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यूरोप की शरणार्थी समस्या समाधान की एक राह भारत से गुजरती है

रनवीर समद्दर | Updated on: 12 November 2015, 16:18 IST
QUICK PILL
  • सीरिया\r\nमें आईएसआएस के शिकार शरणार्थी\r\nबड़ी संख्या में यूरोप पहुंच\r\nकर एक नए मानवीय संकट को जन्म\r\nदे रहे है.
  • 1971में\r\nपूर्वी पाकिस्तान से आने वाले\r\nलगभग एक करोड़ शरणार्थियों\r\nका भारत ने सफलतापूर्क पुनर्वास\r\nकिया था.\r\n\r\n
यूरोपीय मीडिया, सोशल मीडिया और दुनिया भर के नीति निर्माता इस समय सीरिया में पैदा हुए शरणार्थियों के संकट से निपटने का रास्ता ढूंढ़ रहे है. इस मसले पर दुनिया भर के मुल्कों की राय बंटी हुई है.

सीरिया और कुछ दूसरे अरब देशों से आने वाले शरणार्थियों की भारी तादाद के चलते कई यूरोपीय देशों को मुश्किलों का सामना करना पड़े रहा है. यूरोपीय देशों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह खड़ी हो गई है कि शरणार्थियों की भीड़ में कौन किस मकसद से आ रहा है, यह तय कर पाना कठिन हो गया है. शरणार्थी, रिफ्यूजी, मज़दूर, अवैध प्रवासी, आतंकवादी जैसे अलग-अलग समूहों में बांटना यूरोपीय देशों के लिए टेढ़ी खीर बन गया है.

भूमध्य सागर पर सुरक्षा बलों की गश्त और इंग्लिश चैनल को बंद करने की रणनीति भी शरणार्थियों की बाढ़ रोक पाने में असफल सिद्ध हुई है. बावजूद इसके पूरी वैश्विक बिरादरी को इस बात का अंदाजा है कि इससे समस्या खत्म होने वाली नहीं.

देशों की दिक्कत यह है इतनी बड़ी संख्या में चले आ रहे लोगों के लिए भूमि, ट्रेन, आवास, भोजन आदि का बंदोबस्त कर पाना बहुत कठिन हो गया है. कई देशों की स्थिति विचारशून्य सी हो गयी है.

तो क्या ऐसे वक्त में कोई औऱ रास्ता शेष नहीं बचा है? एक रास्ता है, यूरोप शायद भारत से कुछ सीख सकता है.

पूरब की सीख

हिंदुस्तान ने 1971 में बांग्लादेश (तात्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से आए करीब एक करोड़ शरणार्थियों को अपने यहां पनाह दी थी.

मुझे याद है कि भारत में आज के यूरोप जैसी भयावह की स्थिति नहीं थी. न ही भारत उनकी तरह बेहाल और परेशानी महसूस कर रहा था. जिंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती रही. आज भी बढ़ रही है.

आखिर 40 साल पहले भारत वो काम कैसे कर सका जिससे यूरोप आज जूझ रहा है.

इसे समझने के लिए हमे पहले ये जानना होगा कि किसी सत्ता और हाशिए के लोगों की जिम्मेदारी की प्रकृति क्या है.

भारतीय उपमहाद्वीप में अब तक दो बार विभाजन हो चुका है. कोई कैसे नागरिक बनता है और कोई नहीं बन पाता इसी धुरी पर राष्ट्रीयता की राजनीति टिकी होती है.

भारत ने रिफ्यूजी कन्वेंशन 1951या एडिशनल प्रोटोकॉल ऑफ 1967पर हस्ताक्षर नहीं किया था. भारतीय नीति के बारे में कहा जाता है कि वो 'नपी-तुली करुणा' पर आधारित थी. इसके तहत बड़ी संख्या में कुछ शरणार्थियों को बचाया गया, उनकी देखभाल की गई और उनका पुनर्वास करवाया गया. इसी दौरान कुछ लोग पीछे भी छूट गए.

जैसे, एक समय में बर्मा के शरणार्थियों का स्वागत किया गया, बाद में ऐसा भी समय आया जब भारत ने उनसे पल्ला झाड़ लिया. यहां तक कि बर्मा शरणार्थियों को भारत में प्रवेश करने से भी रोक दिया गया. इसी तरह बड़ी संख्या में तिब्बतियों को भारत में शरण दी गई और आज की तारीख में वे करीब-करीब भारतीय बन चुके हैं. इसके विपरीत श्रीलंका के शरणार्थियों ने सुरक्षाबलों के घेरे में कई-कई साल बिताए.

कुछ शरणार्थियों को जल्द से जल्द वापस जाने के लिए प्रेरित किया गया, जैसे 1971-72 में स्थितियां सामान्य होने के बाद हजारों की तादाद में बांग्लादेशी शरणार्थियों को वापस भेजा गया. जबकि तिब्बतियों से कभी भी वापस जाने के लिए नहीं कहा गया. वहीं, त्रिपुरा में चटगांव पहाड़ी और श्रीलंकाई शरणार्थियों को तमिलनाडु से जबरन अपने देश वापस भेजे जाने के आरोप लगे.

भारत की शरणार्थी नीति के इन विरोधाभासों को कुछ विशेषज्ञ 'रणनीतिक अस्पष्टता' मानते हैं. इसके पीछे उनके कुछ तर्क यूं हैं-

पहला, आजाद भारत में आने वाले शरणार्थी किसी दूसरे ग्रह से आए प्राणी नहीं है जिन्हें शरण देना है. इनमें से ज्यादातर विभाजन से पहले के भारत का हिस्सा थे. ऐसे शरणार्थियों को विशेषकर प्रशासनिक तरीकों देखभाल, पुनर्वास, सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ कुछ कानूनों के तहत नियंत्रित किया जाता है.

