ने कभी अपना अपमान करने वाले व्यक्ति को मौत की सजा का हुक्म नही दिया था. हमारे नबी से उनका अपमान करने वालों के कत्ल करने की अनुयायियों ने इजाज़त मांगी तो नबी सल्ल ने इसकी इजाजत भी नही दी थी.

पढ़ें: ईशनिंदा कानून की समीक्षा को तैयार पाकिस्तान

दूसरी तऱफ कुरान में यह आया है, “(ए नबी सल्ल ) जो तुम्हारी हंसी उड़ाते हैं, बेशक हम तुम्हारी तरफ से उनके लिए काफी है.”

[ अल कुरान 15.95]  यानी इंशनिंदा की सजा किसी को देना पाक कुरान के हुक्म के खिलाफ है, अल्लाह कुरान पाक में नबी सल्ल से फरमाते हैं, नबी सल्ल का मज़ाक उड़ाने वालों को सज़ा देने का इख्तियार अल्लाह ने अपने हाथ में ले रखा है न कि किसी इंसान के हाथ में दिया है.

हजरत अबु हनीफा रह. ने फरमाया है कि किसी जिम्मी (इस्लामी हकुमत में गैर मुस्लिम का स्थान) का कत्ल तौहिने रिसालत के जुर्म पर नहीं किया जा सकता क्योंकि वो जिम्मी पहले से ही उससे बड़े गुनाह शिर्क का मुजरिम है.

और जब शिर्क ( ईश्वर के अस्तित्व में किसी और को साझीदार बनाना) जैसे संगीन गुनाह के लिए शरियत ने मौत की सजा नहीं दी है तो तौहिने रिसालत, जो शिर्क से कम संगीन जुर्म है इस पर मौत की सजा कैसे दी जा सकती है.

उम्मीद के मुताबिक इस सवाल का जवाब मुझे क्या मिलेगा. मुझे इसका अंदाजा है. जवाब कुछ यूं होगा कि हर बात कुरान में नहीं लिखी गई है. मिसाल के तौर पे कुरान में नमाज कैसे पढ़ा जाए इसका जिक्र नहीं है. लेकिन मेरा अगला सवाल ये होगा आप इस उदाहरण से कैसे किसी कत्ल को जायज कैसे ठहरा सकते हैं?

क्या आप उस नमाज अदा करने वाले शख्स के कत्ल को भी जायज़ करार दे सकते हैं जो नमाज सही तरीके से नहीं अदा कर रहा? उसी तरह किसी जान लेने की इजाज़त आप को कौन देता वह भी तब जब इस्लाम में सीधे-सीधे ईशनिंदा पर कुछ भी नहीं कहा गया है.

ईशनिंदा के नाम पर मौत की सज़ा को जायज ठहरा कर आप कुरान को नकार रहे हैं

इसके बावजूद अगर आप ईशनिंदा पर मौत की सज़ा थोपते हैं और उसको जायज ठहराते हैं तो मेरे मुताबिक आप भी कुरान से इंकार कर रहे हैं. और उस दलील के आधार पर यह भी ईशनिंदा के ही दर्जे में आएगा. क्या आप खुद को सजा दे पाएंगे?

मैं फिर से कह रहा हूं कि अगर मैं गलत हूं तो आप मुझे दुरुस्त कर दीजिए, लेकिन एक प्रमाणिक सबूत के साथ. क्या हमारे नबी ने कभी ये निर्देश दिया है कि उनके अपमान करने वालों को मौत की सजा दे दी जाए? क्या कभी उन्होंने इस बात का निर्देश दिया है खुदा का अपमान करने वाले को मौत के घाट उतार दिया जाए.

मुझे इस्लाम की तारीख में ऐसा ढुढ़ंने से भी नहीं मिला. और इसलिए मुझे ऐसा लगता है ईशनिंदा पर मौत की सजा को जायज करार देने वाले अपने नबी की शिक्षा को अनसुना कर रहे हैं.

pak

अगर इस घटना को भारत के पसोपेश के नजरिये से देखें तो हम पायेंगे यहां का मुस्लिम समाज भी इसी तरह की कट्टरता के इंफेक्शन से ग्रस्त है. अभी हाल ही में कमलेश तिवारी नाम के शख्स द्वारा सोशल मीडिया में पैगंमबर मोहम्मद के खिलाफ अपमानजनक बयान लिखने के बाद इसका विरोध हुआ और कमलेश तिवारी को फांसी की मांग कि जाने लगी.

पढ़ें: पाकिस्तान: कोर्ट के बाहर आत्मघाती विस्फोट में 11 लोगों की मौत, 15 घायल

उत्तर प्रदेश के लगभग दो दर्जन से ज्यादा जिलों में कमलेश तिवारी को फांसी की मांग करते हुए प्रदर्शन भी हुए. हालांकि भारत के कानून के तहत उस पर कार्रवाई हो रही है और उसके किए के लिए उसे जेल भेजा गया है, इसके बावजूद कमलेश तिवारी को फांसी की मांग मुस्लिम समाज से थमने का नाम नहीं ले रही है.

ये साबित करता है मुस्लिम समाज ईशनिंदा के प्रति कितना असहिष्णु है. उसी तरह एक उदाहरण है सलमान रश्दी की सैटनिक वर्सेज का विरोध. इसकी चपेट में पूरी दुनिया का मुसलिम समाज आया. सलमान रश्दी के मौत की सज़ा का फतवा जारी हुआ. लेकिन पूरी दुनिया में मुस्लिमों का विरोध और मौत के फतवे के बदौलत उनकी लेखक के रूप में ख्याति और बढ़ गई.

पश्चिमी मीडिया के लिए सलमान रश्दी मुस्लिम असहिष्णुता का एक बड़ा चेहरा बन गए. मुस्लिम समाज को नुकसान ये हुआ कि दुनिया में इसकी तस्वीर एक अलोकतांत्रिक, असहिष्णु धर्म के रूप में सामने आयी. हालांकि तस्वीर को जिस तरह से पेश किया गया, वैसी थी नहीं. लेकिन चंद मुस्लिम लीडरों के इस तरह फतवों की वजह से खामियाज़ा पूरे धर्म को भुगतना पड़ता है.

First published: 14 March 2016, 8:28 IST
 
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