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दुश्मनी बहुत हुई, अब शांति को मौका देना चाहिए: माजिद अजीज

माजिद अजीज | Updated on: 29 December 2015, 8:36 IST
QUICK PILL
  • हाल में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के मुलाकात के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध अब बेहतर होंगे.
  • दोनों देशों के सचिव 15 जनवरी को वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए मिलने वाले हैं. संभावना है कि दोनों देशों के रिश्ते व्यापार के माध्यम से आगे बढ़ेंगे.

बस डिप्लोमेसी. क्रिकेट डिप्लोमेसी. हैंडसेक डिप्लोमेसी. अब जन्मदिन डिप्लोमेसी. भारत और पाकिस्तान के रिश्ते हमेशा से अस्थिर और असामान्य रहे हैं. कभी-कभी दोनों देशों के नेता एक-दूसरे से हाथ मिलाने से इंकार कर देते हैं और कभी-कभी दिल खोलकर गले मिलते हैं. हाल में ही नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ ने गर्मजोशी से मुलाकात की.

भारत और पाकिस्तान के नेताओं के पास दुनिया के सामने खुद को अपने मनमुताबिक दिखाने का बहुत नायाब तरीका है. उनकी जब मर्जी होती है मिल सकते हैं और उम्मीद की किरण दिखा सकते हैं. बहरहाल इस तरह से जो चर्चा का माहौल बनता है वह टिकाऊ नहीं होता या लंबे समय तक नहीं चलता.

पाकिस्तान में 25 दिसंबर बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है. इस दिन पाक संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के आदर्शों और उपदेशों को याद किया जाता है. जिन्ना की जयंती क्रिसमस के दिन पड़ती है. इसके अलावा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है.

भारत-पाकिस्तान के रिश्तों का असर सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि बाकी दुनिया पर भी पड़ता है

25 दिसंबर को हमेशा की तरह टीवी चैनल दर्शकों को ध्यान में रखते हुए जिन्ना और क्रिसमस पर कार्यक्रम पेश कर रहे थे. उसी समय चैनलों को धमाकेदार ब्रेकिंग न्यूज मिली कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काबुल से दिल्ली लौटते हुए थोड़ी देर के लिए लाहौर आएंगे. क्यों? खबर आई कि मोदी अपने समकक्ष शरीफ की नातिन की शादी में शिरकत करेंगे. साथ ही, नवाज को उनके जन्मदिन की बधाई भी देंगे.

इस मुलाकात को पर्सनल डिप्लोमेसी कहा गया. जाहिर है कि भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की बात जब आती है तो व्यक्तिगत कुछ नहीं रह जाता. इन पड़ोसी देशों के रिश्तों का असर सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि बाकी दुनिया पर भी पड़ता है.

इस मिलनसारिता को कैसे देखा जाए? क्या यह रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने की शुरुआत है? पहले एक छोटी मुलाकात पेरिस में हुई, इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बैंकाक में मिले अब मोदी लाहौर पहुंच गए. अब अचानक भारत-पाक संबंधों में उम्मीद नजर आने लगी है. लेकिन मामला उम्मीद से ज्यादा बढ़ नहीं रहा है.

भारतीय स्टील कारोबारी सज्जन जिंदल इस मुलाकात में रोल मॉडल बनकर उभरे हैं

आलोचक मानते हैं कि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, थोड़ा इंतजार करना चाहिए. इस मुलाकात पर आलोचकों के कई सवाल है, जैसे: क्या आपने नहीं सुना जब शरीफ पीएम मोदी की अगुवानी की तैयारी कर रहे थे तो मोदी सीमा पार आतंकवाद के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहरा रहे थे? एनएसए स्तर की वार्ता कहां हुई? मीडिया कहां थी? एजेंडा क्या था? कश्मीर, सियाचिन, एमएफएन स्टेटस, अफगानिस्तान, आतंकवाद, सीमा पर तनाव और क्रिकेट के मुद्दों पर क्या हुआ? क्या यह मुलाकात सिर्फ दिल्लगी के लिए थी?

शरीफ ने उत्सव के दिन विवादास्पद मुद्दों को छोड़कर एक अच्छे मेजबान की भूमिका बनाई. उन्होंने प्रोटोकॉल का ध्यान रखते हुए अपने पड़ोसी का स्वागत किया. लेकिन सीमा के दोनों तरफ बकवास और शेखी क्यों बघारी जा रही है?

