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म्यांमार को मिला पहला असैनिक राष्ट्रपति, क्या सफल होंगे हतिन क्याव?

जसनिया सर्मा | Updated on: 16 March 2016, 22:40 IST

शानदार जीत के बाद यू हतिन क्याव (त्हिन चाव) को म्यांमार का पहला असैनिक राष्ट्रपति चुन लिया गया है. उन्होंने संसद के दोनों सदनों के कुल 652 वोटों में से 360 पर जीत हासिल की. यह आंग सान सू की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी की मिलिट्री और यूएसडीपी पर जीत है.


नए उपराष्ट्रपति (म्यांमार में दो होते हैं) - हेनरी वेन थिओ ने 79 सीटों पर जीत हासिल की. थिओ भी एनएलडी (नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी) के ही उम्मीदवार थे. दूसरे उपराष्ट्रपति के रूप में आर्मी के उम्मीदवार म्यिन्त स्वे चुने गए, जिन्हें जाहिर तौर पर सेना के सभी 216 वोट मिले.

म्यांमार में कैसे होता है राष्ट्रपति चुनाव?


म्यांमार में हलुत्ता (संसद) में ऊपरी सदन एवं निचले सदन द्वारा सत्ताधारी पार्टी (एनएलडी) और विपक्षी पार्टी (यूएसडीपी) से एक-एक सदस्य को उम्मीदवार बनाता है. दोनों सदनों के एक-एक उम्मीदवार के लिए हर सदस्य द्वारा मतदान किया जाता है. चूंकि एनएलडी का सदन में बहुमत है, इसलिए इसके उम्मीदवारों का चुनाव में जीतना तय ही था.

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सेना का संसद में 25% कोटा होता है, इसके तहत यह एक उम्मीदवार को नामित करती है.

इन चुनावों के लिए उम्मीदवार इस प्रकार थे -

निचला सदन : त्हिन क्याव (एनएलडी), ऑन्ग क्हिन म्यिन्त (यूएसडीपी)

ऊपरी सदन: हेनरी वेन थिओ (एनएलडी), साई मॉक क्हाम (यूएसडीपी)

सेना की ओर से लेफ्टिनेंट जनरल म्यिन्त स्वे को उम्मीदवार बनाया गया था.

बचपन की दोस्ती ने राष्ट्रपति बना दिया


आंग सान सू की के नेतृत्व वाली एनएलडी के सबसे मुखर और जोशिले समर्थकों में त्हिन क्याव जाने जाते हैं.

Htin Kyaw

आंग सू की के साथ हतिन क्याव


इसके कारण द यंगोन टक्सी ड्राइवर्स एसोसिएशन में भी उनके समर्थक हैं. मेरी टैक्सी के ड्राइवर का कहना था- 'ऐसा इसलिए नहीं है कि जिसे राष्ट्रपति चुना गया वे सू की के 'ड्राइवर' हैं (जैसा मीडिया ने प्रचारित-प्रसारित किया) बल्कि इसलिए कि "डा सू और त्हिन क्याव जिगरी दोस्त हैं!"

एनएलडी पार्टी को नवंबर 2015 के ऐतिहासिक चुनाव में जबर्दस्त जीत मिली थी

कम से कम म्यांमार के अगले राष्ट्रपति के बारे में आम धारणा कुछ ऐसी ही है.


8 नवंबर, 2015 को एनएलडी की ऐतिहासिक जीत के बाद से म्यांमार की राजनीति में रुचि रखने वाले लोगों के बीच यह अटकलबाजी और चर्चा जोरों पर थी कि राष्ट्रपति के सिंहासन पर बैठने वाला अगला व्यक्ति कौन होगा. व्यापक रूप से यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि एनएलडी में अच्छी छवि वाला और उससे भी ज्यादा सू की के भरोसे का कोई आदमी ही राष्ट्रपति बनेगा.

सू की खुद इस पद पर नहीं बैठ सकतीं, क्योंकि वर्ष 2008 में सेना ने संविधान में मनमाने ढंग से एक नया कानून शामिल कर सू की के राष्ट्रपति बनने पर पाबंदी लगा दी थी. भले इस कानून में सू की नहीं लिखा गया, लेकिन स्पष्ट रूप से इसका निशाना सू की ही थीं.

