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पठानकोट आतंकी हमला पाकिस्तानी सेना का तीसरा 'संकेत' है

विवेक काटजू | Updated on: 4 January 2016, 20:25 IST
QUICK PILL
  • पठानकोट में हुए आतंकी हमले से भारत और पाकिस्तान के संबंध बेहतरी की उम्मीदों पर सवाल खड़े हो गये हैं. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पाक सेना की भूमिका के मद्देनजर बनानी होगी भविष्य की रणनीति.
  • पाकिस्तानी सेना ने बार-बार भारत को ये संकेत दिया है कि पाक सेना के बिना दोनों देशों के बीच किसी भी तरह की शांति वार्ता संभव नहीं.

पठानकोट के वायुसेना ठिकाने पर हुए आतंकी हमले के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान नीति समीक्षकों के रडार पर आ गयी है. लोग इसके आधार और विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं, जिनका जवाब प्रधानमंत्री को देना होगा.

कुछ लोग कह सकते हैं कि दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू होने पर इस तरह की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है. ऐसे तत्व दोनों देशों के बीच 'इतिहास बदल सकने वाली' बातचीत को पटरी से उतारना चाहते हैं. लेकिन आतंकवाद के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध नरेंद्र मोदी के बचाव के लिए ऐसे तर्क पर्याप्त नहीं हैं.

पठानकोट हमला पाकिस्तानी सेना का नरेंद्र मोदी को दिया गया तीसरा संदेश है

पाकिस्तानी सेना देश के अंदर और बाहर पाकिस्तान की भारत नीति तय करती है. वो चाहती है कि उसके दोस्त और दुश्मन दोनों ये बात याद रखें. इसलिए वो जब भी जरूरी समझती है एक संदेश देती है. जो अक्सर बहुत ही क्रूर होता है. जिसका एकमात्र मक़सद पाकिस्तान में अपनी हैसियत बताना होता है.

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नरेंद्र मोदी के प्रति पाकिस्तानी सेना के रवैये से भी ये बात साफ होती है. ख़ासकर तब जब मोदी नवाज़ शरीफ़ से रिश्ते बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं. कम से कम तीन मौक़ों पर पाक सेना ने साफ़-साफ़ अपनी गैर-रजामंदी को जाहिर किया. पठानकोट का हमला इनमें सबसे ताज़ा है.

पाकिस्तानी सेना के तीन संकेत


मई, 2014 में नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नवाज़ शरीफ़ को निमंत्रित किया था. शरीफ़ के भारत में क़दम रखने से पहले ही लश्कर-ए-तैयबा ने अफ़ग़ानिस्तान स्थिति भारतीय उच्चायोग पर हमला कर दिया. सौभाग्यवश भारतीय सुरक्षा बलों ने हमले को विफल कर दिया. लश्कर को पाक सेना के हाथों की कठपुतली माना जाता है.

पाक सेना का दूसरा संकेत नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ़ की रूस के उफ़ा के बाद आया था. मोदी और शरीफ़ पिछले साल 10 जुलाई को मिले थे. इस बैठक में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) के बीच दिल्ली में आतंकवाद के मुद्दे पर समग्र बातचीत के लिए बैठक करने पर रजामंदी बनी थी.

पाकिस्तानी सेना नरेंद्र मोदी के लाहौर यात्रा को एक कूटनीतिक चाल की तरह देखती है

पाक सेना के अधिकारियों को ये नागवार गुजरा. पाक सेना ने दोनों एनएसए की बैठक में जम्मू-कश्मीर का मुद्दा शामिल करने और भविष्य की बातचीत की रूपरेखा पहले तय किए जाने पर जोर दिया. 27 जुलाई को गुरदासपुर में एक आतंकी हमला हुआ. एक पुलिस सुपरिटेंडेंट की हमले में जान चली गयी. ख़ास बात ये थी कि ये हमला जम्मू-कश्मीर की बजाय पंजाब में हुआ.

पाकिस्तान ने पिछले साल अक्टूबर में रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल नासिर जंजुआ को एनएसए बनाया. दिसंबर में बैंकॉक में दोनों देशों के एनएसए के बीच बैठक हुई. उनके साथ दोनों देशों के विदेश सचिव भी थे. जाहिर है कि नरेंद्र मोदी ने बातचीत की जगह और विषय पर समझौता किया था. पाकिस्तानी सेना ऐसे समझौतों को कमजोरी की तरह देखती है.

