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कराचीः एमक्यूएम का किला हिला लेकिन जड़ें अब भी गहरी

द कन्वर्सेशन | Updated on: 31 August 2016, 7:55 IST
(फाइल फोटो)
QUICK PILL
  • तीन दशक के दौर में पहली बार कराची में मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) को पाक अधिकारियों और अंदरूनी सत्ता परिवर्तन से कड़ी चुनौती मिल रही है. 
  • कराची की जनसंख्या 2.3 करोड़ है. 2030 तक यह दुनिया का सातवां सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर होगा. इसे दुनिया का सबसे खतरनाक शहर भी कहा जाता है. 
  • अल्ताफ हुसैन ने एमक्यूएम का गठन 1978 में किया था. यह संगठन 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान पहुंचे उर्दू भाषी मुहाजिरों का प्रतिनिधित्व करता है.
  • एमक्यूएम को जहां मुहाजिरों का समर्थन प्राप्त है, वहीं पाकिस्तान तालिबान टीटीपी को दक्षिणी वजीरिस्तान, स्वात, खैबर पख्तूनवा और आदिवासी इलाकों के पश्तों का.

कराची जैसे जटिल और हिंसक पाकिस्तानी मेट्रो शहर की राजनीति इन दिनों मुश्किल दौर से गुजर रही है. शहर की राजनीति में पिछले तीन दशकों से केंद्र में रही मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) को पाक अधिकारियों और अंदरूनी सत्ता परिवर्तन से कड़ी चुनौती मिल रही है.

एमक्यूएम नेता अल्ताफ हुसैन 1990 के शुरुआती दिनों से ही लंदन में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं. उनके उप नेता मानसिक तनाव की आड़ लेकर उन्हें दरकिनार करने में लगे हैं और पार्टी के नवनिर्वाचित कराची मेयर उग्रवादियों और अपराधियों की सहायता करने के आरोप में जेल में सजा काट रहे हैं.

इस बीच, पाक सेना कराची में एमक्यूएम के खिलाफ जबबर्दस्त अभियान चला रही है, जबकि अन्य राजनीतिक दल पार्टी पर आतंकियों की तरह ही प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, कराची की शहरी जनसंख्या 2.3 करोड़ है और 2030 तक इस शहर की आबादी दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी आबादी बन जाएगी. इसे दुनिया का सबसे खतरनाक शहर भी कहा जाता है.

एमक्यूएम नेता अल्ताफ हुसैन 1990 के शुरुआती दिनों से ही लंदन में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं.

1980 से लेकर एमक्यूएम ने कराची शहर को हिंसा और अपराध की गिरफ्त में जकड़ कर रख दिया है. हुसैन ने इस पार्टी का गठन 1978 में एक छात्र गुट के तौर पर किया था. यह छात्र संगठन 1947 के दौरान बंटवारे के बाद भारत से पाकिस्तान पहुंचे उर्दू भाषी मुहाजिरों या विस्थापितों का प्रतिनिधित्व करता है.

इसके गठन के बाद से ही हुसैन यहां इसके एकछत्र बादशाह बन गए. कराची पर उसकी मजबूत पकड़ के चलते उन्हें प्रसिद्धि भी मिली और उसके हाथ में एक तरह से कराची की राजनीति का रिमोट कंट्रोल आ गया. कुछ ही समय बाद हुसैन 1992 में लंदन में शरणार्थी के तौर पर शरण ले ली. उस वक्त भी कराची में एमक्यूएम के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जा रही थी.

वह लंदन से ही कराची में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को निर्देश देते हैं. वह लंदन में बैठे-बैठे कराजी की जिंदगी ठप करवा सकते हैं और आतंक का खौफ दिखाकर पाकिस्तान के इस सबसे बड़े व्यावसायिक शहर को ठप कर सकते हैं.

2007 की एक घटना इसके आतंक की बानगी है. ‘काला शनिवार’ के नाम पर हुए दंगों में दर्जनों लोग मारे गए थे. हिंसक घटनाओं में एमक्यूएम के कई कार्यकर्ता पकड़े गए लेकिन पाक अदालतों में न्याय बहुत कम होता है.

सितम्बर 2010 में एमक्यूएम के एक संस्थापक इमरान फारुक की लंदन में हत्या कर दी गई. माना जा रहा है कि नेतृत्व को लेकर हक की लड़ाई में हुए संघर्ष में उनकी हत्या हुई. ब्रिटिश पुलिस मनी लॉन्ड्रिंग और इमरान फारुकी की हत्या के मामले में एमक्यूएम की संलिप्तता की जांच कर रही है. परन्तु इसकी गति बहुत ही धीमी है.

एक भयावह सप्ताह

अगस्त माह के अंतिम दिनों में घटे घटनाक्रम में पार्टी के खिलाफ लगे प्रतिबंध को पुनः संशोधित किया गया. इसके नेताओं पर पाक में बगावत फैलाने का आरोप है. 22 अगस्त को हुसैन ने टेलीफोन पर लंदन से अपने समर्थकों और कराची प्रेस क्लब के बाहर भूख हड़ताल कर रहे प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया था.

