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लाहौर हमला: क्या पाकिस्तान में एक और तख्तापलट की जमीन तैयार है?

वरीशा सलीम | Updated on: 5 April 2016, 11:22 IST

27 मार्च को ईस्टर के मौके पर लाहौर में हुए आत्मघाती हमले के बाद पाकिस्तानी पंजाब सूबे में सरकार और सेना का टकराव सामने आ गया है.

27 की शाम एक पार्क में हुए इस हमले में 72 लोग मारे गये थे और साढ़े तीन सौ से ज़्यादा घायल हुए थे. मरने वालों में ज़्यादातर ईसाई समुदाय के लोग थे जो ईस्टर की शाम पार्क में जमा हुए थे.

इस हमले के बाद तुरंत बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने रावलपिंडी में सेना और केंद्रीय ख़ुफ़िया एजेंसियों की एक उच्चस्तरीय बैठक की और लाहौर शहर के साथ-साथ पूरे सूबे में आतंक-निरोधी अभियान शुरू करने का आदेश जारी किया. सेना प्रवक्ता असीम बाजवा के एक ट्वीट के मुताबिक ये सैन्य अभियान रविवार देर रात से ही शुरू हो गया था.

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लेकिन पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ प्रशासित केंद्र और राज्य की सरकारें सूबे में सैन्य हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ हैं और सेना प्रमुख के कुछ हालिया बयानों से नाखुश हैं.

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जनरल जिया उल हक़

स्थानीय ख़बरों के मुताबिक पंजाब में सैन्य अभियान शुरू करने का 'एकतरफा' फैसला सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने सरकार को विश्वास में लिए बिना किया, यानि सरकार की सहमति नहीं ली गई.

पाकिस्तानी सेना पंजाब प्रांत में भी सैन्य अभियान चलाना चाहती है

इसके बाद दोनों पक्षों से आये कुछ विरोधाभासी बयान भी सेना और सरकार के बीच बढ़ते तनाव की तरफ इशारा करते हैं.

लाहौर धमाके के अगले दिन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने कहा कि स्थानीय पुलिस और जांच एजेंसियां मिलजुलकर इस घटना की जांच करेंगी और दोषियों को पकड़ने का काम करेंगी.

लेकिन उसी दिन जनरल राहील शरीफ ने बयान जारी किया कि सेना और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां स्थानीय पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग के साथ मिलकर काम नहीं करेंगी.

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30 मार्च को जारी एक बयान में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने एक बार फिर पंजाब में सैन्य हस्तक्षेप को खारिज किया. उनका कहना था कि पंजाब का कोई भी इलाका आतंकियों के कब्ज़े में नहीं है, इसलिए सैन्य कार्यवाई की कोई ज़रूरत नहीं है.

इसके अगले दिन, यानि 31 मार्च को इस मुद्दे पर पंजाब के मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ और केंद्रीय गृहमंत्री चौधरी निसार खान की जनरल राहील शरीफ से लंबी बातचीत भी बेनतीजा रही.

27 मार्च को ईस्टर के मौके पर लाहौर में हुए आत्मघाती हमले में 72 लोग मारे गए थे

सरकार की तरफ से कुछ भी साफ न कहे जाने के चलते पिछले सत्तर सालों में चार बार सैन्य तख्ता पलट देख चुके पाकिस्तान और स्थानीय मीडिया में अफवाहों का बाज़ार गर्म है.

इस बीच सेना का धर-पकड़ अभियान पिछले एक हफ्ते से जारी है और इसके तहत लगभग सात सौ से ज़्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इन कार्रवाईयों में लगभग दस संदिग्ध आतंकियों के मारे जाने की भी ख़बर है.

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जनरल परवेज मुशर्रफ

असल में सेना बहुत पहले से पंजाब में ऐसी कार्रवाई की मांग करती रही है. पिछले साल मई में जब प्रधानमंत्री शरीफ रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय के दौरे पर गये थे तब भी कथित पुख्ता सबूतों के बुनियाद पर सेना ने कम से कम दक्षिणी पंजाब को आतंक-विरोधी अभियान ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्म के तहत लाने की मांग रखी थी.

पाकिस्तान से उठ रही है बदलाव की हवा

लगभग दो साल पहले सरकार और पाकिस्तानी तालिबान के बीच शांति वार्ता असफल रहने और 8 जून 2014 को कराची अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए आतंकी हमले के बाद सेना ने देश के कई हिस्सों में ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्म शुरू किया था.

अफगानिस्तान की सीमा से लगे कबाइली इलाके वज़ीरिस्तान में और कराची में यह लड़ाई अभी भी जारी है.