आजादी के बाद के शुरुआती सालों की नीतियों ने यहां शरणार्थियों के स्वागत की एक मजबूत परंपरा बनाने में मदद की. जिसे अब भारत न पूरी तरह अपना सकता है, न ही पूरी तरह ठुकरा सकता है.

नीतिगत अस्पष्टता का सिद्धांत

देश में पहले पहल आने वालों शरणार्थियों के साथ ही दया और अधिकार के लेकर बहस शुरू हो गयी. जिसका हमारे शरण देने की नीति पर गहरा असर पड़ा. दरअसल, नीतिगत अस्पष्टता का सिद्धांत इन दो प्रतिस्पर्धी विचारों के बीच का रास्ता है.

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शरणार्थियों को पनाह देने के साथ ही भारत ने उन्हें घेटोज (बंधक बस्तियां) में बसाया. उन्हें खुले आम इधर उधर बसने पर रोक लगायी. उनके लिए नए जमाने की बंधक कॉलोनियां बनाईं जिससे भारत की उस नीति को धक्का लगा जिसमें दया को सर्वोपरि रखा गया था. वक्त के साथ भारत की यह परंपरागत नीति बन गयी. वो शरणार्थियों को आश्रय भी देता रहा लेकिन साथ ही उन्हें पूरी आजादी नहीं दी जाती है.

हाल के वर्षों में एक नई समस्या सामने आई है अवैध अप्रवासियों और शरणार्थियों की. इसने संक्ट काल में पैदा हुए मानवीय समस्या और सामान्य हालात में होने वाले छिटपुट घुसपैठ की अलग-अलग बहसों को आपस में मिला दिया है. दोनों बहसें एक दूसरे को प्रभावित करने लगी हैं.

भारतीय न्यायपालिका ने इस पेंचीदा मामले को किस तरह लेती रही है? न्यायपालिका के कुछ प्रचलित तर्क इस प्रकार हैं-

इससे जुड़ी अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों को मानने के लिए भारत मजबूर नहीं है लेकिन ये राज्य की जिम्मेदारी है कि वो उनका सम्मान करे.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत भारत में रह रहे गैर भारतीय नागरिक सम्मिलित हैं. लेकिन ये अनुच्छेद उन्हें यहां स्थायी रूप से बस जाने का अधिकार नहीं देता. अगर कोई गैर भारतीय नागरिक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है तो वो भारत मे नहीं रह सकता. किसी विदेशी नागरिक को देश से बाहर निकालने का पूरा अधिकार सरकार के पास सुरक्षित है.

यूएनएचसीआर मानवीय आधार पर शरणार्थियों की पहचान करता है. इसलिए ये राज्य का दायित्व होता है कि जब तक शरणार्थियों की समस्याएं दूर न हो जाएं उन्हें अंतरराष्ट्रीय संरक्षण मिलता रहें.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 राज्य को अंतरराष्ट्रीय कानूनी सिद्धांतों का सम्मान करने का निर्देश देता है. इसके अनुसार भारतीय अदालतें ऐसे अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों को भारतीय कानूनों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से लागू करेंगी, बशर्ते कोई सिद्धांत भारतीय कानून के प्रतिकूल न हो.

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी शरणार्थियों की सुरक्षा की निगरानी यूएनएचसीआर के तहत करने से अपनी सहमति जतायी है. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि अगर यूएनएचसीआर किसी को शरणार्थी के रूप में प्रमाणित करता है तभी किसी बाहरी नागरिक को एक 'उचित प्रक्रिया' के तहत जाने के लिए कहा जा सकता है.

हालांकि अदालत ने किसी शरणार्थी को मान्यता या आश्रय देने के संबंध में कोई मानक तय नहीं किया है.

इस तरह भारत में शरणार्थियों के मामले कोई लिखित क़ानून नहीं है. यूएनएचसीआर मुख्य रूप से 12 हजार अफगान और एक हजार दूसरी नागरिकता वाले शरणार्थियों को लेकर चिंतित है. हालांकि उसे कुछ अन्य मामलों में राहत और पुनर्वास कार्य करने की अनुमति मिली हुई है.

इनके अलावा बाकी मामलों में भारत सरकार ही शरणार्थियों के भाग्य का फैसला करती है. जैसे, यहां रहने वाले एक लाख तिब्बती और 65 हजार श्रीलंकाई शरणार्थियों के मामले में यूएनएचसीआर का कोई सीधी भूमिका नहीं रही है.

भारत यूएनएचसीआर से मान्यता प्राप्त शरणार्थियों को फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस के जरिये मियादी रेजिडेंशियल परमिट जारी करता है, जिसकी मियाद समय सीमा खत्म होने पर बढ़वाई जा सकती है. फिर भी, कई शरणार्थी समूह यहां रहने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.

भारत में शरणार्थियों के मामले में कुछ दिखने वाली और कुछ न दिखने वाली सीमाएं बना रखी हैं. लेकिन तमाम कमियों के बावजूद प्रवासियों को संभालने का भारत का इतिहास यूरोप को सबक देने के लिए काफी है.

(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. जरूरी नहीं है कि संस्थान भी इससे सहमति हो.)
First published: 12 November 2015, 16:18 IST
 
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