Aung San Su Kyi_ Nicolas Kovarik/Pacific Press/LightRocket  via Getty Images


2008 के संविधान की धारा 59 (एफ) के तहत उस व्यक्ति का राष्ट्रपति बनना गैरकानूनी बना दिया गया है, जिसकी अगली पीढ़ी के पास किसी अन्य देश का पासपोर्ट हो. बताते चलें कि सू की के बेटे की नागरिकता ब्रिटेन की है. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वहां सेना के पूरे सहयोग बिना संविधान में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता. अभी संविधान बदलना इसलिए भी संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि तत्मा दाव (सेना) के पास अब भी 25% कोटा है.

लेकिन त्हिन क्याव की जीत का मतलब है कि म्यांमार पर प्रशासन करने में सू की सीधे तौर पर और महत्वपूर्ण भूमिका में रहेंगी.

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एनएलडी के संभावित उम्मीदवारों में कई और नाम भी थे, लेकिन त्हिन क्याव ही सर्वोत्तम उम्मीदवार सिद्ध हुए. वे न सिर्फ अच्छे खासे लोकप्रिय हैं, बल्कि विनम्र भी रहते हैं. वे 90 के दशक से ही सू की के साथ खड़े नजर आए हैं और उन्होंने ही सू की को हर कदम पर दिशा दिखाई. उनके सेना के साथ दोस्ताना संबंध नहीं हैं. जैसे एनएलडी के अन्य नेताओं के हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात, म्यांमार को लेकर उनका विजन आन सान सू की के विचारों से पूरी तरह मेल खाता है.

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ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो उन्हें एक कठपुतली राष्ट्रपति से अधिक कुछ नहीं समझते. यंगून में ऐसी कई तरह की अफवाहें हैं. यंगून में काम कर रहे एक विदेशी विश्लेषक की सोच है कि यह सब पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से किया गया था ताकि शीघ्र संविधान संशोधन को हरी झंडी दिखाने के लिए रास्ता तैयार किया जा सके.

वो कहते हैं, 'वे जो भी बातें कर रहे हैं, इनके लिए उनके पास सिर्फ 12 महीनों का समय है. हमें लगता है कि उसके बाद जनता की महाकाय उम्मीदों के कारण वे खुद ही असफल हो जाएंगे. इसके बाद सू की के लिए आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति पद संभालने का रास्ता साफ हो जाएगा.'

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हालांकि, सू की की मंशा वर्तमान संविधान को ज्यों का त्यों रखने की लगती है, भले वह कितना ही विकृत क्यों न हो. संविधान में जल्दबाजी में कोई संशोधन न करके एलएनडी न सिर्फ खुद को राष्ट्रपति के पद पर बनाए रखने में सफल होगी, बल्कि जनता को यह संदेश देने में भी कामयाब होगी कि देश के संविधान में उसका पूरा भरोसा है.

साथ ही वह सेना के साथ खुद को संलग्न कर पाएगी और व्यवस्था में निरंतर बदलाव की ओर कदम बढ़ा पाएगी. सू की ने "राष्ट्रपति से भी ऊपर” रहकर काम करने में पूरी ईमानदारी बरती है, इसी कारण उनकी नई कार्यप्रणाली को लेकर कोई अचरज नहीं होना चाहिए.

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10 मार्च को जब नामांकन की घोषणा हुई, उसके बाद से मैंने यंगून में जिससे भी बात की, सबका एक ही सपना नजर आया कि एक दिन सू की "अधिकारयुक्त राष्ट्रपति” होंगी. विशेषकर एनएलडी से जुड़े लोगों का यही सपना है.


शहरों में तो सू की के परिवार का देवता-सदृश भारी सम्मान किया ही जाता है, ग्रामीण इलाकों में भी ऐसा ही नजर आया. इसके पीछे कारण था एनएलडी द्वारा पूरे देश में गहन चुनाव प्रचार और इस बात का वादा कि वे कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए काम करेंगे. इसने ग्रामीण इलाकों में भी उनके आधार को मजबूत समर्थक दिए.

राजधानी में एक एनएलडी कार्यकर्ता ने कहा, एनएलडी का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तो "पता नहीं कहां से आ गया”. बताया जाता है कि क्रिश्चियन चिन एक्स आर्मी ऑफिसर हेनरी वेन थिओ भी उम्मीदवारी की घोषणा के बारे में सुनने पर बहुत हैरान रह गए थे.


