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बलूचिस्तान के छलावे में न आएं, मोदी की पाक नीति निरर्थक

भारत भूषण | Updated on: 15 September 2016, 7:25 IST
(कैच न्यूज)

नरेंद्र मोदी सरकार ने पाकिस्तान के साथ संबंधों के संदर्भ में जो दोहरी रणनीति अपनाई है, उसमें ऐसी कोई गुंजाइश नहीं बची है कि पाकिस्तान को किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेला छोड़ दिया जाए और इसे आतंकवाद फैलाने वाला राष्ट्र बता दिया जाए.जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की दखलंदाजी के जवाब में बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की बात उठाना और फिर यह भी अनुमान पर छोड़ देना कि बलूचिस्तान रणनीति कहीं मात्र दिखावा ही बन कर न रह जाए.

हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रधानमंत्री द्वारा यह बात उठाना कि पाकिस्तान आतंकवाद को पोषित कर रहा है, देश की जनता को सुनना अच्छा लग सकता है, लेकिन यह तो भविष्य के गर्भ में है कि वह पाकिस्तान को अंरराष्ट्रीय स्तर पर कितना अलग-थलग कर पाएंगे.

इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि अमेरिका, जिसके साथ भारत अपनी सामरिक साझेदारी बढ़ा रहा है, कब पाकिस्तान पर भारत का साथ छोड़ दे. खैर, जब तक अफगानिस्तान में स्थिरता नहीं आती है, तब तक तो ऐसा होगा नही.

तालिबान में संघर्ष विराम की शुरूआत के लिए यूएस, स्वयं चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ बात करना चाहता है.

फौरी तौर पर दिखाई देता है कि अमेरिका, पाकिस्तान से भारत में फैलाए जा रहे आतंकवाद के खिलाफ भारत का साथ देना जारी रखेगा, लेकिन गौर करने लायक बात यह भी है कि हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी की भारत यात्रा के दौरान केरी साफ तौर पर पाकिस्तानियों को भी सहलाते हुए दिखाई दिए.

केरी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के समक्ष सुझाव दिया कि आतंकवाद पर भारत-पाक के बीच वार्ता में कोई तीसरा देश भी शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि दोनों देशों के बीच शांति वार्ता और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते. उन्होंने कहा, ‘जरूरी है कि पाकिस्तान इन मसलों (आतंकवाद और उग्रवादियों को पनाह देने) पर दूसरे देशों को भी साथ लेकर चले.’

एक दिन बाद, दिल्ली में ही केरी ने कहा, पाकिस्तान भी बुरी तरह से आतंकवाद से त्रस्त है. साथ ही कहा कि पाक ने आतंक के खिलाफ कार्रवाई कर उसके ‘पलटवार’ को भी झेला है.

उन्होंने कहा, '50,000 से भी ज्यादा लोग आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं. ये वे लोग थे, जिन्होंने इस्लाम की एक नई ही परिभाषा गढ़ ली, जो कि धर्म की सही परिभाषा नहीं है और जब पाकिस्तान इनके खिलाफ कोई कार्रवाई करता है तो सामान्यत: उसे करारा जवाब मिलता है, जिससे उसे आतंक से निपटने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है.

यह केवल पाकिस्तान में पनपे घरेलू आतंकवाद की ही बात नहीं है. इससे पाकिस्तान को अपना पक्ष रखने की अमेरिका की मंशा भी साफ झलकती है. उसे अफगानिस्तान में शांति कायम करने के लिए पाकिस्तान की मदद चाहिए. आखिरकार, पूरा तालिबानी नेतृत्व और उसके विभिन्न गुटों के नेता आए दिन पाकिस्तान के मेहमान बनते रहते हैं.

अफगानिस्तान के संदर्भ में अमेरिका की मजबूरी यह है कि वह पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन को भी शामिल कर एक चतुर्पक्षीय वार्ता करना चाहता है. तालिबान में संघर्ष विराम की शुरूआत करने के लिए अमेरिका, स्वयं, चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ मिल कर वार्ता करना चाहता है.

