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नेपाल नाकाबंदीः आलोचना के बावजूद भारत को प्रयास जारी रखने होंगे

शिव मुखर्जी | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • नेपाल में गतिरोध और मधेसी आंदोलन को लेकर भारत की नेपाल नीति की कुछ लोग आलोचना कर रहे हैं. पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी रविवार को भारत सरकार की इस संदर्भ में आलोचना की है.
  • नेपाल की मौजूदा सरकार कर रही है मधेसियों की मांग की अनदेखी. भारत को संवाद के माध्यम से इस राजनीतिक मामले का राजनीतिक समाधान तलाशना होगा.

नेपाल को सात साल और दो संविधान सभा चुनावों के बाद नया संविधान मिला. लेकिन अब वो एक ऐसे गतिरोध का सामना कर रहा है जिसे भारत ने उसपर थोप दिया है. थोपा नहीं भी हो तो कम से कम भारत की उसके साथ मौन सहमति है.

वैचारिक मतांतर एक मजबूत लोकतंत्र की पहचान है. इसलिए नेपाल में हालिया घटनाक्रम के मद्देनजर  देश में भारत की नीतियों की हो रही आलोचना को समझा जा सकता है.

भारत के पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने रविवार को भारतीय अखबार द इंडियन एक्सप्रेस में भारत की मौजूदा नेपाल नीति की आलोचना की है.

चिदंबरम की सीख

आलोचकों का कहना है कि भारत अपने पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी कर रहा है. यह मधेसियों के आंदोलन का समर्थन कर रहा है. जिससे नेपाल में भारत विरोधी भावना बढ़ती जा रही है जो भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है. 

इससे भारत की घोर कूटनीतिक विफलता जाहिर होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल की दो सफल यात्राओं और भूकंप के बाद बड़े पैमाने पर किए गए राहत-बचाव कार्यों से वहां बनी भारत की प्रतिष्ठा खराब हो गई है. 

चिदंबरम ने भारत की तमाम गलतियों को गिनाने से पहले दोनों देशों के बीच बहुआयामी खास संबंधों और खुली सीमा का जिक्र किया.

नेपाली कारोबारियों, उप प्रधानमंत्री कमल थापा और विदेश मंत्री के दल के साथ हुई वार्ता में चिदंबरम ने जो राय रखी उसे सार्वजनिक रूप से लिखने में उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया.

ये मानना बहुत मुश्किल है कि चिदंबरम ने अपने विचार दो घंटे की विमान यात्रा के दौरान नेपाल के उन लोगों से मिलकर बना ली होगी, जो खुद इस समस्या के लिए जवाबदेह लोगों में से हैं.

नेपाली नेताओं की मानसिकता

नेपाल की मौजूदा सरकार में  शामिल नेताओं ने राजशाही को हटाकर लोकतंत्र स्थापित करने के लिए कड़ी लड़ायी लड़ी थी. लेकिन अब ये नेता खुद बहुण-क्षेत्री-पहाड़ी मानसिकता के शिकार हो गये हैं.

उन्होंने लोकतंत्र को तो स्वीकार कर लिया लेकिन लगता है कि वे चाहते हैं कि लोकतंत्र के अधिकारों का फायदा तराई के लोगों विशेषकर मधेसियों को न मिल सके. मधेसियों को अभी भी नकली नेपाली या संदिग्ध "दूसरा" व्यक्ति माना जाता है और अक्सर उन्हें 'भारतीय एजेंट' कहके नीचा दिखाया जाता है.

हमेशा ही की तरह कारोबारी वर्ग सत्ताधारियों के साथ है. ताजा हालात में वो सत्ता से ज्यादा तेजी से चिपके हैं क्योंकि वे भी उसी समुदाय से हैं और यथास्थिति उनके हित में है. इतना ही नहीं वे मधेसियों को अवसर की समानता का अधिकार भी नहीं देना चाहते.

इस बीच इकलौते राजशाही दल के नेता कमल थापा एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने संविधान के खिलाफ मतदान किया था. जब वो राजा ज्ञानेंद्र के गृह मंत्री थे तो उन्होंने इन तमाम लोगों को जेल में डलवा दिया था, अब वे उनके साथ जुड़ गए हैं. 

मधेसी सवाल

इन आलोचनाओं की सूची बना ली जाए तो नेपाली जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने नेपाल के मौजूदा शासकों की तरफ से बोले जा रहे झूठ का एक पुलिंदा तैयार हो जाएगा.

सभी आलोचनाओं का बिंदुवार जवाब तो दिया जा सकता है लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं है.  पूरे मुद्दे का एक फौरी ब्योरा ही इसके लिए काफी होगा.

मधेसियों का यह पहला आंदोलन नहीं है. 2007 में शुरू हुए पहले आंदोलन  के बाद राजशाही का खत्मा हो गया लेकिन मधेशियों को उनके अधिकार नहीं मिले.

