Home » इंटरनेशनल » Nepal headed for another showdown: Madhes agitation moves to Kathmandu
 

नेपाल: काठमांडू की देहरी पर दस्तक दे रहा मधेशी आंदोलन

हरी बंश झा | Updated on: 25 May 2016, 7:09 IST
(एएफपी)

नेपाल में नए संविधान के खिलाफ बीते छह महीने से चल रहा मधेशी केंद्रित आंदोलन अब काठमांडू केंद्रित हो गया है. 14 मई के बाद से मधेशी आधारित राजनीतिक दलों ने शेरपा, मगर, गुरुंग और राय लुंबू जैसी विभिन्न पहाड़ी जनजातियों को अपने साथ जोड़कर 20 सितंबर 2015 से देश में लागू हुए नए संविधान के खिलाफ एक ‘‘संघीय मोर्चे’’ का गठन किया है.

इस नए संविधान में उन्हें 2007 के अंतरिम संविधान में प्रदत्त कई अधिकारों में भारी कटौती कर दी गई है. आंदोलनकारी समूहों ने सरकार के समक्ष अपनी 26 मांगें रखी हैं जिसमें संविधान को दोबारा लिखने की मांग भी है.

अपनी शिकायतों के समाधान के लिये सरकार पर दबाव बनाने के प्रयास में मधेशी आधारित राजनीतिक दलों और पहाड़ी जनजातीय समूहों के हजारों कार्यकर्ता विभिन्न प्रकार के विरोध प्रदर्शनों का आयोजन कर संविधान का विरोध कर रहे हैं?

पढ़ें: नेपाल में फिर सुलगा मधेशी आंदोलन

सरकार पर दबाव बढ़ाने की रणनीति के तहत मधेशी संगठनों ने रैलियों का आयोजन करने के अलावा सरकार की प्रशासनिक इकाई माने जाने वाले सिंह दरबार पर दो दिन का धरना दिया और नेपाली प्रधानमंत्री के सरकारी आवास पर भी एक दिवसीय धरने का आयोजन किया.

हालांकि सरकार ने उनकी मांगों को नजरअंदाज करते हुए उनके इस आंदोलन को ‘‘व्यर्थ का नाटक’’ करार दिया.

सरकार के इस रवैये के चलते आंदोलनकारी समूहों को अपना आंदोलन 10 दिन और बढ़ाना पड़ा. इस दौरान वे इस संविधान के खिलाफ काठमांडू के अलावा पोखरा और बीरगंज में भी विरोध प्रदर्शन करते आ रहे हैं. सरकार के इन आंदोलनों को विफल करने के तमाम प्रयासों के बावजूद बीते कुछ दिनों से इनमें आम जनता की भागीदारी बढ़ती जा रही है.

आंदोलनकारी समूहों ने सरकार के समक्ष अपनी 26 मांगें रखी हैं जिसमें संविधान को दोबारा लिखने की मांग भी है

इस बीच सरकार ने संविधान से संबंधित तमाम मतभेदों को सुलझाने की दिशा में प्रयास करते हुए इन आंदोलनकारी समूहों को आगे आकर वार्ता की मेज पर बैठकर बातचीत करने का आमंत्रण भेजा हैं. लेकिन आंदोलनकारी समूहों ने सरकार के इस आमंत्रण को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि सरकार उनकी समस्याओं के समाधान को लेकर अबतक हो चुकी 3 दर्जन से भी अधिक वार्ताओं में गंभीर नहीं दिखी है. इसके अलावा उनका यह भी आरोप है कि सरकार बातचीत के लिये अनुकूल वातावरण तैयार करने में भी विफल रही है.

हालांकि नेपाल में सरकार और इन आंदोलनकारी समूहों के बीच बढ़ते गतिरोध को लेकर चिंताएं बढ़ती ही जा रही हैं. कई लोगों को इस बात का डर है कि नेपाल राजनीतिक अस्थिरता की तरफ जा सकता है और इस गतिरोध के लंबा खिंचने की स्थिति में माहौल हिंसक रूप भी धारण कर सकता है.

पढ़ें: नेपाल की तराई में सुलगता असंतोष

पिछले वर्ष भी इसी प्रकार के एक गतिरोध के चलते नेपाल को 5 महीनों तक आर्थिक नाकाबंदी के दौर से गुजरना पड़ा था जिसके चलते देश में तेल और रसोई गैस सहित रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी हो गई थी. अनुमानों के मुताबिक नाकाबंदी के चलते नेपाल की अर्थव्यवस्था को प्रतिमाह 2 बिलियन डाॅलर का नुकसान उठाना पड़ा था.

अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पंगु होने के चलते नेपाल की आर्थिक विकास की दर भी नकारात्मक में हो गई थी.

इसके अलावा उस दौरान 58 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था और हजारों लोग घायल हो गए थे. विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने आंदोलनकारियों के खिलाफ सुरक्षा बलों द्वारा की गई दमनात्मक कार्रवाई पर भी खुलकर प्रकाश डाला है.

दुर्भाग्य से सरकार भी नेपाल की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले मधेशियों, जनजातियों, मुसलमानों, दलितों और महिला समूहों की मांगों के आगे झुकने को तैयार नहीं है.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्रिटेन और ब्रसेल्स दौरे के समापन पर इंडो-ब्रिटेन और इंडो-यूरोपियन, दोनों पक्षों द्वारा जारी की गई प्रेस विज्ञप्तियों में नेपाल के संविधान को समावेशी बनाने की सलाह देने के अलावा देश में शांति और स्थिरता का माहौल बनाने के लिये संविधान में विभिन्न आंदोलनकारी समूहों की चिंताओं को भी समायोजित करने की बात कही थी.

अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पंगु होने के चलते नेपाल की आर्थिक विकास की दर भी नकारात्मक में हो गई थी

यहां तक कि अमरीकी विदेश मंत्री जाॅन कैरी ने भी नेपाल के उप-प्रधानमंत्री कमल थापा को कुछ ऐसी ही सलाह दी थी. लेकिन नेपाल की सरकार ने न सिर्फ इस दोस्ताना सलाह को नजरअंदाज किया बल्कि इसका विरोध भी किया.

इसके बाद स्थितियों को और बदतर करते हुए नेपाल सरकार ने अपनी हाल की नीतियों और कार्यक्रमों की घोषणा करते हुए स्थानीय स्तर के चुनावों को इसी वर्ष नवंबर/दिसंबर के महीनों में आयोजित करने का फैसला किया है. राजनीतिक हलकों में ऐसे किसी भी कदम को नए संविधान को संस्थागत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि इन चुनावों को करवाने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि स्थानीय चुनाव राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और अभी तक राज्यों के सीमांकन का मामला निबटाया नहीं जा सका है.

पढ़ें: क्या नेपाल सचमुच चीन के करीब जा रहा है?

वर्ष 2005 में भी राजा ज्ञानेंद्र ने देश में वर्ष 1997 से लंबित इन चुनावों को आयोजित करवाने का प्रयास किया था. लेकिन वे विभिन्न राजनीतिक दलों के कड़े विरोध के चलते ऐसा कर पाने में असफल रहे थे.

सरकार के स्तर पर आंदोलनकारी समूहों की समस्याओं को सुलझाने को लेकर लचीलेपन की कमी के चलते भविष्य में इस टकराव के और तीव्र होने की संभावना है. लेकिन इस बार काठमांडू केंद्रित इस आंदोलन के मधेशी केंद्रित आंदोलन के मुकाबले अधिक प्रभावी होने की पूरी संभावना है क्योंकि इसे पहाड़ी स्वदेशी समूहों के अलावा नेपाल की दूसरी राजनीतिक ताकतों का भी समर्थन मिल रहा है.

विभिन्न पश्चिमी ताकतें भी मधेशियों और जनजातियों की चिंता के प्रति सहानूभूति का प्रदर्शन कर रहे हैं. इस परिदृश्य के मद्देनजर राज्य को इन आंदोलनकारी समूहों की तराई में एक या दो राज्यों के गठन सहित आबादी के आधार पर संसदीय चुनाव करवाने और नागरिकता से संबंधित नियमों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व देने के साथ भेदभाव भरे प्रावधानों को हटाने जैसी मांगों पर ध्यान देना चाहिए. इन मांगों के सामाधान के लिये संविधान को दोबारा लिखना बिल्कुल अपरिहार्य है.

First published: 25 May 2016, 7:09 IST
 
हरी बंश झा

The writer is a Nepali national currently a Research Fellow at the Indian Council for World Affairs, New Delhi.

पिछली कहानी
अगली कहानी