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कुलभूषण जाधव विवाद: भारत सख्ती से कहे कि पाकिस्तान को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है

विवेक काटजू | Updated on: 12 April 2017, 10:15 IST

पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने पूर्व नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव को सोमवार को फांसी की सजा सुनाई. इस फैसले को गलत बताते हुए मंगलवार को संसद में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जो कहा, उससे लगता है कि कुलभूषण जाधव के संबंध में भारत और पाकिस्तान राजनयिक चैनलों से पहले भी संपर्क में रहे हैं.

 

जाहिर है, उनमें बातचीत जाधव को वाणिज्यदूत से संपर्क मुहैया करवाने की भारत की मांग से शुरू हुई. इसकी मांग तब की गई थी जब पाकिस्तान ने जाधव के एक वीडियो का खूब जोर-शोर से प्रचार किया था. कथित वीडियो में जाधव ने मार्च 2016 में स्वीकार किया था कि वे रॉ एजेंट हैं.


पाकिस्तान का मानना है कि भारत बलोचिस्तान में आतंक और कराची में अस्थिरता फैला रहा है. यही सिद्ध करने के लिए पाकिस्तान जाधव का इस्तेमाल कर रहा है. पाकिस्तान, जाधव की वाणिज्यदूत से संपर्क की भारत की मांग पर हास्यास्पद और अस्वीकार्य शर्तें थोप कर भारत को कंटीले रास्ते पर ले जा रहा है. उसने भारत के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ हास्यास्पद आरोप लगाते हुए उसके सबूत और अन्य सामग्री मांगी.

 

भारत की इस मांग के बदले में कि पाकिस्तान जाधव को वाणिज्यदूत से संपर्क करने दे. इससे इसकी पुष्टि होती है कि पाकिस्तान जाधव के मामले का फायदा उठा रहा है. वह भारत के बलोचिस्तान में हस्तक्षेप को लेकर अपना पक्ष और मजबूत करना चाहता है.

 

अनुभवहीन उम्मीद

 

स्वराज ने संसद से कहा कि पाकिस्तान के बेहूदे रवैये के बावजूद भारत की प्रतिक्रिया काफी रचनात्मक थी, ‘इस उम्मीद में कि कोई कदम उठाया जाएगा.’ उन्होंने आगे कहा, ‘हमने कहा था कि श्री जाधव के पाकिस्तान में होने के तथ्यों की जांच करने और स्थितियों को समझने के लिए उनका वाणिज्यदूत से संपर्क करवाना जरूरी है.’ जाहिर है, यह एक अनुभवहीन उम्मीद थी, हालांकि नीतिगत कौशल से ऐसा कहना उचित था.


स्वराज के बयान से यह नहीं पता चलता कि दोनों देशों ने वाणिज्यदूत से संपर्क के मुद्दे पर क्या केवल राजनयिक सूचनाओं की अदला-बदली की है, या भारत के रचनात्मक नजरिए को देखते हुए जाधव के मामले को चुपचाप हल करने पर विचार किया है. वाणिज्यदूत से संपर्क के लिए करीब 13 महीने में 13 कार्यवाही की गई. जाधव के मामले में पाकिस्तान से भारत सरकार का अब तक का संपर्क किस तरह का रहा, इस सबंध में भी भारत खुलासा करे, तो ठीक रहेगा.

 

साफ संकेत


स्वराज ने कहा कि जाधव की मौत की सजा पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के मुहर लगाने की सार्वजनिक घोषणा के तीन घंटे बाद पाकिस्तान ने भारत से फिर कहा कि भारत सबूत और अन्य सामग्री मुहैया करवाए, तो वह जाधव का वाणिज्यदूत से संपर्क करवा सकता है. विदेश सचिव एस जयशंकर ने पाकिस्तान उच्चायोग को सोमवार को कहा था कि इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग को ‘इसकी सूचना तक नहीं दी गई कि श्री जाधव को सुनवाई के लिए लाया गया था.’


यदि ऐसा था, तो पाकिस्तान अब वाणिज्यदूत से संपर्क करवाने की शर्त क्यों रख रहा है? ऐसा उन्होंने कोई गलती से नहीं कहा होगा. प्रत्यक्ष रूप से बेहूदा मांग है. साफ संकेत कि भारत को इसकी और जांच करनी चाहिए. सभी पार्टियों के सांसदों ने जाधव के मामले में एकमत होकर पाकिस्तान के रवैये पर गुस्सा और आक्रोश जताया. सरकार के इस मत से कोई असहमति नहीं थी कि जाधव के खिलाफ कानूनी कार्यवाही ‘हास्यास्पद’ थी और यदि उन्हें फांसी की सजा हुई, तो उसे पूर्व नियोजित हत्या माना जाएगा. स्वराज ने साफ चेतावनी दी कि यदि पाकिस्तान ने फांसी दी, तो इससे भारत और पाकिस्तान के द्विपक्षी संबंधों पर विपरीत असर पड़ेगा.