उपेक्षा नहीं की जा सकती

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संबंध भारत की नजर में सराहनीय नहीं हैं. यह उतने ही घनिष्ठ और जटिल हैं जैसे कि भारत और नेपाल के बीच. दोनों देशों के बीच खुली सीमा है. दोनों तरफ जातीय संरचना भी समान है. और अफगानी सीमा क्षेत्र के सम्पर्क अपने से ज्यादा बड़े और शक्तिशाली पड़ोसी देशों के साथ मजबूत हैं. इससे ज्यादा क्या होगा कि बड़े पड़ोसी पर निर्भरता गर्म पानी के बंदरगाहों तक पहुंच से तय की जाती है. यह भौगोलिक परिस्थिति और इसकी निर्भरता के टूटने के निकट भविष्य में कोई आसार नहीं हैं.

इसलिए, अफगानिस्तान में भारत की भूमिका केवल अमरिका द्वारा प्रोत्साहित सैन्य सहायता और विकास में सहायता के साथ ही अफगान सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण तक सीमित होगी. परन्तु ऐसा कोई उपाय नहीं है कि भारत अफगानिस्तान के लिए पाकिस्तान की जगह ले सके. जैसे कि नेपाल के लिए भारत का स्थान चीन नहीं ले सकता. पाकिस्तान अफगानिस्तान के संबंधों के मद्देनजर यह एक तथ्य है.

इसलिए काबुल को पाकिस्तान के साथ सदा अच्छे संबंध बनाए रखने होंगे. ठीक वैसे ही, जैसे नेपाल को भारत के साथ. इन संबंधों को जटिल क्या बनाता है- अफगानिस्तान के हथियारबंद उग्रवादियों को प्रशिक्षण और हथियार आपूर्ति के लिए पाकिस्तान के रूप में स्वर्ग जैसा एक सुरक्षित ठिकाना.

इस्लामाबाद अपना यह प्रभाव छोड़ना भी नहीं चाहता. या तो वह काबुल में कठपुतली राज चलाए या कम से कम, निरपेक्ष सत्ता हो लेकिन वह उसके खिलाफ नहीं होनी चाहिए.

अतः भले ही भारत और अमेरिका के बीच कितने ही प्रगाढ़ संबंध हों या भारत और अफगानिस्तान के बीच कितने ही मजबूत संबंध हों, अमेरिका पाकिस्तान की उपेक्षा नहीं कर पाएगा.

यही प्रमुख कारण है कि पाकिस्तान को अमेरिका जैसे दिग्गज अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से अलग करने में भारत की रणनीति नाकाम साबित हो सकती है.

जहां तक बलूचिस्तान पर प्रधानमंत्री के कड़े रवैये का सवाल है, इसके परिणामों के बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता. उम्मीद ही की जा सकती है कि इस रणनीति से अगर कोई चमत्कार ही हो जाए तो पाकिस्तान के साथ संबंध सुधर सकते हैं, जो कि मौजूदा हालात के विपरीत एक गरिमापूर्ण समाधान के रूप में भी सामने आ सकता है.

जो लोग भारत द्वारा बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन की बात उठाए जाने को पाक द्वारा कश्मीर में जटिल हालात पैदा किए जाने के जवाब के रूप में देख रहे हैं, वे यह भूल जाते हैं कि कश्मीर समस्या का एक बड़ा पक्ष इसकी अंदरूनी प्रशासनिक कमजोरी है. केवल नासमझ और भ्रमित राष्ट्रवादी ही यह मानते हैं कि कश्मीर में जो कुछ भी हो रहा है वह पाकिस्तान के इशारे पर हो रहा है.

सच्चाई से दूर भागना

अफसोस है कि मौजूदा सरकार ने तय किया है कि कश्मीर को इस रूप में नहीं पहचाना जाए कि यह एक समस्या है जिसका संबंध पाकिस्तान से है. अहंकार में आकर यह सरकार पाकिस्तान और आजादी समर्थक अलगाववादी गुटों (जैसे कि सैयद अली शाह गिलानी, जिन्हें पाक एजेंट माना जाता है) से बात करने से इनकार कर देती है. यह कश्मीर में सरकार की समर्थक और विपरीत राजनीतिक विचारधराओं वाली ऐसी राजनीतिक पार्टियों का अप्रिय गठबंधन है, जो एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते और उनके चुनाव क्षेत्र भिन्न हैं.

