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ट्रंप को यह बात याद रखनी चाहिए कि इस्लामिक स्टेट किसकी ईजाद है

रवि जोशी | Updated on: 14 February 2017, 10:12 IST
(कैच न्यूज़)

20 जनवरी को राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालने के बाद अमरीका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने जितने एग्जिक्यूटिव आॅर्डर दिए हैं उनमें से सबसे महत्वपूर्ण और विवादित वह आॅर्डर है जिससे ईरान, इराक, सीरिया, लीबिया, सोमालिया, यमन और सूडान में रहने वाले लाखों लोगों का जीवन प्रभावित होता है.

इस आदेश के जरिए अमेरिका में रैडिकल इस्लामिक आतंकवादियों के प्रवेश को रोकने के लिए इन देशों पर अस्थाई रोक लगाई गई है. किस आधार पर यह निर्णय लिया गया? क्या स्टेट डिपार्टमेंट या पेंटागन ने ऐसी कोई सूची तैयार करके दी है जिसमें यह बताया गया हो कि इन देशों से कितने आतंकवादी अमेरिका में घुसे हैं? अथवा ऐसी कोई सूची हो जिससे यह पता चलता हो कि इन देशों के नागरिकों ने अमेरिका की जमीन पर अथवा विदेश में अमेरिकी हितों के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया है.

इसके विपरीत इन सात में से पांच देश इराक, लीबिया, सोमालिया, यमन और सूडान पर या तो अमेरिका ने आक्रमण किया है या फिर इन पर अपने युद्धक विमानों और ड्रोन से छद्म हमले किए हैं. कुछ को तो अमेरिका ने अपने मित्र देशों के साथ मिलकर पूरी तरह तबाह कर दिया है. इतना ही नहीं अब ट्रंप के विदेश सचिव ने ईरान को नोटिस दिया है कि अमेरिका उस पर हमला कर सकता है.

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि ट्रंप के एग्जिक्यूटिव आॅर्डर न तो स्टेट डिपार्टमेंट के किसी इनपुट पर आधारित थे और न ही पेंटागन से मिले किसी रिपोर्ट पर आधारित. ये सभी आॅर्डर ट्रंप के मुख्य रणनीतिकार स्टीव बैनन और उनके सहयोगियों ने मिलकर तैयार किया था. ये ऐसे लोग हैं जो कट्टर ईसाई मूल्यों से प्रभावित हैं और कथित रैडिकल इस्लाम के प्रति उनके मन में घृणा कोई छिपी बात नहीं है. इनकी साफ सोच है कि कुछ मुस्लिम देश दुनियाभर में आतंकवाद निर्यात कर रहे हैं.

कौन तय करेगा रैडिकल

बिल्कुल ठीक. इस्लामिक दुनिया भीतर और इसके बाहर भी एक बड़ी आबादी ऐसे लोगों की है जो 'रैडिकल इस्लाम' के प्रबल विरोधी हैं. इनके चलते ऐसी सोच को बल मिलता है जिस पर पल कर अल—कायदा, तालिबान और इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन खड़े हुए हैं.

लेकिन सवाल यह है कि इस तरह के संगठन क्या सिर्फ 'रैडिकल इस्लाम' के ही सहारे खड़े हो गए या फिर उनको काफी सोच—विचार, प्रयास और संसाधनों के साथ स्टेट की खुफिया एजेंसियों द्वारा खड़ा किया गया? ऐसा करने वाले स्टेट कौन-कौन से हैं?

यह भलीभांति स्थापित तथ्य है जिसे दोहराने की जरूरत नहीं है कि दुनिया के पहले मुजाहिदीन समूह को सीआईए और आईएसआई ने मिलकर तैयार किया था. 80 के दशक के मध्य में अफगानिस्तान में ईश्वरीय सत्ता को नकारने वाले कम्युनिस्ट साम्यवादियों से लड़ने के लिए सउदी अरब ने भी उतना ही फंड मुहैया कराया जितना कि सीआईए ने.