 

जासूसों का खेल


पाकिस्तान ने उन तारीखों के बारे में नहीं बताया कि जाधव को सुनवाई के लिए कब सैन्य अदालत लाया गया. क्या पिछले कुछ दिनों में यह सब जल्दबाजी में किया गया? सुनवाई कितनी लंबी चली? अनुमान है कि पाकिस्तानी सेना ने इसलिए ऐसा किया क्योंकि उसे कुछ खबरों से जानकारी मिली कि उनके एक सेवानिवृत्त अधिकारी को अगवा किया जा सकता है. उन्होंने आईएसआई में काम किया था और नेपाल में गायब हो गए थे. पाकिस्तान की रिपोर्टों से लगता है कि पाकिस्तान को डर है कि ईरान में चाबहार से जाधव के अगवा किए जाने के विरोध में भारतीय एजंसियां उन्हें अगवा ना कर ले.

 

भारत ने पाकिस्तान की सबूत और अन्य सामग्री की मांग पर ‘रचनात्मक’ रवैया रखा था. लगता है पाकिस्तान शायद यह माने कि भारत का जब यह रुख रहा है, तो वह बदला लेने के लिए पाकिस्तान के अधिकारी को अगवा करने की तैयारी कर रहा है. यदि यह सच है, तो जाधव की सजा जासूसों का खेल हो सकता है. सही मायने में यह सही कदम नहीं है, क्योंकि इससे स्थिति जटिल होती है और कुछ ऐसे हालात बनते हैं, जिनके बारे में कहना मुश्किल है. हालांकि भारत-पाक संबंधों का इतिहास बताता है कि पाकिस्तानी सेना ने भारत के साथ अक्सर असंगत और अविवेकपूर्ण व्यवहार किया है.

 

पाक-जनरल क्या करेंगे?


राज्य सभा का सुझाव था कि जब जाधव का मामला पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय जाए, तो उन्हें हर संभव कानूनी सहयोग दिया जाए. इस पर विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद की प्रतिक्रिया पर सुषमा स्वराज ने कहा कि ऐसा ही किया जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि जरूरत पड़ी, तो भारत पाकिस्तान के राष्ट्रपति से भी मिलेगा. जाधव के लिए बेशक बढ़ियां वकील रखे जाएंगे. पर क्या यह मानें कि भारत को पाकिस्तानी न्याय व्यवस्था पर भरोसा है? इस तरह का विश्वास अनुभवहीन है. यह मानना भी उतना ही अनुभवहीन होगा कि इस मामले में चुनी गई सरकार सेना की इच्छा के खिलाफ जा सकेगी. जाहिर है, सेना अहम फैसले ले रही है.


जनरल बाजवा दृढ़ छवि बनाना चाहते हैं. उन्होंने सजा यह जताने के लिए दी है कि भारत बलोचिस्तान और पाकिस्तान में अन्य जगहों पर अलगाववाद और आतंकवाद को प्रोत्साहित कर रहा है. खासकर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान झूठी अफवाह फैला रहा है कि भारत पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए अफगान के क्षेत्र का इस्तेमाल कर रहा है. भारत में कुछ लोगों ने बाजवा को समझदार सेना प्रमुख बताया था, जो भारत के साथ संबंधों को सुधारना चाहते हैं. पर इस प्रकरण से तो ऐसा नहीं लगता.

 

पाकिस्तानी जनरल महसूस कर रहे होंगे कि कई पाकिस्तानियों ने जाधव के फैसले का स्वागत किया है और कह रहे हैं कि पाकिस्तानी कानून सख्ती से लागू होना चाहिए. कुछ संजीदा लोगों का मानना है कि पाकिस्तान ने कोई भी जोखिम भरा कदम उठाया, तो इससे भारत-पाक संबंधों पर विपरीत असर पड़ेगा. हालांकि यह राय रखने वाले लोग कम ही हैं. ज्यादातर लोग पाकिस्तान की सख्त कार्यवाई के पक्ष में हैं. और नहीं लगता कि जनरल इस आम भावना के खिलाफ जाएंगे.


पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि दोनों देशों ने जासूसी के आरोप में किसी को फांसी की सजा सुनाई हो. यह चौबीस घंटे टेलीविजन और सोशल मीडिया से पहले के युग में था. अब उत्तेजित जुनून के कारण ऐसे मुद्दों पर चुपचाप राजनयिक हल देना मुश्किल है, खासकर तब जब पाकिस्तानी जनरल माचो दृष्टिकोण रखना चाहते हों.

 

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया


अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जाधव पर पाकिस्तान के आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया, पर इससे जनरलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. यह कार्यवाही करने से जनरलों को ना तो किसी ने रोका है और ना ही रोकने की संभावना है. इस संदर्भ में यह याद किया जाएगा कि तत्कालीन सेना प्रमुख रहील शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी से जाधव के मामले में सीधी बात की थी. बाद में वे आधिकारिक रूप से तुरंत इस्लामाबाद के दौरे पर थे. राष्ट्रपति ने इन आरोपों को नहीं माना. बल्कि उनका अपमान ही हुआ. ईरानियों ने पाकिस्तान के आरोप का समर्थन नहीं किया कि जाधव ईरान से पाकिस्तान-विरोधी गतिविधियों में संलग्न थे.


पहले जब काबुल में भारतीय मिशन और अफगानिस्तान की अन्य सुविधाओं पर पाकिस्तान के उकसाने पर हमला किया गया, और भारत की कीमती जानें गईं, भारत पाकिस्तान से कीमत नहीं वसूल सका. अब मोदी सरकार पाकिस्तानी जनरलों को सख्ती से कहे कि यदि पाकिस्तान ने जाधव का मुद्दा हल नहीं किया, तो पाकिस्तान को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.

First published: 12 April 2017, 10:15 IST
 
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