थिओ का जन्म देश के गरीबतम इलाके चिन राज्य में एक किसान परिवार के घर हुआ था. उन्होंने अपनी पढ़ाई यंगून और मांडले यूनिवर्सिटी में की, मांडले में एक फैक्टरी में काम किया और फिर सेना में भर्ती हो गए.


एनएलडी के अंदर भी वे कोई बहुत जाना-पहचाना नाम नहीं हैं, लेकिन उम्मीदवार के रूप में उनके नाम की घोषणा का इशारा साफ है कि यह जातीय विविधता वाली और समावेशी पार्टी का लंबे समय से किया जा रहा वादा पूरा करने के लिए उठाया गया कदम है. मोन बामर राष्ट्रपति और एक चिन नॉन-बामर अध्यक्ष वाली पार्टी के रूप में यह अपनी पैठ और गहरी करना चाहती है.

सेना की मजबूत पकड़ जस की तस है

वर्ष 2012 से परिवर्तन के दौर की सावधानीपूर्वक और श्रेणीबद्ध योजना बनाने वाली सेना के सामने सिर्फ एनएलडी का राष्ट्रपति चुन लिए जाने से बहुत कुछ उम्मीद नहीं की जा सकती.

किसी भी संवैधानिक बदलाव के खिलाफ विटो पावर के तौर पर इस्तेमाल के लिए 2008 में हलुत्ता (संसद) में 25% कोटा तो सेना ने अपने हाथ में ले ही लिया, इसके अलावा भी बहुत सारी चीजें हैं, जो सेना के ही हाथ में हैं.

म्यांमार की संसद में 25 फीसदी सीट सेना के लिए आरक्षित है


म्यांमार की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था, गृह मंत्रालय और सीमा की सुरक्षा तकनीकी रूप से अब भी सेना के हाथ में ही है. स्वाभाविक है कि अधिकांश लोग व्यवस्था को चुनौती देने की बजाय अपने वर्तमान बॉस (सेना) की लीक पर ही चलेंगे और अपनी नौकरी बचाएंगे.


सेना वहां विदेशी निवेश (एफडीआई) लाई है, प्रेस की राह खोली है, सिनेमा को बढ़ावा दिया है और साथ ही बड़े पैमाने पर पर्यटकों को आमंत्रित किया है.

सेना ने वहां सबसे बड़े आठ सशस्त्र जातीय संगठनों को प्रतिनिधित्व दिया और बातचीत के जरिए संघर्ष विराम का समझौता किया. लेकिन वर्ष 2015 के संघर्ष विराम पर इनमें से अधिकांश समूहों ने हस्ताक्षर नहीं किए और इसी कारण संघर्ष एवं टकराव की घटनाएं होती रहीं.

आगे का रास्ता


यदि एनएलडी सफलतापूर्वक म्यांमार का नेतृत्व करना चाहती है तो उन्हें कई स्तर पर काम करना पड़ेगा.

सबसे पहले, जिस बदलाव की हिमायत वे अब तक करते आए हैं वह निरंतर होना चाहिए. साथ ही वह सेना के मौजूदा ढांचे के लिए भय या टकराव पैदा करने वाला नहीं होना चाहिए.

म्यांमार की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था, गृह मंत्रालय और सीमा की सुरक्षा तकनीकी रूप से सेना के हाथ में ही है


दूसरी बात, एनएलडी में नेताओं की एक ऐसी पीढ़ी तैयार करनी होगी जो लोकप्रिय और जिम्मेदार हों. एनएलडी राजनीतिक रूप से बहुत मजबूत है, लेकिन पार्टी का नेतृत्व सिर्फ सान सू की के करीबियों के सहारे होने से पार्टी उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ पाएगी.


तीसरा बिन्दु, इस समय समझना होगा कि हर किसी का आगे बढ़ना ही देश के लिए वास्तविक निवेश है और इसकी सराहना की जरूरत है.

हालांकि, तत्मादाव, जातीय लड़ाके, बिजनेस सेक्टर, एनएलडी और अन्य इस बात पर एकमत नहीं हैं कि म्यांमार का भविष्य क्या हो. ऐसी ही आशंका आशियान के एक मुख्य शोधकर्ता जताते हैं. वे कहते हैं- “उनमें से कोई भी दोबारा से पीछे लौटना नहीं चाहता. यह विफलता बहुत बड़ी होगी. कोई भी नए सिरे से शुरूआत नहीं करना चाहता.”

First published: 16 March 2016, 22:40 IST
 
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