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ईरान दौरे से नरेंद्र मोदी क्या हासिल कर सकते हैं?

रवि जोशी | Updated on: 18 May 2016, 8:05 IST
QUICK PILL
  • भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 मई को पहली बार ईरान जा रहे हैं. मोदी से पहले सुषमा स्वराज, धर्मेंद्र प्रधान और नितिन गडकरी ईरान की यात्रा कर चुके हैं.
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटने के बाद ईरान अंतरराष्ट्रीय कारोबार में तेजी से वापसी कर रहा है. ईरान पर प्रतिबंध लगे होने के बावजूद भारत ने उससे संबंध बनाए रखे थे. अब दोनों देश कई मुद्दों पर आपसी सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 मई को पहली बार ईरान जा रहे हैं. हालांकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पहले ही ईरान का दौरा कर चुके हैं.

इन सभी नेताओं ने ईरान के साथ भारत के संबंध मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक योगदान दिया. लेकिन माना जा रहा है कि पीएम मोदी के दौरे में दोनों देश कुछ बड़े रणनीतिक फैसले ले सकते हैं.

भारतीय रणनीतिकारों को अच्छी तरह पता है कि पश्चिम एशिया में ईरान एक बड़ी ताकत है. उसका इराक़, सीरिया, लेबनान, बहरीन, यमन और सऊदी अरब जैसों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष काफी प्रभाव है.

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ईरान शिया-बहुल देश है. अमेरिकी समर्थन प्राप्त कई खाड़ी देश ईरान पर सुन्नी-बहुल देशों में बगावत को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहे हैं. हालांकि इसके ठोस सुबूत सामने नहीं आए हैं.

ईरान अपने हित के साथ ही इराक़ और सीरिया के शियाओं, अलावियों और लेबनान के हिज्बुल्लाह सहित कई अन्य देशों में मौजूद शियाओं के हितों की रक्षा करता रहा है.

नरेंद्र मोदी पहली बार ईरान के दौरे पर जा रहे हैं. उनसे पहले सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी जा चुके हैं ईरान

अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए गए करीब एक दशक लंबे प्रतिबंध से ईरान की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा था लेकिन इससे देश की राजनीतिक व्यवस्था डगमगाई नहीं. पश्चिमी देशों की उम्मीद के उलट आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद ईरानी जनता ने अयातुल्लाह खामनेई या सरकार के खिलाफ बगावत नहीं की.

अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी के साथ परमाणु समझौता करने के बाद ईरान दोबारा अंतरराष्ट्रीय कारोबार में वापस आ गया है. ईरान के 100 अरब अमेरिकी डॉलर की पूंजी दुनिया के विभिन्न बैंकों में सीज पड़ी थी. अब वो उसका इस्तेमाल कर सकेगा. ईरान के केंद्रीय बैंक को उसका आईएफएससी कोड वापस मिल चुका है.

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प्रतिबंध के दौरान ईरान से भारत के तेल आयात में 40 प्रतिशत कमी आ गई थी. प्रतिबंध हटने के बाद ईरान से तेल का आयात फिर से बढ़ने लगा है.

ईरान पर प्रतिबंध के बावजूद भारत ने हमेशा उसके साथ अपने रिश्ते बनाए रखे. अगस्त, 2012 में भारतीय पीएम मनमोहन सिंह ईरान की राजधानी तेहरान में हुए गुट निरपेक्ष सम्मेलन में शामिल होने गए थे. जबकि अमेरिका समेत कई देश उनकी यात्रा के खिलाफ थे. मनमोहन ने अपनी यात्रा से ईरान के प्रति भारतीय रुख को साफ कर दिया था.

मोदी के लिए मौका


नरेंद्र मोदी के पास ईरान की नजर में भारतीय साख का फायदा उठाने का अच्छा मौका है. मोदी सबसे पहले तो 'इंडिया-ईरान इकोनॉमिक कॉरिडोर' के निर्माण की घोषणा करनी चाहिए. इससे भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जुड़ जाएगा. भारत को चाबहार बंदरगाह का निर्माण कार्य की भी समीक्षा करनी होगी. इस बंदरगाह को इस साल के अंत तक पूरा होना है.

