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बीजेपी को ठेंगा दिखा सकती हैं महबूबा मुफ्ती

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • मुफ्ती सईद की मृत्यु के बाद महबूबा मुफ्ती बेहद सावधानी से अपने पत्ते खोल रही हैं. बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार बनाने के बाद घाटी में पीडीपी की लोकप्रियता में जबरदस्त गिरावट आई है. उनके सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती अपने वोट बैंक को बचाए रखने की है.
  • महबूबा बीजेपी को डिप्टी सीएम का पद देने से मना कर सकती हैं और केंद्र से पहले के मुकाबले ज्यादा फंड की मांग कर सकती हैं. इसके अलावा गठबंधन सरकार पर साझा एजेंडे में बदलाव की अपील कर सकती हैं.

महबूबा मुफ्ती ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को पसोपेश में डाल रखा है. गठबंधन सरकार बनाने की इच्छुक बीजेपी को लगता है कि पीडीपी सरकार बनाने से हाथ पीछे खींच सकती है. अचानक ही महबूबा में आत्मविश्वास नजर आने लगा है और बीजेपी नर्वस दिखाई दे रही हैं. 

महबूबा अपने पत्ते बेहद सावधानी से खोल रही हैं. उन्हें पता है कि बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार बनाने के एक साल के दौरान घाटी में उनकी पार्टी की लोकप्रियता में जबरदस्त गिरावट आई है. राजनीति तौर पर प्रासंगिक बने रहने के लिए उन्हें घाटी में अपने समर्थन को फिर से मजबूत करना होगा. और यह बीजेपी के साथ गठबंधन में रहते संभव नहीं है. 

तो क्या वह बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ लेंगी? अगर वह ऐसा करती हैं तो वह उनके मिजाज के मुताबिक होगा.

अगर गठबंधन जारी रहता है तो यह पीडीपी की शर्तों पर चलेगा. महबूबा बीजेपी को डिप्टी सीएम का पद देने से मना कर सकती हैं और केंद्र से पहले के मुकाबले ज्यादा फंड की मांग कर सकती हैं. इसके अलावा गठबंधन सरकार पर साझा एजेंडे में बदलाव की अपील कर सकती हैं.

क्या बीजेपी के हाथ से निकल जाएगा जम्मू-कश्मीर?

कुछ लोगों का मानना है कि बीजेपी को पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़ लेने का इससे सही समय नहीं मिल सकता क्योंकि जम्मू में उसकी लोकप्रियता में तेजी से कमी आ रही है. कश्मीर मामलों के एक जानकार ने बताया, 'अगर आज की तारीख में राज्य में चुनाव होता है तो 25 तो दूर, बीजेपी आधा दर्जन सीट भी नहीं बचा पाएगी.' 

वहीं दूसरी तरफ देश भर में बीजेपी की लोकप्रियता में गिरावट आ रही है और ऐसे में वह एक और राज्य में सत्ता गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकती. इसलिए पार्टी पीडीपी के संभावित कदम को लेकर आशंकित है. बीजेपी नेताओं के महबूबा मुफ्ती को राज्य के अगला मुख्यमंत्री के तौर पर समर्थन दिए जाने के बयान को इसी संदर्भ में देखना चाहिए.

महबूबा मुफ्ती की कश्मीर में जबरदस्त पकड़ है और वह अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करती हैं

दिसंबर 2014 में खंडित जनादेश आने के बाद बीजेपी के साथ गठबंधन में सरकार बनाने के बाद पार्टी तेजी से उभर रही थी. नरेंद्र मोदी ऐसे नेता के तौर पर नजर आ रहे थे जिसे हराया नहीं जा सकता था. लोगों को यह लगने लगा था कि मोदी अब हमेशा सत्ता में रहेंगे. मुफ्ती को तब लगा कि बीजेपी के साथ हाथ मिलाना व्यावहारिक विकल्प है. लेकिन पहले दिल्ली और बिहार के बाद यह मिथ टूटने लगा है.

पिछले साल बिहार चुनाव का नतीजा आने से एक दिन पहले 7 नवंबर को मोदी ने सार्वजनिक तौर पर मुख्यमंत्री सईद को श्रीनगर की एक रैली में नसीहत देते हुए कहा था कि उन्हें कश्मीर को लेकर किसी से सलाह लेने की जरूरत नहीं है. दो दिन बाद कश्मीर के लोग यह सोच रहे थे कि क्या मोदी बिहार चुनाव के नतीजों के बाद 9 नवंबर को श्रीनगर की रैली में मुफ्ती के साथ वैसा ही बर्ताव करेंगे. अगर बिहार चुनाव के बाद मोदी कमजोर हुए हैं तो आप सोचिए कि पठानकोट हमले के बाद उनकी पार्टी और उनकी छवि किस कदर कमजोर हुई होगी.

