Home » इंटरनेशनल » Catch Hindi: Monica Lewinsky Ted Lecture in Hindi
 

एक बाज़ार...जहां सार्वजनिक शर्मिंदगी बिकती हैः मोनिका लेविंस्की

मोनिका लेविंस्की | Updated on: 6 January 2016, 8:06 IST
QUICK PILL
मोनिका लेविंस्की उस समय सुर्खियों में आईं जब उनके और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के संबंध दुनिया के सामने आए. मोनिका उस समय व्हाइट हाउस में इंटर्न थीं. उनकी उम्र महज 22 साल थी. उसके बाद उन्हें जो कुछ सहना पड़ा उसे उन्होंने मार्च, 2015 में दिए गये टेड लेक्चर में सबके सामने रखा. पढ़ें उनके लेक्चर का हिंदी अनुवाद.

आपके सामने एक ऐसी महिला खड़ी है जो दुनिया के सामने दस सालों से चुप थी. ज़ाहिर है कि अब हालात बदल गये हैं लेकिन अभी इसे ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ है. यह हाल ही में शुरू हुआ है. फोर्ब्स अंडर थर्टी सम्मेलन में मैंने पहली बार सार्वजनिक रूप से कुछ बोला, तीस साल से कम उम्र के 1500 प्रतिभाशाली लोगों के सामने. अंदाजा लगाइए कि 1998 में इनमें से सबसे बड़े लोग भी बमुश्किल से 14 साल के रहे होंगे, और सबसे छोटे तो बस चार बरस के. मैंने मजाक में उनसे कहा कि आपमें कुछ ने तो मेरा नाम सुना भी होगा तो सिर्फ रैप गानों में. जी हां, मैं लगभग 40 रैप गानों में बकायदा मौजूद हूं.

जिस रात मैंने वह भाषण दिया, एक अचरज भरी बात हुई. 41 साल की उम्र में एक साल के एक लड़के ने मेरे करीब आने की कोशिश की. बाप रे! है न? वह बहुत अच्छा था और मैं काफी खुश महसूस कर रही थी, मगर मैंने बात वहीं खत्म कर दी. पता है उसने मुझसे क्या कहा? यही कि वह मुझे फिर से 22 जैसा महसूस करवाएगा. मैंने उस रात बाद में सोचा कि शायद मैं ऐसी अकेली 40 साल की महिला हूं, जो फिर से कभी 22 की नहीं होना चाहती. 22 साल की उम्र में, मुझे अपने बॉस से प्यार हो गया. फिर 24 की उम्र में मैंने उसके भयानक नतीजे झेले.

क्या यहां बैठे लोगों में से ऐसे शख्स हाथ उठाएंगे, जिनसे 22 की उम्र में कोई गलती नहीं हुई या ऐसा कुछ जिसका उन्हें पछतावा नहीं है? बिल्कुल. मैंने ठीक सोचा था कि ऐसा कोई नहीं होगा. तो मेरी ही तरह 22 साल में आपमें से कुछ लोग गलत रास्तों पर चले होंगे और गलत लोगों के प्यार में पड़े होंगे. हो सकता है अपने बॉस के प्यार में, लेकिन मेरी तरह शायद आपके बॉस अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं रहे होंगे. सच है कि जिंदगी अजूबों से भरी पड़ी है. एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जब मुझे अपनी गलती याद नहीं कराई जाती. वैसे मुझे अपनी गलती का भरपूर पश्चाताप भी है.

मोनिका लेविंस्कीः शायद मैं ऐसी अकेली 40 साल की महिला हूं, जो फिर से कभी 22 की नहीं होना चाहती

1998 में मैं पहली बार ऐसे रोमांस के भंवर में फंसी जिसका अंत होना ही नहीं था. फिर ऐसे भयानक राजनीतिक, कानूनी और मीडिया के भंवर में फंसी जैसा मैंने कभी न देखा था और न सोचा था. याद कीजिए 1988 से सिर्फ कुछ साल पहले तक समाचार सिर्फ तीन जगहों से मिलते थे अखबार या मैगजीन पढ़ कर, रेडियो सुन कर या टीवी देख कर. लेकिन, मेरे भाग्य में कुछ और था. इस स्कैंडल की खबर आप तक डिजिटल क्रांति के जरिये आई. इसका अर्थ यह था कि जब हम चाहें, जहां चाहें जानकारी पा सकते थे और जब जनवरी 1998 में ये खबर निकली, तो वो ऑनलाइन निकली. पहली बार ऐसा हुआ कि पारंपरिक मीडिया को इंटरनेट ने पछाड़ दिया था. एक बड़ी खबर को लेकर एक क्लिक जो सारी दुनिया में गूंज उठी थी.