भारत को चाहबहार से जाहेदान तक रेलवे लाइन के निर्माण के मुद्दे को भी सुलझाना होगा. जाहेदान कस्बा अफगानिस्तान क सीमा के करीब है. इस रेलवे लाइन के निर्माण से इसे जारांज-डेलाराम हाईवे से जोड़ा जा सकेगा. इस हाईवे को भारत और अफगानिस्तान मिलकर बना रहे हैं.

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भारत ने रेलवे लाइन के निर्माण में भारी लागत लगने के अनुमान के बाद इससे अपना हाथ खींच लिया था. अब खबर आ रही है कि भारत और ईरान कुल खर्च में आधा-आधा हिस्सा देंगे.
 
मोदी को भारत-ईरान-अफगानिस्तान ट्रांजिट एग्रीमेंट पर भी अंतिम मुहर लगानी होगी. अफगानिस्तान पहले ही कुछ संशोधनों के साथ भारत के मसौदे पर सहमत हो चुका है. माना जा रहा है कि ईरान समझौते के लिए अपना मसौदा पेश करेगा.

राज्य प्रायोजित आतंकवाद पर भारत और ईरान को आपसी सहयोग को बढ़ावा देने की जरूरत है

भारत को फरजाद बी गैस फील्ड में दोबारा गैस निकालने का काम शुरू करना होगा. इस गैस फील्ड को दोबारा भारतीय कंपनी ओएनजीसी के नेतृत्व वाले कंसॉर्शियम को सौंप दिया गया है.

भारत को ईरान से आयात किए गए तेल की कीमत की भुगतान का मुद्दा भी सुलझाना होगा. ईरान का भारत पर करीब 6.5 अरब अमेरिकी डॉलर बाकी है. ईरान की मांग है कि भारत उसे ये पैसा यूरो में दे. यूरोप के ज्यादातर बैंक अमेरिका के सेकेंडरी प्रतिबंधों को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है. जिसकी वजह से ये मामला फंसा हुआ है.

हालांकि फ्रांस और जर्मनी जिस तरह से ईरान में निवेश को लेकर बेचैन हैं उसे देखते हुए लगता है कि यूरो में भुगतान का मामला जल्द सुलझ जाएगा.

भारत को गैस आयात के लिए ईरान-ओमान-इंडिया सी-लिंक की संभावनाओं को भी खंगाला चाहिए. अगर ऐसा होता है तो ईरान-पाकिस्तान-इंडिया गैस पाइपलाइन की अटकलों पर विराम लग जाएगा.

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शिक्षा, विज्ञान एवं तकनीकी, वाणिज्य इत्यादि के क्षेत्र में भारत को ईरान के द्विपक्षीय समझौतों को और भी मजबूत करने की जरूरत है. ईरान भारतीय शिक्षा संस्थानों में नैनो टेक्नोलॉजी, स्पेस साइंस, एयरोनॉटिक्स और मिसाइल टेक्नोलॉजी जैसे विषयों में ईरानी छात्रों को ज्यादा मौके तलाश करता रहा है.

व्यापार के मामले में भारत को ज्यादा गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि फिलहाल दोनों देशों के बीच का आयत-निर्यात संतुलन ईरान की तरफ झुका हुआ है. भारत को आईटी, फाइनेंस, बैंकिंग और इंश्योरेंस, हेल्थ, फार्मा जैसे क्षेत्रों से जुड़े निर्यात को बढ़ावा देने पर जोर देना होगा.

पश्चिमी देशों, रूस और चीन के साथ ईरान के बढ़ते कारोबारी संबंधों को देखते हुए भारत के पास बहुत ज्यादा कारोबारी मौके नहीं है. ऐसे में भारत को हर मौका का अधिक से अधिक लाभ उठाना होगा.

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राजनीतिक मोर्चे पर भारत और ईरान दोनों राज्य प्रायोजित आंतकी समूहों का मुकाबला कर रहे हैं. ईरान तालिबान और इस्लामिक स्टेट से और भारत लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से लड़ रहा है. कुछ पाकिस्तानी आतंकी समूहों ने शिया मुसलमानों पर हमले किए थे. ऐसे समूहों के खिलाफ साझा रणनीति दोनों देशों की फौरी जरूरत है.

संक्षेप में कहें तो दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग से दोनों को काफी फायदा हो सकता है. बस देखना ये है कि दोनों देशों के नेता इस मौके का कितना लाभ उठाते हैं.

First published: 18 May 2016, 8:05 IST
 
रवि जोशी

Retired diplomat, presently a Visiting Fellow, Observer Research Foundation.

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