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क्या नेपाल सचमुच चीन के करीब जा रहा है?

हरि बंश झा | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • नेपाल के प्रधानमंत्री केपीएस ओली ने अपने चीन दौरे में 10 समझौतों पर दस्तखत किए हैं. इन समझौतों ने भारत समेत पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है.
  • भारत इन समझौतों के लेकर ज्यादा परेशान नहीं हैं क्योंकि भौगोलिक स्थितियां उसके पक्ष में हैं. हालांकि चीन रणनीतिक बढ़त के लिए अतिरिक्त बोझ उठाने की क्षमता रखता है.

नेपाली प्रधानमंत्री केपीएस ओली समेत एक बड़ा तबका ये मान रहा है कि नेपाली पीएम के हालिया चीन दौरे से देश को बहुत कुछ मिला है. इस दौरान दोनों देशों के बीच 10 समझौते हुए हैं. इन समझौते में व्यापार और आवागमन को लेकर  तथा दोनों देशों के बीच रेल संपर्क मार्ग से जुड़े समझौते ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा. क्योंक इन समझौतों को प्रभाव दक्षिण एशिया क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ सकता है.

नेपाल और चीन के बीच हुए समझौते पर टिप्पणी करते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा, "नेपाल के साथ हमारा रिश्ता स्वाभाविक है. हम दूसरों से तुलना करने का काम नहीं करते."

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स्वरूप ने कहा कि दुनिया का कोई भी देश नेपाल के संग 'खास रिश्ते' में भारत की जगह नहीं ले सकता. हालांकि उन्होंने नेपाल और चीन के बीच  रेल लिंक बनाने को लेकर उन्होंने गहरी चिंता भी जतायी.

समझौता

 

चीन के साथ व्यापार समझौते के बाद नेपाल किसी तीसरे देश में वाया चीन कारोबार कर सकेगा. इसके लिए चीन ने गुआंगझाऊ बंदरगाह के इस्तेमाल की इजाजत नेपाल को दी है. चीन और नेपाल मुक्त व्यापार की संभावनाओं का संयुक्त विश्लेषण करने पर भी राजी हो गए हैं.

चीन नेपाल को पेट्रोलियम पदार्थ आपूर्ति करने के साथ ही नेपाल में पेट्रोलियम स्टोरेज के निर्माण में भी मदद करेगा. नेपाल आयल कार्पोरेशन और पेट्रो चाइना दोनों देशों के बीच मूल्य, टैक्स और ट्रांसपोर्टेशन का ब्योरा मिलकर तैयार करेंगे.

चीन और नेपाल के बीच हुए समझौतों से भारत को चिंतित होने की जरूरत नही है क्योंकि भौगोलिक स्थितियां उसके पक्ष में

चीन राशुवागादी-काठमांडू और काठमांडू-पोखरा-लुबिनी रेलवे परियोजना में नेपाल की वित्तीय और तकनीकी सहयाता करने के लिए राजी हो गया है. चीनी रेल तिब्बत के शिगात्से तक पहले ही पहुंच चुकी है. संभावना है कि 2020 तक ये नेटवर्क चीन-नेपाल सीमा पर स्थित गिरांग से जुड़े जाएगा.

नेपाल का एक वर्ग चीनी से बढ़ती नजदीकी के लिए भारत को जिम्मेदार मान रहा है. इस वर्ग को लगता है कि पांच महीने तक नेपाल में माल आपूर्ति बंद होने के पीछे भारत का हाथ था. ये वर्ग इस बात की अनदेखी कर रहा है कि ये बंदी मधेशी समुदाय ने नेपाली संविधान में उनके संग हुए भेदभाव के खिलाफ किया था.

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इस वर्ग का दावा है कि नेपाल की चीन से बढ़ती नजदीकी भारत पर दबाव बनेगा. वो दोबारा नेपाल की आर्थिक बंदी नहीं कर पाएगा.

वहीं भारत में बड़े वर्ग का ये मानना है कि नेपाल संप्रभु राष्ट्र है और उसे चीन या किसी भी देश के साथ किसी तरह का समझौता करने का अधिकार है. इसको लेकर ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है.

हानि-लाभ का सवाल


असल सवाल ये है कि नेपाल ने चीन की तरफ हाथ बढ़ाकर जो रणनीतिक कदम उठाया है वो उपयोगी होगा या नहीं. इस मुद्दे पर विचार करने के लिए हमें चीन और नेपाल के बीच की भौगोलिक दूरी को ध्यान में रखना होगा. काठमांडू और चीनी के गुआंगझाऊ बंदरगाह के बीच की दूरी 2,845 किलोमीटर है. वहीं भारत का कोलकाता तट 866 किलोमीटर दूर है. यानी चीनी बंदरगाह भारतीय बंदरगाह से तीन गुना से भी ज्यादा दूर है.

नेपाल को गुआंगझाऊ बंदरगाह से जोड़ने वाली सड़क खस्ताहाल है. इस मार्ग से माल ढुलाई बहुत महंगी पड़ेगी. नेपाल और चीन के बीच कोई भी सीमावर्ती संपर्क मार्ग सुचारू रूप से कार्यरत नहीं है. तातोपानी प्वाइंट पिछले साल भूकंप में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. वो अभी तक चालू नहीं हुआ है. चीन और नेपाल के बीच दूसरे संपर्क मार्ग की भी हालत खराब है.

नेपाल ने भारत के लिए संवेदनशील कई इलाकों के दरवाजे चीन के लिए खोल दिए हैं

यही वजह है कि नेपाल में आने वाला चीनी माल सड़क मार्ग से न आकर कोलकाता बंदरगाह के रास्ते आता है.

नेपाल ने भारत के लिहाज से काठमांडू, पोखरा से लेकर लुंबिनी तक कई संवेदनशील इलाकों के दरवाजे चीन के लिए खोल दिए हैं. नेपाल के पास इतने संसाधन नहीं है कि वो किसी दूसरे देश की इन इलाकों में गतिविधियों पर निगरानी रख सके.

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नेपाल के पहाड़ी इलाकों की ढांचागत परियोजनाओं पर भारी खर्च आएगा. ये तय है कि चीन नेपाल को इसके लिए पैसा लोन के तौर पर देगा. नेपाल जैसे गरीब देश का इतना बड़ा कर्ज लेना कहां तक जायज है? वो भी ऐसी परियोजनाओं के लिए जिनसे मिलने वाला आर्थिक लाभ सुनिश्चित नहीं है.

ऐसे में इन दोनों परियोजनाओं से नेपाल का कोई लाभ होता नहीं दिख रहा है. लेकिन चीन अपने रणनीतिक लाभ के लिए इन परियोजनाओं को बढ़ावा दे सकता है. सुस्त पड़ते आर्थिक विकास के बावजूद चीन वित्तीय और तकनीकी रूप से ऐसा करने में सक्षम है.

जब पूरी दुनिया में चीन को लेकर असुरक्षा बढ़ रही हो तो नेपाल को उससे मिलने वाले हानि-लाभ का जवाब केवल वक्त दे सकता है.

First published: 3 April 2016, 11:05 IST
 
हरि बंश झा @catchhindi

नेपाली नागरिक हरि बंश झा फिलहाल दिल्ली स्थित इंडियन काउंसिल फॉर वर्ल्ड अफेयर्स में फ़ेलो हैं.

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