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'पाकिस्तानी जनरल मोदी के बारे में सोचकर मुस्कुरा रहे होंगे'

विवेक काटजू | Updated on: 10 December 2015, 8:44 IST
QUICK PILL
  • बैंकॉक में होने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की बैठक  के बाद पाकिस्तानी सेना ने भारत पर रणनीतिक बढ़त बना ली है.
  • उफा बैठक के मुताबिक भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच केवल दिल्ली में ही बैठक होनी थी.  

छह दिसंबर को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल नासिर जंजुआ के बीच बैंकॉक में मुलाकात हुई. इन दोनों के साथ वहां भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिव भी मौजूद रहे.

बैठक के बाद संयुक्त बयान जारी किया गया. बयान में कहा गया, "बातचीत के दौरान शांति और सुरक्षा, आतंकवाद, जम्मू और कश्मीर के साथ एलओसी पर स्थिति सामान्य किए जाने समेत अन्य मुद्दों पर चर्चा हुई."

दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच हुई बैठक के कई निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं और साथ ही कई सवाल भी उठ रहे हैं.

सरकार और बीजेपी के समर्थक चाहे इस बातचीत का जितना भी बचाव करें लेकिन सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी सेना ने भारत पर रणनीतिक बढ़त बना ली है. उफा में जारी संयुक्त बयान में यह साफ कर दिया गया था कि आतंकवाद से जुडे़ सभी मुद्दों पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच बातचीत केवल दिल्ली में ही होगी. पाकिस्तानी सेना यह नहीं चाहती थी कि बातचीत का सारा फोकस केवल आतंकवाद पर हो. 

उफा समझौते ने पाकिस्तानी सेना को एक तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया था. इसलिए वह चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर को भी बातचीत के दायरे में लाया जाए जिसका जिक्र उफा बयान में नहीं किया गया था. अगस्त में भारत ने साफ तौर पर पाकिस्तान की इस मांग को खारिज भी कर दिया था. जिसकी वजह से पाकिस्तान ने सरताज अजीज के दिल्ली आने के कार्यक्रम को रद्द कर दिया.

मोदी और उनके सलाहकारों ने पिछले सात दशक की सीख से सबक नहीं लेते हुए बैंकॉक में बातचीत का फैसला लिया

वास्वत में भारत ने अगस्त में जो काम करने से मना किया था, आखिरकार उसने दिसंबर में वहीं कर डाला. बातचीत के विषय और उसकी जगह को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से दी गई छूट परिपक्वता की निशानी नहीं है बल्कि यह पाकिस्तानी सेना के लिए कमजोरी का संकेत है.

पाकिस्तान की सेना मोदी को अब उस तरह से देखेगी जो दबाव बनाने में न तो सक्षम है और न ही अपनी बात पर टिके रहने की क्षमता रखती है. इसका सीधा खामियाजा यह होगा कि पाकिस्तानी सेना अब बात-बात पर अपनी मांग रखेगी. यह पिछले सात दशक की सीख है जिसे मोदी और उनके सलाहकारों ने नजरअंदाज कर दिया है. शांति को छूट के भरोसे हासिल नहीं किया जा सकता.

उफा को लेकर पाकिस्तान की प्रतिबद्धता का कोई मतलब नहीं है. मोदी को अब उफा की प्रतिबद्धता के आधार पर अगले साल सार्क सम्मेलन में इस्लामाबाद जाना ही होगा. शायद पाकिस्तान को लेकर मोदी की अस्थिर नीति इतिहास बनाने की हड़बड़ी है जिसके तहत वह दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को नई ऊंचाई देना चाहते हैं. 

निश्चित तौर पर जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि मोदी अपनी पाकिस्तान यात्रा को सामान्य यात्रा की तरह नहीं लेंगे. पाकिस्तानी जनरल यह बात जानते हैं और वह अपनी मांग को लेकर अड़ियल होते जा रहे हैं. 

पाकिस्तान के साथ समग्र बातचीत का आयोजन विदेश सचिव करते हैं. उनके पास शांति-सुरक्षा के अलावा जम्मू और कश्मीर पर बातचीत करने की भी जिम्मेदारी थी. इसलिए उनके पास भारत के राजनीतिक नेतृत्व के तहत दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत को एक अहम दिशा देने और पाकिस्तानी सेना को प्रभावित करने की जिम्मेदारी थी. लेकिन अब ऐसा लगता है कि विदेश सचिव राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बी टीम के तौर पर काम कर रहे हैं. अगर ऐसा है तो यह विदेश मंत्रालय की कमजोर स्थिति का संकेत है.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के प्रतिनधिमंडल में विदेश सचिव एस जयशंकर को छोड़कर सभी अधिकारी प्रधानमंत्री कार्यालय के हैं