इस आंदोलन के बाद 28 फरवरी 2008 को तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने प्रमुख मधेसी नेताओं के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के तहत मधेसियों को स्वायत्तता, जनसंख्या के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व, सरकारी नौकरियों, सेना और पुलिस में आनुपातिक प्रवेश के अधिकारों (जो उन्हें तब तक नहीं मिलते थे) को उन्हें देने की गारंटी दी गई. इन्हें अंतरिम संविधान में शामिल भी किया गया. 

सीपीएन (यूएमएल), नेपाली कांग्रेस और माओवादी पार्टी के मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन ने भेदभाव और स्वार्थी राजनीतिक अवसरवाद के एक बेशर्म अधिनियम में एक ऐसे संविधान को धकेल दिया, जिसमें यह प्रावधान नष्ट कर दिए गए. यह लोग मधेसियों द्वारा दी गई स्पष्ट चेतावनी के खिलाफ चले गए. जिसमें मधेसियों ने चेताया था कि कि वे इसे अस्वीकार कर अपनी जायज शिकायतों के समाधान के विरोध में बड़े पैमाने पर विरोध करेंगे.

उनकी लड़ाई कुछ मामूली मांगों को मनवाने या फिर आराम के लिए कुछ चाहने की नहीं थी. यह उनके मौलिक अधिकारों की बात थी. जिसमें उन्हें नेपाल के आम नागरिकों की ही तरह समान अधिकार मिलें. 

इस बार मधेसियों ने साफ कर दिया कि वे मीठी बोली और कोरे आश्वासनों के जाल में नहीं फसेंगे. क्योंकि वे वादा करके मुकर जाते हैं या फिर समय आने पर अनसुना कर देते हैं. वे अब जमीनी कार्रवाई चाहते हैं. 

सबसे जरूरी बात कि वे जिलों की सीमाओं में किए गए हेरफेर की वापसी चाहते हैं. जिससे संसद में स्थायी रूप से एक मधेसी प्रतिनिधित्व कायम हो सके. 

एक आयोग द्वारा इस मामले को देखने के बाद तीन माह के अंदर सिफारिशों के साथ आने की बात ने मधेसियों को निराश कर दिया. पुराने अनुभव से वे जानते हैं कि जबतक एक उचित सौदे के लिए पहले से ही मजबूत समझौता न किया जाए तो यह प्रक्रिया उनकी मांगों को तोड़ने के लिए सिर्फ एक चाल भर है. मधेसियों के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "हम नगद चाहते है, उधार नहीं."

भारत की स्थिति

पहले आंदोलन से ही भारत ने अपनी स्थिति व्यापक और स्पष्ट कर रखी है. संविधान की प्रकृति के हिसाब से भारत के पास नेपाल के शासकों के साथ जुड़ाव का वैध आधार है. संविधान के मुताबिक यदि तराई में अस्थिरता और हिंसा बढ़ती है तो यह खुली सीमाओं के चलते इस पार भी फैल सकती है. इससे भारत में कानून व्यवस्था और सुरक्षा चिंताजनक कारण बन सकती है. 

विदेश सचिव की यात्रा भारत द्वारा संकट की आखिरी घड़ी में उठाया गया कदम नहीं है. यह स्पष्ट रूप से हमारी चौखट पर महीनों से मंडराते संकट से निपटने के लिए आखिरी प्रयास था. 

नेपाली राज्य के स्वयंसेवी अड़ियल रवैये के गिरने के कारण यह प्रयास विफल रहा. और इस तरह के मौलिक मुद्दे पर हमें शायद ही कोशिश करने के लिए दोषी ठहराया जा सकता है. भारत एक समावेशी संविधान चाहता था जिससे कई नेपाली नागरिक भी सहमत थे, जिसे नजरंदाज कर दिया गया. इस आंदोलन का क्रूर दमन किया गया जिसकी वजह से करीब 50 लोग मारे गए थे.

आंदोलन के चलते नाकाबंदी की गई. जिसे सीमा पार करने वाले तमाम आगंतुक देख सकते थे और कई पत्रकारों ने इसकी सूचना भी दी. जहां पहले ही तमाम ट्रकों को जला दिया गया, ऐसी जगह कोई ट्रक ड्राइवर जाने को तैयार नहीं था. 

नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं बढ़ावा देने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में खुद को दीनहीन की तरह प्रस्तुत करने के बावजूद भारत को गंभीर संवाद के माध्यम से इस राजनीतिक समस्या का राजनीतिक हल खोजना का प्रयास जारी रखना चाहिए.

संविधान की खामियां उजागर करना किसी का पक्ष लेना नहीं है. जैसा कि माग्रेट थ्रेचर ने जॉर्ज बुश से कहा था, "यह डांवाडोल होने का वक्त नहीं है." भारत को स्थिर रहने की रहने की जरूरत है.

First published: 8 December 2015, 8:45 IST
 
शिव मुखर्जी @catchhindi

पूर्व राजनयिक. नेपाल, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका में भारत के राजदूत रह चुके हैं. ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त भी रहे.

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