कह सकते हैं कि दो श्रेणी के लोगों के लिए यह दिन खराब था. पहली श्रेणी में राजनीतिक-धार्मिक पार्टी के लोग हैं जबकि दूसरी श्रेणी में सेवानिवृत वर्दीधारी जवान आते हैं.

कट्टरपंथी कभी इस क्षेत्र में शांति बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं. भारत और पाकिस्तान के सेना के रिटायर्ड ऑफिसर्स पेंशन पर आराम से रहते हैं और गोल्फ खेलने में ज्यादा समय बिताते हैं. शाम को वे लोग टीवी पर चर्चा करने के लिए मौजूद रहते हैं.

इस प्रकार के स्वंयभू विशेषज्ञ शांति की प्रक्रिया और द्विपक्षीय संबंध की किसी भी बात पर लाल हो जाते हैं. जाहिर है वे उग्र बैल की तरह हर नई पहल पर सींग मारने को तैयार रहते हैं.

यह नहीं कहा जा सकता है कि जो लोग कड़े शब्दों में इस मुलाकात का विरोध कर रहे हैं वो बेवजह है. विशेषकर पाकिस्तान में. भारत, चीन-पाकिस्तान के बीच प्रस्तावित इकोनॉमिक कॉरीडोर का विरोध कर रहा है, बलोचिस्तान में दखल करता है, इसका सतत आरोप रहा है कि पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है, दोनों देशों की क्रिकेट टीमों को खेलने से रोकता है आदि.

लेकिन इन काल्पनिक कहानियों को किनारे रख देते हैं. भूल जाइए कि जन्मदिन की कूटनीति किसने शुरू की. विश्लेषकों के नकारात्मक बयानोंं को नजरअंदाज कीजिए. हमें सकारात्मक सोचना होगा. न तो यह समग्र बातचीत का हिस्सा था न ही इसे दोनों पक्ष इसे ज्यादा महत्व दे रहे हैं. दोनों देशों के बीच बेहद जरूरी गुडविल जेस्चर के लिए यह मुलाकात बहुत जरूरी थी. मुलाकात की बुराई करने के लिए कुछ लोगों ने अजब-गजब बातों को मुद्दा बनाया.

यह कुछ नहीं बस उद्योगपति और व्यापारियों के उत्साह का मामला है. भारतीय स्टील कारोबारी सज्जन जिंदल इस घटनाक्रम में रोल मॉडल बनकर उभरे हैं.

अब भारत और पाकिस्तान को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं है

दोनों देशों के प्रधानमंत्री की मुलाकात को जिंदल और शरीफ परिवार के 'स्टील' कनेक्शन और उनके हितों से जोड़कर देखा जा रहा है. पत्रकार बरखा दत्त की किताब में दावा किया गया है कि जिंदल ने साल 2014 में काठमांडू में हुई सार्क सम्मलेन के दौरान मोदी-शरीफ की मुलाकात करवाई थी. जब एफपीसीसीआई, एफआईसीसीआई और सार्क सम्मेलनों में सिर्फ कागजों में प्रस्ताव लाए जा रहे थे तब जिंदल ने बातचीत का रास्ता खोल दिया.

व्यापार और उद्योग जगत के लोग व्यापार सामान्य बनाने की प्रक्रिया की गति को लेकर आशावादी हैं. उन्हें उम्मीद है कि वीजा व्यवस्था को उदार बनाया जाएगा. शायद बैंकों को सीमा पार शाखाओं की स्थापना की अनुमति दी जाएगी.

मुनाबाओ-खोखरापार मार्ग को फिर से खोले जाने की संभावना है. साथ ही, सीमा पर विशेष आर्थिक जोन की संभावना जताई जा रही है. पाक के व्यापारियों के बीच आम सहमति है कि भारत को अफगानिस्तान जाने के लिए रास्ता नहीं देना चाहिए. हालांकि, भारत के लिए ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान इकॉनामिक कॉरिडोर का इस्तेमाल करने के लिए रास्ता खुला है.

आगे क्या? दोनों देशों के विदेश सचिव वार्ता प्रक्रिया को फिर से शुरू करने के लिए 15 जनवरी को बैठक कर रहे हैं. वार्ता किसी भी हाल में बंद नहीं होनी चाहिए. अब दोनों देशों को पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं है. उपमहाद्वीप का भविष्य दांव पर है.

First published: 29 December 2015, 8:36 IST
 
माजिद अजीज @MajydAziz

लेखक कराची चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के पूर्व अध्यक्ष हैं.

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