पीडीपी का विकल्प

आज की तारीख में बीजेपी के साथ पीडीपी को गठबंधन जारी रखने में थोड़ा फायदा जरूर है. अगर परिस्थितियों की वजह से महबूबा को गठबंधन तोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ता है तो वह गठबंधन से अतिरिक्त फायदे उठा सकती हैं लेकिन इसके बावजूद उन्हें घाटी में नुकसान उठाना पड़ेगा. लेकिन लंबे समय में यह नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा होगा. वहीं दूसरी तरफ महबूबा कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने का विकल्प तलाश सकती है.

अगर महबूबा ऐसा करती हैं तो कश्मीर घाटी में उनका वोट बैंक बना रहेगा. महबूबा मुफ्ती के लिए जम्मू-कश्मीर में बड़ी चुनौती उमर अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस है. वह ऐसे गठबंधन का विरोध नहीं करेंगे जो बीजेपी को सत्ता से बाहर रख सकता है.

पीडीपी और कांग्रेस का गठबंधन 87 सीटों वाली जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 44 के जादुई आंकड़े से थोड़ी ही पीछे होगी. पीडीपी के पास फिलहाल 28 विधायक हैं. मुफ्ती की मृत्यु के बाद यह संख्या घटकर 27 हो गई है जबकि कांग्रेस के पास 12 विधायक हैं.

हालांकि वे जम्मू-कश्मीर के चार निर्दलीय विधायकों का समर्थन अपनी तरफ खींच सकते हैं. इस बात की भी संभावना है उमर अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस इस गठबंधन सरकार को बाहर से बिना किसी शर्त के समर्थन दे सकती है. दिसंबर 2014 में उमर अब्दुल्ला ने बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए मुफ्ती मोहम्मद सईद को बिना शर्त समर्थन दिया था. वह ऐसा फिर से कर सकते हैं. इस तरह से नेशनल कॉन्फ्रेंस बीजेपी को राज्य की राजनीति से बाहर रखने का दावा कर सकती है.

घाटी मुस्लिम बहुल इलाका है और यह आबादी राज्य की राजनीति में बीजेपी या संघ को मजबूत होते हुए नहीं देख सकती. चाहे जो भी हो लेकिन यहां पर कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष पार्टी के तौर पर देखा जाता है. वह पीडीपी को बीजेपी के साथ जाने के लिए माफ कर सकते हैं.

हालांकि दूसरी परिस्थितियां भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. राज्यपाल शासन को अगले छह महीने तक बढ़ाकर जम्मू-कश्मीर में किसी नई सरकार का रास्ता रोका जा सकता है. वैसी स्थिति में फिर से चुनाव ही एकमात्र विकल्प होगा.

घाटी मुस्लिम बहुल इलाका है और वह बीजेपी और आरएसएस को मजबूत होते हुए नहीं देख सकता

ऐसी स्थिति में भी महबूबा को फायदा होगा. वह अपने मृत पिता के पक्ष में सहानुभूति वोट बटोर सकती हैं. वह दावा कर सकती हैं कि उन्होंने बीजेपी के साथ सरकार नहीं बनाई.

बीजेपी को आखिरी दोनों विकल्पों से बचना चाहेगी. पार्टी  पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन की सरकार की स्थिति से बचेगी. इसके अलावा वह राज्य में नए सिरे से चुनाव भी नहीं चाहेगी.

मुफ्ती का पक्ष मजबूत

बिहार के बाद बीजेपी जम्मू-कश्मीर जैसे अहम राज्य को नहीं गंवाना चाहेगी. जहां उसने यह साबित करने की कोशिश की है कि वह राजनीतिक मतभेदों को दरकिनार कर शासन चला सकती है.

महबूबा मुफ्ती युवा है और समय उनके पक्ष में हैं. वह राजनीति में प्रयोग कर सकती हैं और अपनी स्थिति को मजबूत करने का इंतजार कर सकती है. लेकिन इसके लिए उन्हें अपने वोट बैंक को बचाए रखना जरूरी है.

ऐसी भी अटकलें हैं कि महबूबा के नेतृत्व से नाखुश पीडीपी के नेताओं को भी उनका फैसला मानने के लिए बाध्य होना पड़ता है. पिछले कुछ समय से यह साफ हो चला है कि वह पार्टी और जनता के बीच की कड़ी हैं. उनकी स्थानीय अपील है और वह इसे बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करती हैं. उन्हें पता है कि उनके बिना पार्टी कुछ भी नहीं है. यह स्थिति तब भी सच थी जब उनके पिता जिंदा थे. अब उन्होंने यह भी दिखाया है कि वह किस कदर कठिन स्थितियों का सामना कर सकती हैं.

First published: 16 January 2016, 8:55 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

एडिटर, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में 25 से ज्यादा सालों का अनुभव. इस दौरान मेल टुडे के संस्थापक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी संपादक, द टेलीग्राफ, दिल्ली के संपादक, एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के संपादक, इंडियन एक्सप्रेस के वॉशिंगटन संवाददाता, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सहायक संपादक के रूप में काम किया.

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