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पठानकोट में हुआ आतंकी हमला पाक सेना का तीसरा संकेत है. 25 दिसंबर को नरेंद्र मोदी अचानक लाहौर पहुंच गये. उस दिन नवाज़ शरीफ़ का जन्मदिन और उनके नातिन की शादी भी थी. दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच ऐसी अनौपचारिक मुलाकात पाक सेना को नागवार गुजरी होगी. लेकिन ये मामला सिर्फ इतना नहीं था.

पाकिस्तान जाने से पहले मोदी अफ़ग़ानिस्तान गये थे. उन्होंने वहां भारत द्वारा निर्मित नए संसद भवन का उद्घाटन किया. उस समय मोदी ने परोक्ष रूप से पाकिस्तान पर अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था. मोदी की टिप्पणी बिल्कुल उचित और न्यायोचित थी. लेकिन पाक सैन्य अधिकारियों को इससे नाराज ही होना था, वो हुए.

पठानकोट आतंकी हमले से ये साफ़ हो गया है कि पाक सेना दोनों देशों के बीच शांति बहाली नहीं चाहती

पाक सेना ने नरेंद्र मोदी के रुख को एक कूटनीतिक चाल के रूप में देखा. पाक सेना के अनुसार मोदी ये सब पश्चिमी देशों को ये संदेश देने के लिए कर रहे हैं कि भारत शांति और विकास के लिए प्रतिबद्ध है. ऐसे में मोदी की लाहौर यात्रा से पाक सैन्य अधिकारियों की दूरी पर किसी को अचरज नहीं हुआ. 

मोदी और शरीफ़ की लाहौर मुलाकात में पाकिस्तानी एनएसए की गैर-मौजूदगी ने इस सोच को और हवा दी. पाकिस्तानियों ने कहा कि उनके विदेश सचिव ने इस बैठक में केवल इसलिए शिरकत की थी कि क्योंकि वो उस दिन लाहौर में मौजूद थे. पाकिस्तानी एनएसए नासिर जंजुआ उस दिन इस्लामाबाद में मौजूद थे. वो समय रहते लाहौर नहीं पहुंच सके. शरीफ़ के विदेश नीति सलाहकार तारिक़ फ़ातिमी और सरताज अज़ीज़ भी बैठक में नहीं शामिल हो सके थे.

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इस्लामाबाद से नहीं पहुंच पाने की बात आसानी से हजम नहीं होती क्योंकि भारतीय उच्चायुक्त टीएसए राघवन भी इस्लामाबाद में थे और वो बैठक में पहुंच गये थे.

पठानकोट हमले से ये साफ़ हो गया है कि पाक सेना दोनों देशों के बीच शांति नहीं चाहती. पाक सेना ये संदेश देना चाहती है कि अगर मोदी दोनों देशों के बीच शांति बहाल करके इतिहास बनाना चाहते हैं तो वो अफ़ग़ानिस्तान में पाक पर कमेंट करके लाहौर में जलपान नहीं कर सकते.

जंजुआ के एनएसए बनाये जाने के बाद मोदी को लगा था कि शरीफ़ के साथ होने वाली बातचीत को पाक सेना का समर्थन हासिल है. पाक सैन्य अधिकारियों ने संकेत देने की कोशिश की है कि बातचीत का नेतृत्व उनके हाथ में ही रहेगा. शरीफ़ा महज संदेशवाहक हैं. उफ़ा के बाद के हालात से ये साफ़ है कि भारत के संदर्भ में शरीफ़ की रजामंदी का कोई ख़ास मतलब नहीं है.

अगर मोदी इतिहास बदलना चाहते हैं तो वो पाकिस्तान की अंदरूनी सच्चाइयों से मुंह नहीं मोड़ सकते, ख़ासतौर पर वहां के वास्तविक सत्ता केंद्रों के बारे में. आतंकवाद के मुद्दे पर मोदी को पाक सैन्य अधिकारों को संज्ञान में रखते हुए आगे की रणनीति बनानी होगी. उन्हें ये याद रखना होगा कि ठोस नीतियों केवल चाहने भर से नहीं बनतीं.

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First published: 4 January 2016, 20:25 IST
 
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