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इंटरनेट पर बढ़ रही है शरणार्थियों से जुड़े पोर्न की मांग

दुर्गा एम सेनगुप्ता | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

आपको सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन शरणार्थी समस्या अब बेडरूम तक पहुंच चुकी है. कारण? इंटरनेट पर लाखों ऐसे लोग हैं जिन्हें असमान्य टैबू पोर्न देखना पसंद है.

और ऐसा पोर्न सबसे लोकप्रिय पोर्न वेबसाइटों पर उपलब्ध हो तो उनकी पहुंच का अंदाजा लगाया जा सकता है.

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जी हां, पोर्न वेबसाइटों पर सीरियाई शरणार्थी पोर्न सर्च करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. गूगल पर पोर्न के आदी सीरियाई शरणार्थी के साथ नेकेड, पोर्न और रेप जैसे सर्च वर्ड के साथ ऐसे पोर्न खोज रहे हैं. 

संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएससीआर के अनुसार पूरी दुनिया में देश के अंदर और बाहर बेघर हुए लोगों की संख्या करीब 6.5 करोड़ है. इसका अर्थ है कि हर 113वां व्यक्ति बेघर है और उसने कहीं और शरण ले रखी है.

शरणार्थी पोर्न में क्या है

शरणार्थी पोर्न में मुसीबत की मारी लड़कियों और महिलाओं, जो शायद आपकी भाषा बोलना नहीं जानतीं, उन्हें अपनी दैनिक जरूरत से जुड़ी मदद के बदले में सेक्स करते हुए दिखाया जाता है.

ये जरूरत सिर छिपाने के ठिकाने की हो सकती है या नगद पैसे या किसी भी अन्य चीज की. यानी इसमें किसी शरणार्थी की मजबूरियों की सौदेबाजी की जाती है.

कोई पोर्न क्यों देखता है ये विद्वानों के लिए अध्ययन का विषय रहा है. सबसे प्रचलित धारणा है कि यौन सुख पाने के एक वैकल्पिक तरीका है. जिज्ञासा भी पोर्न देखने का एक कारण हो सकती है. पोर्न देखने की आदत का हमारे सामाजिक वातावरण या आज के समय में सोशल मीडिया से संबंध हो सकता है. 

शरणार्थियों से जुड़े पोर्न में उनके द्वारा जमीन, रोजगार और औरतों पर कब्जा कर लेने का भय प्रतिबिंबित होता है

लेकिन ये समझना मुश्किल है कि आखिर पोर्न देखने वाले अचानक ही दुनिया के सबसे पीड़ित-वंचित-असहाय शरणार्थियों से जुड़ा पोर्न क्यों देखना चाह रहे हैं? और उसमें भी सबसे अमानवीय 'शरणार्थियों के बलात्कार' से जुड़े पोर्न क्यों?  

'अच्छी शरणार्थी नीति को सामाजिक न्याय की आवश्यकता'

शरणार्थियों से जुड़े पोर्न में सबसे ज्यादा पोर्न बलात्कार से जुड़े हैं. इनमें आम तौर पर पुरुष शरणार्थी महिला शरणार्थी का बलात्कार करता दिखता है.

बलात्कार करने वाला शरणार्थी पुरुष 'गोरी' महिला की कातर चीख-पुकार को निर्दयता से अनसुना कर देता है.

क्या आपको नहीं लगता कि ये पोर्न हमारी उस मानसिकता को प्रतिबंबित करता है कि शरणार्थी 'हमारी औरतों को ले जाएंगे?'

ये औपनिवेशक दौर में अफ्रीकी और एशियाई पुरुषों को महिला का अपहरण करने वालों को तौर पर दिखाने से बहुत ज्यादा अलग नहीं है.

शरणार्थियों की छवि

शरणार्थियों को आम तौर पर जमीन, नौकरी और औरतें छीनने वालों के तौर पर पेश किया जाता है. इसीलिए शरणार्थी पुरुष अगर बलात्कारी नहीं है तो उसे ऐसे धूर्त आदमी के तौर पर दिखाया जाता है जो आपकी औरतों को बहला-फुसला लेता है. इस कल्पना के पीछे भी वही बुनियादी भय है.

महिला शरणार्थियों से जुड़े पोर्न और भी ज्यादा दहला देने वाले हैं. सेना के जवानों द्वारा महिलाओं का सामूहिक बलात्कार करने के कई वीडियो हैं. इसके अलावा घरेलू कामगार के तौर पर काम करने वाली महिलाओं का यौन शोषण या खाने या रहने की पनाह के लिए गिड़गिड़ाती शरणार्थी महिला का यौन शोषण आपको पोर्न साइटों पर आसानी से मिल जाएंगे.

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शरणार्थियों के पास सुरक्षा या निजता जैसे बुनियादी अधिकार नहीं होते. शायद यही वजह है कि कैंपों में सेक्स करते शरणार्थियों के वीडियो भी अच्छी-खासी संख्या में इंटरनेट पर मौजूद हैं.

और किसी स्वस्थ आदमी के लिए इनमें से किसी तरह के पोर्न को आनंददायक कहना संभव नहीं है. 

पोर्न और समाज

ये कहना अति-सरलीकरण है कि पोर्न समाज के लिए खतरा है. अभी तक पोर्न का बलात्कार या महिलाओं के संग हिंसा से कोई सीधा संबंध देखने में नहीं आया है. 

हां ये जरूर है कि पोर्न से आपकी सेक्स को लेकर अवधारणा कोई अलग राह भी ले सकती है या सेक्स को लेकर कोई फंतासी भरी कल्पना अपके अंदर घर कर सकती है. लेकिन इस बात के ठोस वैज्ञानिक सुबूत नहीं हैं कि पोर्न से आदमी में कोई बुरी आदत पनपती है.

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लेकिन पोर्न लोकप्रिय संस्कृति को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है. शरणार्थियों से जुड़े पोर्न पहले से ही पूर्वाग्रह के शिकार शरणार्थियों के लिए और भी मुसीबत पैदा कर सकते हैं. बहुत संभव है कि मीडिया का एक तबका इससे संकेत लेते हुए शरणार्थियों के बारे में कोई रूढ़ धारणा बनाने लगे.

अपने घर से बेघर होकर मीलों दूर बसेरा खोज रहे शरणार्थियों को अगर यौन सुख का सामान समझा जाने लगा तो मानवता के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता.

लेकिन जब भी शरणार्थियों से जुड़ा एक भी वीडियो अपलोड होता है तो ये न केवल मानव शरीर का बल्कि उसके दुख, पीड़ा और असहायता का भी हिंसक दोहन करता है.

First published: 16 July 2016, 8:00 IST
 
दुर्गा एम सेनगुप्ता @the_bongrel

संवाददाता, कैच न्यूज

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