निजी तौर पर मेरे लिए इसका मतलब था कि रातोंरात मैं पूरी तरह से गुमनाम शख्स से सारी दुनिया में बदनाम शख्स में बदल गई. मैं पहली शिकार थी अपनी सारी प्रतिष्ठा पूरे विश्व में एक क्षण में गंवा देने की इस नई बीमारी की.

फैसला सुनाने की इस दौड़ को टेक्नॉलजी ने और हवा दी. वर्चुअल पथराव करने वालों की तो मानों भीड़ इकट्ठी हो गई थी. हालांकि तब तक सोशल मीडिया का जमाना नहीं आया था, मगर तब भी लोग ऑनलाइन कमेंट कर सकते थे. ईमेल में जानकारी और भद्दे कमेंट भेज सकते थे. समाचार मीडिया ने मेरी तस्वीरों को हर जगह चिपका डाला. अखबार और ऑनलाइन बैनर विज्ञापन बेचने के लिए और लोगों को टीवी से चिपकाने के लिए. आपको मेरी कोई खास तस्वीर याद आती है, वो बेरेट टोपी पहनी हुई?

देखिए, मैं अपनी गलती मानती हूं. खासकर उस टोपी को पहनने की. मगर जो छीछालेदर मेरी की गई, इस खबर की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर मेरी, वह सच में ऐतिहासिक थी. मेरी ब्रांडिंग कर दी गई. बदचलन, आवारा, वेश्या, स्लट, बेवकूफ. जाहिर है उस टाइप की औरत. बहुत लोगों ने मुझे देखा, मगर बहुत कम ने मुझे जाना और मैं इसे समझ सकती हूं. बहुत आसान है ये भूलना कि ‘उस टाइप की औरत’ का एक वजूद था, उसकी भी आत्मा थी. एक जमाने में वह ऐसी टूटी हुई बिखरी हुई नहीं थी.

जब 17 साल पहले मेरे साथ ये हुआ, इसके लिए कोई नाम नहीं था. अब हम इसे साइबर बुलींग और ऑनलाइन उत्पीड़न कहते हैं. आज मैं आपके साथ अपने कुछ अनुभव बांटना चाहती हूं. उन अनुभवों की रोशनी में अपने कल्चर पर कुछ टिप्पणियां करना चाहती हूं. बताना चाहती हूं कि मैं कितनी आशा रखती हूं कि इसके जरिये ऐसा बदलाव आएगा, जिससे कुछ और लोगों के जीवन में कुछ परेशानी कम होगी.

मोनिका लेविंस्कीः फैसला सुनाने की दौड़ को टेक्नॉलजी ने हवा दी. वर्चुअल पथराव करने वालों की तो भीड़ इकट्ठी हो गई थी

1998 में मैंने अपनी प्रतिष्ठा और आत्म-सम्मान खो दिया. मेरा लगभग सब कुछ लुट गया था. मैं आपके लिए एक दृश्य रचती हूं. सितंबर 1998 है. मैं बिना किसी खिड़की वाले ऑफिसनुमा कमरे में बैठी हूं. इंडिपेंडेंट कॉउंसिल के ऑफिस में, चमकती हुई ट्यूबलाइट की रोशनी में मैं अपनी ही आवाज सुन रही हूं. फोन कॉल से आती मेरी आवाज जो गुप्त रूप से मेरे एक तथाकथित दोस्त द्वारा लगभग एक साल पहले टेप की गई थी.

मैं वह सुन रही हूं क्योंकि कानूनन मुझे उन्हें सुनना ही पड़ेगा. निजी रूप से 20 घंटे लंबे उन टेपों की वैधता सुनिश्चित करने के लिए. पिछले आठ महीनों से इन टेपों में जमा सामग्री मेरे ऊपर तलवार की तरह लटक रही थी. मतलब, कौन याद रख सकता है कि एक साल पहले उसने क्या कहा था? सहमी हुई और बेइज्जत, मैं सुन रही हूं. खुद को राष्ट्रपति के प्रति अपने प्यार का इजहार करते हुए और फिर अपने दिल टूटने का जिक्र करते हुए. कभी-कभी तेज-तर्रार, कभी बस नासमझी भरी, कभी खराब बर्ताव करती, कभी असभ्य सुन रही हूं. अंदर तक, गहरे भीतर तक शर्मिंदा. अपने सबसे खराब स्वरूप का सामना करती. ऐसा रूप जिसे मैं पहचान तक नहीं पाती.