इन 'पाक योद्धाओं' के एक प्रतिनिधिमंडल का अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने व्हाइट हाउस में बाकायदा स्वागत किया था. बता दें कि वही रोनाल्ड रीगन आज के ट्रंप के प्रेरणास्रोत हैं. तब उस दौर में ये 'पाक योद्धा' तत्कालीन सोवियत संघ के लिए आतंकवादी थे, आज ये खुद को खड़ा करने वाले अमेरिका के दुश्मन नंबर एक हैं.

पीड़ित या पीड़क

अलकायदा और तालिबान दोनों ही इस्लामिक मुजाहिदीन समूहों की शाखाएं थीं जिनको सोवियत विरोधी युद्ध के दौरान खड़ा किया गया. गुप्तचर एजेंसियों के हाथों में बिना किसी जवाबदेही के बड़ी मात्रा में, आसानी से उपलब्ध पैसे और हथियारों की वजह से इसके बाद ऐसे तमाम समूह खड़े हुए जिन्होंने अपने पड़ोसी देशों के खिलाफ एक छद्म युद्ध छेड़ दिया.

जहां पाकिस्तान ने इन आतंकवादियों का इस्तेमाल अफगानिस्तान और भारतीय कश्मीर में किया वहीं खाड़ी देशों में इस्लाम के नाम पर इराक, सीरिया और लीबिया में लड़ने के लिए कई आतंकवादी समूह खड़े किए गए.

हैरान करने वाली बात यह है कि ट्रंप प्रशासन ने हकीकत में आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों जैसे पाकिस्तान और सउदी अरब, जिनके नागरिकों की भूमिका 9/11 के हमले में सिद्ध हो चुकी है, को निगरानी सूची में डाला है. इसके विपरीत उन देशों को जो इस आतंकवाद से पीड़ित हैं, उनको प्रतिबंधित सूची में डाला है.

इराक ऐसा ही एक देश है जिसने किसी आतंकवादी का निर्यात नहीं किया बल्कि वह खुद जॉर्ज बुश जूनियर की उस आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का पीड़ित देश है, जिसमें बुश ने अपने पिता के अधूरे कार्य को अंजाम दिया. इस रणनीति के तहत अमरीका के लिए नहीं बल्कि सउदी राजशाही के लिए खतरा बन रहे सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाया जाना था.

इस युद्ध के कारण बगदाद में जो सत्ताशून्यता की स्थिति पैदा हुई उसके कारण इराक की सड़कों पर सउदी अरब समर्थित सुन्नी और ईरान समर्थित शियाओं में हिंसक संघर्ष की स्थितियां आज आम बात हो गई हैं.

इस अव्यवस्था के चलते पैदा हुई अराजकता ने अब तक के सबसे बर्बर आतंकी समूह को जन्म दिया जिसे खाड़ी के राजघरानों में बंटे देशों से फंड, हथियार और समर्थन मिल रहा है. खबर है कि कतर की राजशाही सीरिया में प्रॉक्सी वार के लिए अपना नया आतंकी समूह खड़ा कर रहा है जिनके नाम जबहत उल नुस्रा तथा अहरर अल शाम हैं.

कहां जाता है पैसा

सउदी अरब तथा यूएई के रक्षा खर्च पर एक सरसरी निगाह से भी स्तब्ध करने वाले खर्च के ब्योरे सामने आते हैं. रक्षा खर्च पर 87 अरब डॉलर खर्च करने वाले सउदी अरब दुनिया के कुछेक शीर्ष रक्षा खर्च करने वाले देशों में शुमार है.

सउदी का रक्षा खर्च 2006 से 2015 के बीच दो गुना हुआ है वहीं यूएई 23 अरब डॉलर सालाना रक्षा खर्च के साथ दुनिया में 14वें नंबर पर था और इसके रक्षा खर्च में 2006 से 2015 के बीच 130 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. आखिर यह सारा सैनिक साजो सामान जा कहां रहा है.

लंदन के द इंडिपेंडेंट समाचार पत्र में पैट्रिक कॉकबर्न की प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 2013 तक सीरिया में आतंकी गुटों को मदद करने के मामले में सउदी अरब ने कतर को पीछे छोड़ दिया था. 2014 में सउदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बना हुआ था. अब इसे क्षेत्र में अपनी ताकत दिखानी थी.

