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एक कदम आगे, दो कदम पीछे की गफलत में फंसी पाकिस्तान नीति

अभिषेक पराशर | Updated on: 14 December 2015, 11:51 IST
QUICK PILL
  • उफा एग्रीमेंट में दोनों देशों के एनएसए के बीच होने वाली बातचीत की जगह दिल्ली और मुद्दा आतंकवाद तय किया गया था. हालांकि भारत ने आखिरी समय में मुद्दा और बातचीत की जगह दोनों में बदलाव कर उफा की बढ़त गंवा दी.
  • विपक्ष में रहने के दौरान मोदी ने यूपीए सरकार पर बार-बार यह कह कर निशाना साधा था कि पाकिस्तान के साथ बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते. जबकि बदले हुए हालात में कहा जा सकता है कि मोदी पाकिस्तान के मामले में उसी नीति को आगे बढ़ा रहे हैं जिसकी वे आलोचना करते थे.

आठ जनवरी, 2013 को लांस नायक सुधाकर सिंह और हेमराज की सीमा पर हुई मौत के बाद बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने उत्तर प्रदेश के खैरपुर में मनमोहन सिंह सरकार की कमजोर पाकिस्तान नीति पर हमला करते हुए कहा था, 'अगर उनके (हेमराज) सर को (पाकिस्तान से) वापस नहीं लाया जाता है तो हमें बदले में कम से कम उनके दस सैनिकों का सर कलम कर देना चाहिए.' 

स्वराज उस वक्त देश की विदेश मंत्री नहीं थी और देश में आम चुनाव की सरगर्मी बढ़ रही थी. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को औपचारिक तौर पर बीजेपी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तो नहीं बनाया था लेकिन वह लगातार मनमोहन सिंह सरकार पर कमजोर विदेश नीति विशेषकर पाकिस्तान नीति का हवाला देकर हमला कर रहे थे.

स्वराज का यह बयान उस वक्त के चुनावी माहौल की जरूरत थी. राजनीतिक मामलों के जानकारों की माने तो देश की राजनीति का मिजाज कुछ ऐसा ही है कि जब कोई पार्टी विपक्ष में होती है तो वह विशेष तौर पर पाकिस्तान को लेकर ज्यादा राष्ट्रवादी हो जाती है और जब विपक्ष में बीजेपी हो तो मामला उससे भी आगे बढ़ जाता है.  

विपक्ष में होने के दौरान बीजेपी ने आतंकवाद और बातचीत को साथ बढ़ाए जाने के मामले में यूपीए सरकार को कटघरे में खड़ा किया था

सुषमा स्वराज जब पाकिस्तान को चेतावनी दे रहीं थीं उस वक्त मनमोहन सिंह सरकार ट्रैक टू डिप्लोमेसी के जरिये पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने की कोशिशों में लगी हुई थी. इस कोशिश का कोई नतीजा निकलता उससे पहले ही यूपीए की सरकार चली गई.

देश ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री चुना. मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रधानमंत्रियों को बुलाकर सकारात्मक संदेश के साथ अपनी पारी शुरू की.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी इसमें शामिल हुए. दोनों प्रधानमंत्रियों ने अलग से भी मुलाकात की. इसके बाद रूस के उफा सम्मेलन में दोनों देशों ने तय किया कि उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दिल्ली में आतंकवाद के मसले पर बात करेंगे. 

उफा घोषणात्र शिमला समझौते की भावना के मुताबिक था जिसमें कहा गया कि भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक दिल्ली में होगी जिसमें आतंकवाद पर चर्चा की जाएगी. 

उफा में दोनों देशों के एनएसए की बातचीत तय हुई थी, लेकिन बाद में विषय और बातचीत की जगह दोनों बदल गए

भारत और पाकिस्तान मामलों के विशेषज्ञ विवेक काटजू बताते हैं कि उफा में भारत पाकिस्तान पर एक तरह से बढ़त बनाने में सफल रहा था. अब सब कुछ उफा के मुताबिक होना तय था जो एक तरह से शिमला समझौते की भावना पर आधारित था. लेकिन पाकिस्तानी सेना में उफा को लेकर जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई.

पाकिस्तानी सेना के लिए उफा समझौता एक झटका था क्योंकि इसमें कहीं से भी कश्मीर मुद्दे का जिक्र नहीं किया गया था. उफा समझौते को लेकर पाकिस्तान में बेचैनी तभी से दिखने लगी थी. विशेषकर मिलिट्री के दायरे में. इसके बाद भारत ने एनएसए मुलाकात के अंतिम दिन से पहले दिल्ली में पाकिस्तानी दूतावास में सरताज अजीज की हुर्रियत नेताओं से मुलाकात के कार्यक्रम का विरोध कर दिया. बातचीत शुरू होने से पहले टूट गई. 

'तीसरे पक्ष' पर नाराजगी

विदेश मंत्री स्वराज ने कहा कि उफा समझौते में यह तय हुआ था कि भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली बातचीत में तीसरा पक्ष शामिल नहीं होगा और पाकिस्तान से इसी शर्त पर बातचीत होगी. 'तीसरे पक्ष' को लेकर बातचीत शुरू होने से पहले टूट गई. विदेश मामलों के जानकार कमर आगा बताते हैं, 'अभी तक हम हुर्रियत को अपना ही मानते रहे हैं लेकिन यह सरकार हुर्रियत को तीसरा पक्ष साबित कर चुकी है.'