कुछ दिन बाद संसद में स्टार रिपोर्ट पेश होती है. इसमें वे सारे टेप, वे चुराई गई बातचीत सम्मिलित हैं. ये डरावना है कि लोग उन सब बातों को पढ़ सकते हैं और कुछ सप्ताह बाद ऑडियो टेप टीवी पर सुनाए जाते हैं. उसमें ज्यादातर हिस्सा ऑनलाइन रिलीज होता है. पब्लिक में होने वाला अपमान दर्दनाक था. मुझसे जीवन ढोया नहीं जाता था.

1998 में ऐसे किस्से हरदिन नहीं होते थे. ऐसे किस्सों से अर्थ है आपकी इजाजत के बिना चोरी से लोगों की निजी वार्तालाप और निजी क्रियाकलापों की और फोटो से, और फिर उन्हें सार्वजनिक करने से.

बिना किसी संदर्भ के सार्वजनिक करने से. 12 साल आगे चलते हैं 2010 में और एक नया सोशल मीडिया जन्म ले चुका है. दुर्भाग्य से, मेरे साथ जो हुआ, वह आम बात हो चुकी है, भले ही किसी ने कोई गलती की हो या नहीं, भले ही ये पब्लिक फिगर हो या आम आदमी. कुछ लोगों के लिए इसके नतीजे बहुत ही ज्यादा बुरे साबित हुए.

मैं अपनी मां से फोन पर बात कर रही थी. सितंबर 2010 में. हम एक खबर का जिक्र कर रहे थे, रुट्गर यूनिवर्सिटी के फर्स्ट ईयर के युवा छात्र, टाइलर क्लेमेंटी के बारे में. प्यारा, संवेदनशील और रचनात्मक टाइलर का एक ऐसा वीडियो उसके रूममेट ने बना लिया जिसमें वह एक और आदमी के साथ अंतरंग होता दिखता था. जब ऑनलाइन दुनिया को इस वाकये की खबर लगी, तो भद्दी बेइज्जती और साइबर बुलींग का विस्फोट हो गया. कुछ दिन बाद, टाइलर ने जॉर्ज वॉशिंगटन पुल से छलांग लगा कर जान दे दी. वह महज 18 साल का था.

मोनिका लेविंस्कीः मेरे माता-पिता को हरदम डर लगता था कि इतनी बदनामी मेरी जान ले कर रहेगी

टाइलर और उसके परिवार के बारे में सोच कर मेरी मां अपना आपा खो बैठी थीं. वह असहनीय दु:ख से भर गई थीं. पहले-पहल मुझे यह समझ नहीं आया, लेकिन धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि वह 1998 को फिर से जी रही थीं. उन दिनों जब वह हर रात मेरे सिरहाने बैठ कर बिताती थीं. उस समय जब वह मुझे बाथरूम का दरवाजा बंद नहीं करने देती थीं. जब मेरे माता-पिता को हरदम डर लगता था कि इतनी बदनामी मेरी जान ले कर रहेगी, सचमुच.

आज, बहुत सारे माता-पिता को ये मौका ही नहीं मिल पाता है कि वे अपने बच्चों को बचा पाएं. बहुत लोगों को अपने बच्चों की परेशानी का पता तब लगता है जब बहुत देर हो चुकी होती है. टाइलर की दुखद, बेमतलब मौत मेरे लिए बहुत निर्णायक क्षण बनी. उस घटना ने मेरे अनुभवों को एक नया संदर्भ दिया. मैंने अपने आसपास फैले शोषण और जोर-जबरदस्ती को महसूस किया. मैंने नए सिरे से देखना शुरू किया.

1998 में हमारे पास ये जानने का कोई तरीका नहीं था कि ये नई तकनीक जिसे हम इंटरनेट कहते थे, हमें कहां ले जाएगी? तब से, इंटरनेट ने लोगों को नए तरीकों से जोड़ा है, बिछड़े भाई-बहनों को मिलाया है, तमाम जानें बचाई हैं, आंदोलन शुरू कराए हैं. मगर जो साइबर बुलींग, और स्लट बताकर की गई शर्मिंदगी मैंने देखी, वह कई गुना बढ़ी है. हर दिन, ऑनलाइन खासतौर पर कम उम्र के लोग, जो इससे निपटने के लिए तैयार तक नहीं हैं, इतने शोषित और प्रताड़ित होते हैं कि वह अगले दिन तक जीना भी नहीं चाहते. कुछ तो सच में जीते भी नहीं और ये ऑनलाइन नहीं असल दुनिया में होता है.