हालात उसके बाद से ही बिगड़े. उसने अपने कार्यकर्ताओं को सरेआम कहा कि वे कराची में मीडिया कार्यालयों पर हमला करें. हालांकि कराची और पाकिस्तान में आतंकियों द्वारा मीडिया का दमन बहुत ही आम बात है. इस जबर्दस्त हिंसा के बाद अगले दिन कई एमक्यूएम कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.

दूसरे राजनीतिक दल पाक टीवी चैनलों पर यह मांग करते दिखाई दिए कि एमक्यूएम को पाक के लिए खतरा मानते हुए इस पर पाबंदी लगानी चाहिए.

एमक्यूएम भारत से पाकिस्तान पहुंचे उर्दू भाषी मुहाजिरों या विस्थापितों का प्रतिनिधित्व करता है.

उल्लेखनीय है कि कराची के पूर्व मेयर और एमक्यूएम में नंबर दो पर माने जाने वाल फारूख सत्तार ने घोषणा की कि हुसैन के ज्वलंत बयानों से लगता है कि वे लंबे मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, इसलिए पाक में एमक्यूएम का संचालन स्थानीय स्तर पर ही किया जाएगा. सत्तार का यह कदम अनुमानित था लेकिन यूके में बैठे अपने नेता को दरकिनार करना उनके लिए अनपेक्षित और खतरनाक कदम है.

उसके बाद 24 अगस्त को एमक्यूएम उम्मीदवार वसीम अख्तर कराची के मेयर चुने गए. आतंक संबंधी आरोपों के चलते अख्तर जेल में है. नए मेयर ने शहर का कामकाज चलाने के लिए जेल के अंदर ही ऑफिस बनाने की मांग की है.

इस बीच लंदन में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए हुसैन ने कराची का कामकाज एमक्यूएम में उपनेता सत्तार को सौंप दिया. हुसैन के पोस्टर अब उतारे जाने लगे हैं और एमक्यूएम के ऑफिसों पर ताला लगाया जा रहा है.

बढ़ती हिंसा

2005 के बाद से कराची पर एमक्यूएम का नियंत्रण वैसे ही कम होने लग गया था और रियल एस्टेट कारोबार तेजी से बढ़ रहा था, जो कि बड़े पैमाने पर भू उपयोग परिवर्तन और शक्तिशाली राजनेताओं के अधीन हो रहा था. तभी से पाक में पाकिस्तान तालिबान (टीटीपी) का उदय हुआ और बमबारी व हिंसा के चलते एमक्यूएम के गढ़ सहित उसकी पैठ कराची के पड़ोसी पश्तो इलाके में तेजी से बढ़ने लगी.

एमक्यूएम को जहां उर्दू भाषी मुहाजिरों का समर्थन प्राप्त है, वहीं टीटीपी को दक्षिणी वजीरिस्तान, स्वात, खैबर पख्तूनवा इलाके और आदिवासी इलाकों के पश्तों का. 2012 के बाद से कराची का ज्यादातर पश्तो इलाका टीटीपी के प्रभाव क्षेत्र में आता गया है.

2008 से 2013 के बीच जब पाकिस्तान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का राज था, उस दौरान कराची में हिंसक वारदातें बढ़ गई थीं. पीपीपी सशस्त्र बल प्रकोष्ठ, पीएसी, एमक्यूएम और तालिबानी गुट संगठित अपराधों से होने वाले फायदों के लिए आपस में उलझ जाते थे. इन सबके बीच एमक्यूएम को मुहाजिरों से लगातार मिल रहे समर्थन ने उसकी कराची पर पकड़ मजबूत बनाए रखी.

2012 के बाद से कराची का ज्यादातर पश्तो इलाका टीटीपी यानी पाकिस्तान तालिबान के प्रभाव क्षेत्र में आता गया.

इस बीच लंदन में हुसैन के लिए मुश्किलें बढ़ती गई. 2013 के आम चुनाव जो कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने जीते और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पार्टी की वरिष्ठ नेता जाहरा शाहिद की लंदन में हत्या कर दी गई. खान ने इस हत्या का आरोप हुसैन पर लगाया और यूके सरकार पर इसे संरक्षण देने का.

खैर, लंदन में एमक्यूएम पर लगे मनी लॉन्ड्रिंग सहित अन्य आरोपों पर बात स्थगित कर दी गई है. वहीं, कराची में अस्थिरता पैदा करने के लिए भारतीय बलों के साथ साझेदारी करने का अनुमान लगाया जा रहा है. ब्रितानी राजनताओं का कहना है कि हुसैन को हिंसा फैलाने के लिए ब्रिटेन की धरती का इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए.

बर्बादी के बीज

एमक्यूएम ने कराची में 1988 के बाद के सारे चुनाव जीते हैं. यह केंद्र की सत्ता को भी प्रभावित करती है. इसलिए अगर मौजूदा कठिन हालात को छोड़ दिया जाए तो एमक्यूएम के कराची में लंबे समय तक टिके रहने की संभावना है.

हालांकि पार्टी चुनाव आयोग में फारुक सत्तार के नाम से दर्ज है लेकिन पार्टी के कार्यकर्ता हुसैन के नाम पर शपथ लेते हैं.

First published: 31 August 2016, 7:55 IST
 
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