हालांकि सुषमा स्वराज ने वाजपेयी सरकार समेत पिछली उन तमाम सरकारों के उस फैसले का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पायीं जिसके हिसाब से हुर्रियत के नेता हमेशा से पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडलों से अलग से मुलाकात करते रहे हैं.

बातचीत खत्म हो गई, फिर दो महीने के भीतर अचानक से ही सरगर्मियां तेज हो गईं. यह समझ पाना मुश्किल है कि जिस बिना पर बातचीत टूटी थी उसमें क्या बदलाव आया. यह साफ करने के लिए सरकार में कोई आगे नहीं आया. 

बहरहाल पेरिस में दुनिया की जलवायु पर जमे धुंधलके को साफ करने पहुंचे मोदी और नवाज शरीफ ने डिप्लोमेसी की एक नई इबारत लिख दी. दोनों नेताओं की मुलाकात का एक वीडियो सामने आया. करीब तीन मिनट से भी कम के इस वीडियो में दोनों नेता आपस में बनावटी बातचीत मेें तल्लीन दिखे. इसके बाद एक फोटो सोशल मीडिया में सामने आया. इसमें भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बैंकॉक में हाथ मिलाते दिखे.

उफा की बढ़त बैंकॉक में गंवाई

विशेषज्ञों की राय है कि भारत ने उफा में जो बढ़त बनाई थी उसे बैंकॉक में गंवा दिया. काटजू बताते हैं, 'वास्तव में भारत ने जो अगस्त में करने से मना कर दिया था, दिसंबर में वही काम कर डाला.' बातचीत के मुद्दे और उसकी जगह में दी गई छूट विदेश नीति में परिपक्वता की निशानी नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना के लिए यह भारत की कमजोर नीति का संकेत है.

तो क्या भारत पर पाकिस्तान से बातचीत शुरू किए जाने का दबाव था? पाकिस्तान पर यू-टर्न लिए जाने के मोदी सरकार के फैसले की वजह अभी तक को साफ नहीं हो पाई है लेकिन भारत के ऊपर बन रहे दबाव से इनकार नहीं किया जा सकता. 

हालांकि भारत-पाक मामलों के विशेषज्ञ कंवल सिब्बल इससे इत्तफाक नहीं रखते. वो बताते हैं, 'अंतरराष्ट्रीय दबाव हम चाहे तो सहन कर सकते हैं लेकिन हमें इसकी जरूरत नहीं क्योंकि पाकिस्तान भारत के सख्त रवैये का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता है.' उन्होंने कहा कि बैंकॉक बैठक सरेंडर के तौर पर देखना गलती होगी. दरअसल पाकिस्तान को आगे से यह कहने का मौका नहीं मिलेगा कि भारत बातचीत नहीं कर रहा है.

अचानक से ही सरगर्मियां तेज हो गईं. यह समझ पाना मुश्किल है कि जिस बिना पर बातचीत टूटी थी उसमें क्या बदलाव आया

अमेरिका और चीन पाकिस्तान के समर्थक रहे हैं. शिकायतों और आपत्तियों के बावजूद अमेरिका, पाकिस्तान को लगातार आर्थिक मदद देता रहा है

सिब्बल मानते हैं कि भारत ने अपनी स्थिति में बदलाव किया है. लेकिन अभी हमें पाकिस्तान से मिले किन संकेतों को देखना होगा कि भारत ने अपनी स्थिति में क्यों बदलाव किया है.

तो क्या दो महीने पहले भारत का कठोर रुख महज दिखावा था? कंपोजिट बातचीत से रिज्यूम्ड और अब कॉम्प्रिहेंसिव बातचीत पहले से ही चल रही विदेश नीति को आगे बढ़ाने की कवायद भर है. आगा बताते हैं, 'विदेश नीति में आप अपनी मांगों को लेकर अड़ियल रुख नहीं अपना सकते. कुछ शर्तें आप रखते हैं और कुछ दूसरा पक्ष. इसके बाद बीच का रास्ता निकलता है.' 

पाकिस्तान की इकनॉमी बेहद खस्ताहाल है. और दूसरी तरफ पहले से जारी आतंकवाद के साथ आईएस के तौर पर नया खतरा भी सामने आ चुका है. इसलिए बातचीत की टेबल पर पाकिस्तान को लाना जरूरी थी और यही हुआ.

आगा बताते हैं, 'पाकिस्तान भारत से चीन की तरह का संबंध चाहता है. मतलब विवाद भी चलता रहे और व्यापार भी. किसी एक के लिए दूसरे को रोका नहीं जा सकता.'

वहीं पुरानी पॉलिसी

ऐसी कोशिशें पहले से भी चलती रही हैं. तो क्या मोदी सरकार की पाक नीति में बदलाव की जगह निरंतरता ज्यादा है? और वह पाकिस्तान के मामले में उसी नीति को आगे बढ़ा रहे है जिसे पहले की सरकारें बढ़ाती रही हैं?

सिब्बल बताते हैं कि अभी भी यूपीए की ही नीति चलती नजर आ रही है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पर बीजेपी की विदेश नीति विशेष नहीं है. फर्क बस इतना है कि हमने पहले की सरकारों के उलट एलओसी पर सेना को सीजफायर उल्लंघन का जवाब देने की छूट देने के साथ पाकिस्तान को इशारों में यह संकेत देने की कोशिश की है कि हम भी बलूचिस्तान में आपके साथ वहीं कर सकते हैं जो आप कश्मीर में कर रहे हैं.

First published: 14 December 2015, 11:51 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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