यूके की एक संस्था चाइल्डलाइन जो कि कई तरह से युवाओं की मदद करती है, ने पिछले साल एक तथ्य जारी किया था. 2012-2013 के बीच साइबर बुलींग से जुड़ी ईमेल और फोन कॉल में 87 प्रतिशत की बढ़त देखी गई है. नीदरलैंड में की गई एक रिसर्च में पहली बार यह पता लगा कि साइबर बुलींग खुदकुशी की बड़ी वजह बन रहा है. मुझे ये जान कर बड़ा झटका लगा कि प्रताड़ित किए जाने की भावना को लोग ज्यादा महसूस कर रहे हैं, बजाय खुशी के या गुस्से के. सार्वजनिक शर्मिंदगी की बहुत निजी तौर पर कीमत चुकानी होती है और इंटरनेट के चलते चुकाई गई कीमत कई गुना बढ़ चुकी है.

ऑनलाइन दुनिया में संवेदनहीनता की इजाजत सी मिल गई है

लगभग पिछले दो दशकों से हम धीरे-धीरे शर्मिंदगी और सार्वजनिक बेइज्जती के बीज बोते आ रहे हैं. वह भी अपनी संस्कृति की जमीन में ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से. गप्प-गॉसिप वेबसाइट, पापारात्जी कैमरा, रियलटी टीवी, राजनीति, समाचार मीडिया और कभी-कभी हैकर भी, इस प्रताड़ना का हिस्सा बनते हैं.

ऑनलाइन दुनिया में संवेदनहीनता की इजाजत सी मिल गई है. इससे कुछ ऐसा पैदा हुआ है जिसे प्रोफेसर निकोलस मिल्स प्रताड़ना के कल्चर का नाम देते हैं. पिछले कई महीनों के कुछ बड़े उदाहरण ले कर देखिए. स्नैप-चैट, एक ऑनलाइन सर्विस जो ज्यादातर युवा इस्तेमाल करते हैं कुछ ही क्षणों में संदेशों को मिटाने का दावा करती है. आप समझ सकते हैं कि किस तरह के संदेश वहां चलते होंगे.

जेनिफर लॉरेंस और कई और फिल्म कलाकारों का आई-क्लॉउड हैक हो गया और उनके निजी, नग्न फोटो पूरे के पूरे इंटरनेट पर सार्वजनिक हो गए. वह भी बगैर उनकी इजाजत के. एक गप्प-गॉसिप वेबसाइट पर 50 लाख बार हिट हुआ सिर्फ इस एक खबर के लिए. और सोनी पिक्चर की हैकिंग? जिन दस्तावेजों को सबसे अधिक देख गया वे निजी ईमेल थे.

मगर प्रताड़ना के इस कल्चर में, सार्वजनिक शर्मिंदगी से प्राइस-टैग भी जुड़े हैं. ये प्राइस-टैग पीड़ित द्वारा चुकाई गई कीमत को नहीं नापते, जो टाइलर और कई और लोगों को, खासकर औरतों और अल्पसंख्यकों को चुकानी पड़ती है. और एलजीबीटीक्यू लोगों ने चुकाई है, मगर ये प्राइस-टैग बखूबी नापता है इस से पैदा होने वाले मुनाफे को. दूसरों पर दक्षता से होता है, और पैकेज कर के मुनाफे में बेचा जाता है.

इसका एक बाजार विकसित हुआ है जहां सार्वजनिक शर्मिंदगी बिकती है और प्रताड़ना एक इंडस्ट्री बन गई है. आखिर पैसा बनता कैसे है? क्लिक्स से. जितनी शर्मिंदगी, उतने क्लिक्स. जितने क्लिक्स, उतने विज्ञापनी डॉलर. हम खतरनाक भंवरजाल में हैं. जितना ही हम इस तरह की चीजों को क्लिक करेंगे, उतना ही हम असंवेदनशील होंगे उन खबरों के पीछे छिपे इंसानों के प्रति. और जितने हम संवेदनहीन होंगे, उतना ही हम क्लिक करेंगे. और पूरे समय कोई इससे पैसा कमा रहा होगा किसी और के दुख परेशानी और उत्पीड़न के जरिये.

