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एक ओर मोटापा, दूसरी ओर कुपोषण के बीच में फंसी दुनिया

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 16 June 2016, 22:44 IST
(रैपलर.कॉम)
38.7
फीसदी

हिस्सेदारी है भारत में उन बच्चों की जो अपनी आयु की तुलना में अविकसित हैं

दुनिया की सात अरब आबादी में से दो अरब लोग कुपोषण के शिकार हैं. इतना ही नहीं 80 करोड़ लोगों में कैलोरी की कमी है.

इन आंकड़ों का खुलासा इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा जारी ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट-2016 करती है.

इसमें हैरानी वाली बात नहीं है कि न केवल कुपोषण के मामले में बल्कि अन्य प्रमुख सूचकांकों में भी भारत बाकी विकसित दुनिया से काफी पीछे हैं. 

आइए इस रिपोर्ट के आंकड़ों पर एक नजर डालते हैं.

38.7
फीसदी

  • हिस्सेदारी है भारत में उन बच्चों की जो अपनी आयु के हिसाब से अविकसित हैं.
  • 132 देशों की सूची में भारत काफी नीचे 114वें पायदान पर है.
  • इसका मतलब कि भारत में पांच साल से नीचे के एक तिहाई बच्चे बिना उचित पोषण के कमजोर हैं.
  • जर्मनी, चिली और ऑस्ट्रिया में अविकसित बच्चों की तादाद सबसे कम है.

28
फीसदी

  • भारतीय घरों में स्वच्छ पेयजल के लिए सप्लाई के पानी का कनेक्शन है.
  • बांग्लादेश, इंडोनेशिया और सहारा रेगिस्तान में पड़ने वाले मुल्कों में भी स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता काफी कम है.
  • दूषित पेयजल के चलते कुपोषित लोगों को आसानी से अपना शिकार बनाने वाली कालरा जैसी बीमारी हो जाती है.

170
वां

  • स्थान है भारत का एनीमिया यानी खून की कमी से प्रभावित 185 मुल्कों की सूची में.
  • एशिया में केवल पाकिस्तान और उजबेकिस्तान ही भारत से नीचे हैं.
  • 48.1 फीसदी या तकरीबन आधी भारतीय महिलाएं खून की कमी से प्रभावित हैं. इसका सीधा सा मतलब है कि भारतीय महिलाओं में दिल का दौरा पड़ने का खतरा सबसे ज्यादा है.

9.5
फीसदी

  • आबादी मधुमेह की चपेट में है, जो भारत को 190 देशों की सूची में 104 नंबर पर पहुंचाती है.
  • इसके साथ ही 22 फीसदी वयस्क मोटापे का शिकार हैं. यह सूची में 21वां स्थान हैं.

4

  • आंकड़े इस रिपोर्ट के ऐसे हैं जो वैश्विक रूप से भयावह स्थिति का इशारा करते हैं.
  • दुनिया के पांच में से दो अरब लोग मोटापे का शिकार हैं.
  • 12 में से एक को टाइप 2 डायबिटीज है.
  • 4 करोड़ 10 लाख लोगों का वजन सामान्य से ज्यादा है.
  • 66 करोड़ 70 लाख पांच वर्ष से नीचे की आयु के बच्चों में से 15 करोड़ 90 लाख अविकसित हैं.

अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी तमाम योजनाओं के बजट में केंद्र सरकार द्वारा की गई कटौती पोषण और इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में भारी बर्बादी का कारण बन सकती है.

रिपोर्ट में पूर्णिमा मेनन, सुब्रत दास और सुमन चक्रबर्ती लिखते हैं, "देश के वित्तीय ढांचे में बदलाव की वजह से राज्यों के सामने पोषण में इजाफा करने और अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने जैसे नए अवसर हैं. लेकिन एक जोखिम भी है कि राज्य पोषण को प्राथमिकता नहीं देंगे."

First published: 16 June 2016, 22:44 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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