मोदी विदेश सचिव जयशंकर पर बेहद भरोसा करते हैं लेकिन विदेश मंत्रालय की भूमिका को कमतर किया जाना विदेश सचिव के पद की भूमिका को कमजोर करेगा. रोचक बात यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के प्रतिनिधिमंडल में विदेश सचिव को छोड़कर सभी अधिकारी प्रधानमंत्री कार्यालय के हैं

बैंकॉक में जारी बयान में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच हुई बैठक की कुछ बातों का ही जिक्र किया गया है. डोभाल ने निश्चित तौर पर जंजुआ को लश्कर-ए-तैयबा को नियंत्रित करने का दबाव बनाया है. लेकिन यह मान लेना अव्यावहारिक है कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ अपनी सुरक्षा नीति के मूल तत्व से किनारा करेगा.

बड़ा सवाल

क्या जम्मू-कश्मीर पर कुछ नई चर्चा हुई ? क्या मोदी चार सूत्रीय फॉर्मूले को आगे बढ़ाना चाहते हैं जिसे मनमोहन सिंह ने पर्दे के पीछे से आगे बढ़ाया था ? इस अहम मसले पर देश को भरोसे में लिए जाने की जरूरत है. एलओसी पर स्थिति सामान्य किया जाना दोनों देशों के लिए अहम है क्योंकि यहां रहने वाली आम आबादी की जिंदगी दांव पर है. क्या पाकिस्तान ने इस मामले में आश्वासन दिया है कि वह आतंकवादियों को बढ़ावा देना बंद करेगा ? क्या पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने सियाचिन से सेना हटाए जाने का मुद्दा उठाया ? अगर ऐसा हुआ तो क्या भारत ने साफ तौर पर यह कहा कि सियाचिन का मुद्दा बातचीत में शामिल नहीं है? निश्चित तौर पर राष्ट्रीय हित की खातिर इन उपायों को आगे बढ़ाया जाना जरूरी है.

बैंकॉक में हुई बैठक पाकिस्तान के साथ जुड़ी भारत की वाजिब चिंताओं की दिशा में कोई ठीक-ठाक जवाब नहीं देता है

यह सभी वैसे सवाल हैं जिसका तत्काल जवाब दिया जाना जरूरी है. यह भी जानना जरूरी है कि किस तरह से द्विपक्षीय बातचीत को आगे बढ़ाया जाएगा. पाकिस्तान समग्र बातचीत को शुरू किया जाना चाहता है. क्या मोदी सरकार ने इन मामलों पर कोई फैसला किया है? बैंकॉक बयान इन सभी मसलों का ठीक-ठीक जवाब नहीं देता है. यह बस इतना बताता है कि सकारात्मक बातचीत जारी रहेगी.

बैंकॉक बैठक का एक और अहम पहलू है. बैठक के दौरान भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की मुलाकात भी हुई है. शायद यह पहली बार है जब किसी तीसरे देश में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की बैठक हुई और उसके प्रतिनिधिमंडल में विदेश सचिव भी शामिल रहेे. जाहिर तौर पर यह हुर्रियत के मसले से बचने का तरीका था. यह अपने आप में पाकिस्तानी सेना को दी गई छूट है. सवाल है कि क्या पाकिस्तान से आने वाले अधिकारी भविष्य में हुर्रियत के नेताओं से देश या विदेश में मुलाकात नहीं करेंगे? सरकार को इस मसले को स्पष्ट करने की जरूरत है.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अफगानिस्तान पर होने वाली बैठक में पाकिस्तान जा रही हैं. क्या इस दौरान पाकिस्तान के नेताओं से होने वाली उनकी मुलाकात केवल अफगानिस्तान तक ही सीमित रहेगी? यह भी पता नहीं है कि वह पाकिस्तानी नेताओं को क्या संदेश देंगी? यह जरूरी है कि वह सार्वजनिक तौर पर यह कहें कि पाकिस्तान की तरफ से भारत के खिलाफ आतंक को बढ़ावा नहीं दिए जाने के आश्वासन पर ही दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत होगी.

निष्कर्ष

रावलपिंडी में बैठे पाकिस्तानी जनरल ये सोचकर मुस्कुरा रहे होंगे कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को लगभग समझ लिया है. उन्हें यह पता लग चुका है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह मोदी भी ठोस, सुसंगत और धीरजभरी नीति को आगे बढ़ाने की योग्यता नहीं रखते. ये बात भारत के हित में नहीं है. इतिहास का यही सबक है कि इस मामले में ड्राइविंग सीट पाकिस्तान को सौंपने के बजाय भारत को उसे खुद संभालना चाहिए.

First published: 10 December 2015, 8:44 IST
 
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