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हाफ़िज़ सईद और जमात उद दावा पर पाकिस्तान की कार्रवाई दिखावा तो नहीं?

विवेक काटजू | Updated on: 1 February 2017, 7:57 IST

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंध 1267 का हवाला देते हुए पाकिस्तान ने फलाह-ए-इन्सानियत और जमात-उद-दावा दो संगठनों को अपनी निगरानी सूची में डाल दिया है. साथ ही इसके सुप्रीमो हाफिज सईद और उनके चार साथियों को आतंकवाद निरोधी कानून के अंतर्गत नजरबंद कर दिया है.

इस कदम से क्या यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार और पाकिस्तान की सेना ने अपने देश की सुरक्षा रणनीति से आतंकवाद के हथियार को हटा देने का फैसला कर लिया है. या यह सिर्फ लगातार बढ़ रहे अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे एक छद्म चाल भर है?

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी हुक्मरानों ने हाफिज सईद को नजरबंद किया है और उनकी अगुवाई में चल रहे संगठनों पर कार्रवाई की है. पाकिस्तान ने 2001 में संसद पर हमले के बाद उन्हें गिरफ्तार किया था. 2006 में मुंबई में ट्रेन बम विस्फोट के बाद भी उन्हें गिरफ्तार किया गया था और लश्करे ए तैयबा द्वारा किए गए 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमले के बाद भी. सभी मामलों में या तो पाकिस्तान के अधिकारियों ने उन्हें छोड़ दिया या फिर वह कोर्ट के ऑर्डर से रिहा हो गया.

कन्नी काटता पाकिस्तान

हकीकत यह है कि पाकिस्तान के हुक्मरान उनकी जमीन-जायदाद आदि के खिलाफ किसी तरह की इरादतन कार्रवाई से बचते रहे हैं. साथ ही ध्यान देने की बात यह है कि उन्होंने लश्कर ए तैयबा के खिलाफ तो कार्रवाई की जिसके असली नेता हाफिज़ सईद थे पर उन्होंने इसके संगठन को नये नाम के साथ चलने से नहीं रोका. बदतर यह कि पाकिस्तान के नेताओं ने जमात उद दावा के चैरिटेबल संस्था होने का दावा किया.

हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र की 1267 आतंकवादी सूची में 2008 में डाला गया था. पिछले पांच सालों में उन्हें अमेरिका समेत कई और देशों ने आतंकवादी घोषित किया है. इसके बावजूद पाकिस्तान में वह आजाद घूमते हुए भारत के खिलाफ निंदात्मक और जहरीले बयान देते रहे हैं. लोगों को भारत के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए उकसाते रहे हैं. 

पाकिस्तान ने लश्करे ए तैयबा को छुपे रूप में और जमात उद दावा को खुले आम कश्मीर में जिहाद छेड़ने के लिए पैसे जमा करने और युवाओं को भर्ती करने की छूट दे रखी है. पाकिस्तान की सेना के संरक्षण और सेना व इंटलिजेंस एजेंसी आईएसआई की सहायता से लश्करे तैयबा के आतंकवादियों को कश्मीर और देश के दूसरे भागों में घुसपैठ कराई जाती है जिससे कि वे भारत में हिंसात्मक वारदातों को अंजाम दे सकें. 

कश्मीर हिंसा में भूमिका

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले साल जुलाई में आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद जो विरोध-प्रदर्शन कश्मीर में हुए, उनको भड़काने में सईद का ही हाथ था. इन सबके बावजूद पाकिस्तान इतने वर्षों से हाफिज सईद और जमात पर कार्रवाई की भारत, अमेरिका और अन्य देशों की मांग को अनसुनी करता रहा है. लेकिन आखिर अब क्यों पाकिस्तान ने यह कदम उठाया है ?

दरअसल पाकिस्तानी मीडिया के एक हिस्से में इस तरह की खबरें आई थीं कि अमेरिका ने पाकिस्तान को आर्थिक क्षेत्र में कार्रवाई और प्रतिबंध की चेतावनी दी थी अगर वह जमात के खातों में पैसे की आवक पर रोक नहीं लगाता है. अमेरिका की यह धमकी एक एशिया-प्रशांत सागर मनी लॉन्ड्रिंग समूह की उस रिपोर्ट के बाद आई थी जिसमें यह कहा गया था कि पाकिस्तान आतंक का वित्तीय पोषण रोकने के लिए आतंकवादियों की संपत्ति जब्त करने और उनके खातों पर रोक लगाने आदि की जरूरी कार्रवाई नहीं कर रहा है. 

अगर अमेरिका अपनी धमकी को अंजाम देता है तो पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन में समस्याएं खड़ी हो सकती हैं. रोचक यह है कि इस समूह में चीन ने पाकिस्तान के साथ खड़े होने की कोशिश की पर वह अमेरिका और भारत के विरोध के आगे टिक नहीं सका.