2014 में ही आईएसआईएस जिसे बाद में इस्लामिक स्टेट कहा गया, ने सारी दुनिया में खौफ पैदा करते हुए इराक के अनवर प्रांत के सबसे बड़े शहर मोसुल पर कब्जा कर लिया. सउदी अरब ने जल्दबाजी में अमरीका समेत 10 देशों का गठबंधन बनाकर मार्च 2015 में यमन के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. जबकि अधिकांश अन्य दूसरे देशों, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है, ने इस गठबंधन में अपना नाम शामिल किए जाने पर हैरानी जताई.

दरअसल सुन्नी इस्लाम की बादशाहत वाले सउदी अरब को अपने परंपरागत दुश्मनों को सख्त संदेश भेजने के लिए यह जरूरी था वह इराक में शिया प्रभाव को सीमित करे तथा यमन में ईरान समर्थित होइथी विद्रोहियों को सबक सिखाए.

शांति स्थापना की जद्दोजहद

पिछले साल जब रूस ने ईरान के साथ मिलकर खुलेआम इस्लामिक स्टेट के खिलाफ संघर्ष की घोषणा की तब नाटो गठबंधन के सदस्य देश तुर्की ने रूस के इस हस्तक्षेप का विरोध किया और बात यहां तक पहुंच गई कि तुर्की ने एक रूसी हवाई जहाज को अपनी हवाई सीमा में उड़ने के आरोप में मार गिराया.

इसके बाद तुर्की ने रूस से अपने संबंध तो सुधार लिए जबकि राष्ट्रपति एरडोगन द्वारा एक दिखावे के तख्तापलट के चलते उनको अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में गैर जरूरी बना दिया.

रूस के हस्तक्षेप का खाड़ी के राजशाही वाले देशों ने भी तीखा विरोध किया था क्योंकि इससे उन्हें डर पैदा हो गया था कि अब इस क्षेत्र में उनके सबसे शक्तिशाली सुन्नी आतंकी समूह को बमबारी कर जमींदोज कर दिया जाएगा, जो कि अब तक अमरीका और मित्र देशों की दिखावटी बमबारी से बचा हुआ था.

जब भी इस्लामिक स्टेट और कतर के आतंकी समूहों को सीरिया में अस्तित्व का खतरा पैदा हुआ तब—तब अमरीका के विदेश सचिव जॉन केरी ने शांति का राग गाया और रूस के विदेश सचिव सर्गेइ लेवरोव के साथ अंतहीन और उद्देश्यहीन वार्ता में जुट गए जिससे कि उन आतंकी समूहों को बचने और फिर से एकजुट होने का मौका मिलता रहा. इस तरह से इस्लामिक स्टेट, जो कापी कमजोर हो चुका था इसके बावजूद बचा रहा.

खुद के खड़े किए गए भस्मासुर

राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को यह समझना होगा कि इस्लामिक स्टेट समेत अधिकांश आतंकी समूहों को अमेरिका के मित्र देशों विशेषकर पाकिस्तान और अरब के देशों ने ही खड़ा किया है. इसलिए वे कैसे आतंकवादियों से लड़ सकते हैं जब तक कि उन्हें यह पता न हो कि क्षेत्र विशेष में कौन उनके दोस्त हैं और कौन उनके दुश्मन.

अब राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका की दशकों पुरानी विदेश नीति को पलटते हुए रूस के साथ मिलकर इस्लामिक स्टेट से लड़ने की बात कर रहे हैं. क्या उन्हें ऐसा करने दिया जाएगा. क्या इस्लामिक स्टेट का खात्मा सऊदी अरब और इज़राइल के हित में होगा. क्या सउदी अरब और इज़राइली लॉबी वॉशिंंगटन में इतनी कमजोर हो चुकी है?

निश्चित रूप से नहीं. अगर प्रतिबंधित किए गए देशों की सूची से कोई संकेत मिलता है तो वह यही कि एग्जिक्यूटिव आॅर्डर में इन देशों का प्रभाव स्पष्ट है.

(लेखक पहले कैबिनेट सचिवालय में रह चुके हैं)

First published: 14 February 2017, 10:12 IST
 
रवि जोशी

Retired diplomat, presently a Visiting Fellow, Observer Research Foundation.

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