केंद्र का यह समर्थन किसी ड्रामे से कम नहीं है, क्योंकि जब कभी भी कश्मीरियों पर मुसीबत आई है, भले ही वह प्राकृतिक आपदा जैसे कि 2014 की बाढ़ हो या अर्द्ध सैनिक बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर यह जानते हुए भी पैलेट गनों का इस्तेमाल कि इससे लोग अंधे हो जाते है; दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार को सही कार्रवाई करने में काफी समय लग जाता है. इसलिए कोई अचरज नहीं कि कश्मीर में हालात लगातार खराब ही हो रहे हैं.

बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन का मामला उठाने से कश्मीर समस्या का हल नहीं होगा. सुरक्षा बलों की मनमानी का मामला उठाना होगा या कश्मीरी जनता की पीड़ा का इतिहास मिटाना होगा.

इस बीच, बलूचिस्तान पर जो शिगूफा सरकार ने छोड़ा है, उससे भारतीय गुप्तचर एजेंसियों के उस इनकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि उन्होंने कभी बलूचिस्तान से गोपनीय सूचनाएं एकत्रित नहीं की. इसलिए बलूचिस्तान में जो भी घटता है उसके लिए भारत को दोष देने की संभावना बढ़ जाती है. बलूच प्रान्त में भारत की भूमिका के चलते कथित भारतीय जासूस कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान द्वारा लगातार परेड करवाई जाती रहेगी.

अब,एक बार को मान लेते हैं कि भारत बलूचिस्तान में उसी प्रकार की स्थितियां पैदा कर देगा, जैसी उसने कश्मीर में कर रखी हैं. ऐसे में, विदेश विभाग से सेवानिवृत्त भारतीय अधिकारी या सशस्त्र बलों के अधिकारी कहते हैं, यहां यह भी विचार करना होगा कि बलूच की जमीन से जुड़े दूसरे देश इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे.

बलूच की गृह भूमि पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान के बीच बंटी हुई है. फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता कि बलूच पर भारत के इस नए पैंतरे के प्रति ईरान और अफगानिस्तान की प्रतिक्रिया क्या होगी?

सवाल ये है कि जब तक बलूचिस्तान समस्या का सावधानीपूर्वक हल नहीं निकल नहीं निकल जाता, तब तक मानिए अभी दिल्ली दूर

शिया बहुल ईरान सिस्तान, बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में समर्थ रहा है; परन्तु जो बलूच लोग वहां रह रहे हैं और सुन्नी हैं, वे गरीब हैं. कुछ आकलनों के मुताबिक ईरान में रह रहे 80 प्रतिशत बलोच गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. उनकी औसत आयु राष्ट्रीय औसत आयु से आठ साल कम है और यहां शिशु मृत्यु दर देश में सर्वाधिक है.

ईरान के कुछ नाराज बलूच लोगों ने जुनदुल्लाह नामक हिंसक गुट बना लिया है, जो तेहरान में शिया शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व कर रहा है. जब ज्यादा दबाव में आ जाते हैं तो ये जुनदुल्लाह लड़ाका पाकिस्तान की तरफ आकर छिप जाते हैं.

पाकिस्तान की तरफ वाले बलूचिस्तान में अगर थोड़ी भी तेज हिंसा भड़की तो इसका सीधा असर ईरान पर पड़ता दिखाई देता है.

ऐसी भी संभावनाएं है कि सऊदी जैसी ईरान विरोधी ताकतें मौका देख कर ईरान में झूठा ही झंडा अभियान छेड़ दे. ऐसी परिस्थितियों में बलूच लोगों की परेशानी का जिम्मा किसके सर आएगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है.

चाहे कितनी ही डींगें हांक ली जाएं, लेकिन सवाल यह है कि जब तक बलूचिस्तान समस्या का सावधानीपूर्वक हल नहीं निकल जाता, तब तक मानिए अभी दिल्ली दूर है.इससे पहले भारत को तय करना होगा कि वह पाकिस्तान से क्या चाहता है? हम शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं. या फिर एक आपसी स्थाई युद्ध वाले कड़वे संबंध निभाते रहें और एक दूसरे को धमकियां देते रहें? इन सवालों का जवाब कठोरता से नहीं दिया जा सकता. किस दूसरे देश को भारतीय नेताओं की जरूरत है?

First published: 15 September 2016, 7:25 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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