परेशान पाकिस्तान

पाकिस्तान को यह चेतावनी ट्रंप के राष्ट्रपति का कार्यभार ग्रहण करने के पहले दी गई थी. अब जब ट्रंप आतंकवाद पर अपरंपरागत और विवादास्पद तरीके से कदम उठा रहे हैं तो पाकिस्तान में चिंता पैदा हो गई है: इसलिए अब पाकिस्तान ने हाफिज सईद पर कार्रवाई की है. साथ ही पाकिस्तान निश्चित रूप से यह भी जानता होगा कि ट्रंप का मुख्य फोकस पाकिस्तान द्वारा तालिबान तथा हक्कानी नेटवर्क को दिया जा रहा समर्थन होगा. 

अफगानिस्तान में चल रहे संघर्ष में इन संगठनों की प्रमुख भूमिका है. लश्कर ए तैयबा भी अफगानिस्तान में दखल रखता है लेकिन इसका मुख्य फोकस भारत में विशेष रूप से कश्मीर है. पाकिस्तान का सदाबहार दोस्त चीन आतंकवादी संबंधी मुद्दों पर उसकी ढाल बनता आया है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत के उन प्रयासों का चीन के द्वारा विरोध करना है जिसमें यूएन की आतंकवाद पर बनी कमेटी से जैश ए मुहम्मद के नेता मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करवाना है. 

इस तरह की रिपोर्ट भी हैं कि चीन पाकिस्तान को यह मशविरा आतंकवादियों पर कार्रवाई करने का मशविरा दे रहा है. साथ ही चीन पाकिस्तान में चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर बनाकर अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंध गहरे कर रहा है. वह जानता है भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे संबंध इस कॉरिडोर के लिए फायदेमंद होंगे. 

भारत ने लगातार कहा है कि जमात पर प्रतिबंध लगे तथा हाफिज सईद की गतिविधियों पर रोक लगाई जाए. लेकिन पाकिस्तान की सेना यह सुनिश्चित करती आई है कि भारत की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाए. सिर्फ यही नहीं, नवाज शरीफ खुद कश्मीर मुद्दे पर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर चुके हैं. उन्होंने उन लोगों के प्रति सहानुभूति भी जाहिर की थी जो कि भारत में आतंकवादी भेजते हैं. 

हालांकि पिछले कुछ सालों में नवाज शरीफ यह समझ चुके हैं कि पाकिस्तान का आर्थिक भविष्य भारत के साथ अच्छे संबंधों में निहित है. साथ ही पाकिस्तान इस दाग का मिटाना चाहता है कि पाकिस्तान आतंकवाद का वैश्विक केंद्र है और पाकिस्तान में अतिवादी विचार बिना किसी रोकथाप के फैलने दिए जाते हैं.

छवि निर्माण की कोशिश

पाकिस्तान की छवि मॉडरेट इस्लामिक राज्य की बनाने के लिए पिछले दिनों नवाज शरीफ ने महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थस्थल कटासराज की भी यात्रा की थी. वहां उन्होंने निर्देश दिए कि इसकी उचित देखभाल की जाए. नवाज शरीफ ने पिछले दिनों कायदे ए आजम विवि के फिजिक्स सेंटर का नाम अब्दुस सलाम के नाम रखा था. 

मालूम हो कि पाकिस्तान के एक मात्र नोबेल पुरस्कार विजेता अब्दुस सलाम को पाकिस्तान में इसलिए ही उचित तवज्जो नहीं मिली की वे अहमदी थे. इन दोनों कदमो ने पाकिस्तान के रुढ़िवादी मुस्लिमों को नाराज कर दिया है.

राहील शरीफ के बाद नवंबर 2016 में पाकिस्तान के नए आर्मी चीफ बनने वाले कमर बाजवा ने पाकिस्तानी सेना का भारत के प्रति परंपरागत रुख बनाए रखते हुए भी सीमा पर विवाद को ठंडा करने की कोशिश की है. हाफिज सईद पर कार्रवाई में शरीफ सरकार के साथ खड़े होने में भी पाकिस्तान सेना ने व्यवहारिकता का परिचय दिया है. 

चुनी हुई सरकार और सेना दोनों इस समय यह दिखाना चाहते हैं कि भारत आक्रामक और नकारात्मक रुख अपनाए हुए है जबकि पाकिस्तान इस तरह के कदम उठा रहा है कि जिससे दोनों देशों में बातचीत का माहौल बन सके. पाकिस्तान इस तरह से नए अमरीकी प्रेसीडेंट पर अपनी छाप छोड़ना चाहता है.

भारत के लिए हाफिज सईद पर कार्रवाई तभी किसी प्रकार से सार्थक होगी जब इसके बाद पाकिस्तान दूसरे आतंकवाद समूहों जैसे हिज्बुल मुहाहिदीन तथा जैश ए मुहम्मद पर कोई कार्रवाई करता है. साथ ही इसका जमीन पर असर घुसपैठ रोकने की कोशिशों के रूप में दिखना चाहिए. 

इसके अतिरिक्त दूसरे मोर्चों जैसे भारत के साथ व्यापार संबंध सामान्य बनाने की दिशा में इसका प्रतिफलन होना भी जरूरी है. अगर ऐसा नहीं होता है तो भारत पाकिस्तान की इस कोशिश को तात्कालिक और छद्म मानते हुए पाकिस्तान के साथ बातचीत में अपना वर्तमान रुख बनाए रख सकता है और न ही भारत को अपने इस रवैये को जगजाहिर करने में हिचकना चाहिए.

First published: 1 February 2017, 7:57 IST
 
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