हर क्लिक के जरिये हम एक विकल्प चुनते हैं. जितना ही हम अपने कल्चर को सार्वजनिक शर्मिंदगी से भरेंगे, उतना ही यह स्वीकार्य होता जाएगा. नतीजतन उतनी ही साइबर बुलींग, हैकिंग, धमकी और ऑनलाइन उत्पीड़न. क्यों? क्योंकि इन सबके जड़ों में शर्मिंदगी है. ये बर्ताव उस कल्चर का लक्षण है जो हमने रचा है. जरा इस बारे में थोड़ा सोच कर देखिए.

मोनिका लेविंस्कीः रातोंरात मैं पूरी तरह से गुमनाम शख्स से सारी दुनिया में बदनाम शख्स में बदल गई

बर्ताव में बदलाव शुरू होता है बदलते मूल्यों से. हमने ये होते देखा है रेसिस्म, होमोफोबिया और ऐसे ही कई और चीजों में. आज और इतिहास में हमारे नजरिये में बदलाव आया है. ज्यादा से ज्यादा लोगों को बराबरी मिली है. जब हम निरंतरता को तवज्जो देने लगते हैं, ज्यादा से ज्यादा लोग कूड़े को रिसाइकिल करने लगते हैं. तो जहां तक हमारे कल्चर के प्रताड़ना वाले हिस्से का सवाल है, हमें एक सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है. सार्वजनिक शर्मिंदगी का यह खूनी खेल बंद करना ही पड़ेगा. अब समय आ गया है इंटरनेट के कल्चर में हस्तक्षेप करने का.

शुरुआत किसी छोटी चीज से होगी और ये आसान नहीं होगा. हमें संवेदनशीलता और सहानुभूति की ओर वापस जाना होगा. ऑनलाइन दुनिया में सहानुभूति और संवेदना की गहरी कमी है, बल्कि यूं कहें कि लगभग अकाल है. शोधकर्ता ब्रेन ब्राउन का कहना है, ‘प्रताड़ना सहानुभूति के सामने नहीं ठहर सकती.’ मैंने अपने जीवन में कुछ बहुत खराब अंधेरे दिन देखे हैं. ये मेरे परिवार, दोस्तों और साथियों की सहानुभूति और संवेदना ही थी, कभी-कभी अजनबियों की भी कि मैं बच गई.

किसी एक इंसान से मिलती सहानुभूति भी बड़ा फर्क ला सकती है. माइनॉरिटी इनफ्लुएंस की थ्योरी, सामजिक मनोविज्ञानी सेर्गे मोस्कोविसी द्वारा दी गई है. यह बताती है कि बहुत कम संख्या में ही सही, जब लंबे समय तक कुछ चले, तो बड़ा फर्क आ सकता है. ऑनलाइन दुनिया में हम इस माइनॉरिटी इनफ्लुएंस को ला सकते हैं. खिलाफत करने का मतलब है चुपचाप खड़े नहीं रह जाना है. हम किसी के लिए सकारात्मक कमेंट कर सकते हैं, साइबर बुलींग होती देख कर शिकायत दर्ज कर सकते हैं. मेरा यकीन मानिए, सकारात्मक कमेंट से नकारात्मकता खत्म होती है.

हम एक विरोध का कल्चर भी ला सकते हैं. उन संस्थाओं को सहारा देकर जो इन मुद्दों पर काम कर रही हैं. जैसे कि यूएस की टाइलर क्लेमेंटी फॉउंडेशन. यूके में एंटी बुलींग प्रो है, ऑस्ट्रेलिया में, प्रोजेक्ट रोकिट है. और ये सिर्फ मेरे अकेले के बारे में नहीं है. कोई भी जो शर्मसार और सार्वजनिक रूप से उत्पीड़ित है, वह यह एक बात जान लें कि वह उससे लड़ सकता है और आगे बढ़ सकता है. मुझे पता है कि ये बहुत मुश्किल है, बहुत दर्द भरा. आसान बिल्कुल भी नहीं और लंबा सफर. मगर आप अपनी कहानी को एक अलग अंत दे सकते हैं. अपने प्रति सहानुभूति और संवेदना रख के. हम सब संवेदना के पात्र हैं और ऑनलाइन और ऑफलाइन, संवेदनशील दुनिया में रहने के हकदार भी हैं.

(टेड के लिए अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद स्वप्निल दीक्षित ने और संपादन वत्सला श्रीवास्तव ने किया है. टेड वीडियो सुनने के लिए यहां क्लिक करें)

First published: 6 January 2016, 8:06 IST
 
मोनिका लेविंस्की @catchhindi

अमेरिका के व्हाइट हाउस की पूर्व इंटर्न. फ़ैशन डिज़ाइनर, टीवी पर्सनैलिटी और एक्टिविस्ट.

पिछली कहानी
अगली कहानी