दिसंबर 2014 में पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए भीषण हमले के बाद सेना ने आतंक के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई को और तेज तथा व्यापक किया है.

कराची आतंकी हमले के बाद सेना ने देश के कई हिस्सों में ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्म शुरू किया है

आतंकवाद और चरमपंथ के ख़ात्मे के लिए एक नेशनल एक्शन प्लान बनाया गया था. इसके तहत देशभर में मिलिट्री कोर्ट का गठन हुआ. फांसी पर लगी रोक हटा ली गई और मदरसों पर नज़र रखने की बात कही गई.

लेकिन इन सबके बावजूद भी पंजाब में सैन्य कार्रवाई की मंजूरी नहीं मिली जबकि सेना का कहना है कि पंजाब, खासकर सूबे का दक्षिणी इलाका आतंकियों का गढ़ बनता जा रहा है.

अंग्रेजी अख़बार डॉन में इसी साल जनवरी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिणी पंजाब में ऐसे हज़ारों मदरसे हैं जो आतंकी संगठनों के लिए 'लड़ाके' तैयार करते हैं.

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तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (पाकिस्तानी तालिबान) के अलावा पंजाब के लाहौर, फैसलाबाद, गुजरांवाला, खानेवाल, डेरा ग़ाज़ी खान, रहीमयार खान, मुजफ्फरगढ़ और गुजरांवाला आदि इलाकों में लश्कर-ए-झांगवी, सिपह-ए-सहाबा, जमात-उद-दावा, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-जिहदुल इस्लामी जैसे पचास से ऊपर प्रतिबंधित आतंकी समूह सक्रिय है.

तो सवाल उठता है कि आखिर क्यों पकिस्तान सरकार पंजाब में सैन्य कार्रवाई का विरोध कर रही है? कराची हवाई अड्डा और पेशावर स्कूल पर हुए हमलों के बाद सेना और सरकार के बीच जिस तरह की समझदारी और तालमेल देखने को मिला था, लाहौर मामले में वो एकता क्यों नहीं दिख रही?

इन सवालों का जवाब एक दूसरे अंग्रेजी दैनिक द न्यूज़ में 31 मार्च को छपी एक रिपोर्ट में मिलता है. रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ को डर है कि सूबे में सैन्य कार्रवाई का असर उनके पारम्परिक वोट बैंक पर पड़ेगा. रिपोर्ट का दावा है कि नवाज़ शरीफ कि पार्टी को ऐसे कई प्रतिबंधित समूहों का समर्थन हासिल है, और सैन्य कार्रवाई कि सूरत में यह रिश्ता बिगड़ सकता है.

पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ को डर है कि पंजाब में सैन्य कार्रवाई का असर उनके पारम्परिक वोट बैंक पर पड़ेगा

क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रान्त पंजाब पारंपरिक रूप से पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ की राजनीति का गढ़ रहा है.

342 सदस्यों (272 निर्वाचित और 60 मनोनीत) वाले पाकिस्तान की नेशनल असेंबली (पार्लियामेंट) में 183 सदस्य (148 निर्वाचित) पंजाब से आते हैं. ऐसे में जब केंद्र और राज्य दोनों जगह पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ की सरकार हो तो नवाज़ शरीफ की दुविधा भी समझी जा सकती है.

यह सब देखते हुए डॉन में रविवार को छपे एक लेख कि यह बात सही लगती है कि नवाज़ शरीफ पंजाब में सेना के पक्ष में नहीं हो सकते, क्योंकि अगर पंजाब गया तो उनके हाथ से सबकुछ चला जायेगा.

बहरहाल, सरकार की सहमति के बिना सेना के इस एकतरफा फैसले की आलोचना भी हो रही है. कुछ जानकारों और मीडिया के एक हिस्से का मानना है कि सरकार और स्थानीय एजेंसियों का साथ नहीं लिया गया तो सेना को इस लड़ाई में यथोचित परिणाम नहीं मिल सकता और लड़ाई बहुत लंबी खिंच सकती है.

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वहीं कुछ लोगों का विचार है कि वज़ीरिस्तान और सिंध से आतंकियों की सफाई अभियान के बाद अब समय आ गया है की सेना पंजाब की तरफ रुख करे.

इसी बीच कुछ लोग बीच-बचाव का रास्ता भी सुझा रहे हैं कि कराची की तरह पंजाब में भी ऐसे कामों कि जिम्मेदारी अर्धसैनिक बलों (रेंजर्स) को सौंप दी जाय.

पाकिस्तानी सेना के अतीत को देखते हुए सिविलियन सरकार के साथ टकराव और तख्तापलट की आशंका हमेशा बनी ही रहती है.

First published: 5 April 2016, 11:22 IST
 
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