Home » इंटरनेशनल » No honour among knaves: how the power elite is wrecking Nepal
 

सत्ताधारी कुलीनों के कुचक्र में फंसा नेपाल-भारत संबंध

सीके लाल | Updated on: 13 June 2016, 7:34 IST

नेपाल के उपप्रधानमंत्री दिल्ली को यह आश्वासन देने के लिए यात्रा पर आ रहे हैं कि अब समय आ गया है जब भारत-नेपाल के बीच संबध फिर से सामान्य हो सकते हैं. हालांकि 16 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद काठमांडू के राजनीतिक कुलीन वर्ग को बीजिंग के निकट लाने वाली राजनीतिक वास्तविकता में रत्ती भर भी बदलाव नहीं हुआ है.

ऐसे समय में जब नेपाल की जनता बीते साल जून के महीने में आए भीषण भूकंप की तबाही से उबरने के प्रयास में लगी थी, उसी दौरान देश के चार प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता एक 16 सूत्रीय समझौते को अंतिम रूप देने के लिये चोरी-छिपे आपस में मिले. इसका उद्देश्य बिना सार्वजनिक परामर्श के देश में एकात्मक संविधान को जल्द से जल्द लागू करने के लिये रास्ता साफ करना था.

भूकंप के बाद आने वाले झटकों की ही तरह इस विभाजनकारी कानून के अनापेक्षित परिणाम राजनीतिक रूप से शांत रहने वाले क्षेत्र के लिये खतरा बने हुए हैं.

समर्थक सरकार या उसकी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर बेदर्दी से टूट पड़ते हैं

मधेशी और जनजाति, दोनों ही नागरिकता के अधिकारों में समानता सुनिश्चित करने के लिये, संसद के दोनों सदनों में जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व, राज्य के संस्थानों में आनुपातिक स्थान, और ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे समुदायों की गरिमा को संघीय सीमाओं में एक पहचान दिलाने के लिये अभी भी इन संवैधानिक संशोधनों का विरोध कर रहे हैं.

सरकार में शामिल माओवादियों, स्टालिनिस्टों और राजतंत्रवादियों का गठबंधन पूरे देश पर अपना संपूर्ण नियंत्रण बनाए रखने के प्रयास कर रहा है. अगर कहें तो यह वह तबका है जिसे पीईओएन (नेपाल का स्थायी अभिजात्य वर्ग) कहते हैं.

हाल के समय तक पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में सबसे मुक्त माने जाने वाला मीडिया भी अब धीरे-धीरे खुद ब खुद आत्म-सेंसरशिप की चपेट में आता जा रहा है. हालांकि यहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी तरह का खुला प्रतिबंध तो नहीं है लेकिन वर्तमान सत्तापक्ष के समर्थक मुख्यधारा या सोशल मीडिया में सरकार या उसकी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर बेदर्दी से टूट पड़ते हैं.

मीडिया लगभग सरकार का ही एक विस्तार बनकर रह गया है जो उसकी रचनात्मकता का इस्तेमाल अपने लिए समर्थन जुटाने में कर रही है.

एक बार संविधान को अपनाये जाने के बाद नेपाली कांग्रेस को सरकार के संदिग्ध 16 सूत्रीय समझौते में दूसरी पार्टियों के जोर देने पर शामिल किये गए एक प्रावधान को लेकर सरकार को अधर में छोड़ना पड़ा. ऐसा लगता है कि इस संविधान का प्राथमिक उद्देश्य संसद की सबसे बड़ी पार्टी को अलग-थलग करते हुए उसे राजतंत्रवादियों और स्टालिनिस्टों के आगे झुकाना था.

क्षत-विक्षत गणराज्य

माओवादी सुप्रीमो पुष्प कमल दहल के इस दावे में काफी हद तक सच्चाई है कि 28 मई 2008 को पहली संविधान सभा के आहूत हुए पहले सत्र में नेपाल संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य का घोषणा सिर्फ उनकी पहल के चलते ही संभव हो पाई थी.

हालांकि उनके सपनों का गणराज्य पहली संविधान सभा के गिरने के साथ ही धूल में मिलना प्रारंभ हो गया था. उसके स्थान पर आहूत की गई दूसरी सभा प्रतिगामी ताकतों द्वारा ‘राज्य पर कब्जे’ का प्रतीक थी. इस वर्ष आयोजित हुए गणतंत्र दिवस के समारोह में दोहरा चरित्र साफतौर पर देखा जा सकता था.

28 मई 2016 को देश के 8वें गणतंत्र दिवस के मौके पर सार्वजनिक अवकाश होने के बावजूद काठमांडू की सड़कों पर बहुत कम चहल-पहल और उल्लास देखा गया. पूर्व राष्ट्रपति राम बरन यादव ने राजधानी में नेपाल आर्मी परेड ग्राउंड में अयोजित हुए औपचारिक कार्यक्रमों से खुद को दूर रखते हुए अपने गृह नगर में समय बिताना पसंद किया.

पूर्व उपराष्ट्रपति परमानंद झा भी सैनिकों के औपचारिक मार्चपास्ट को देखने के दौरान वीआईपी क्षेत्र में सीट न दिये जाने के विरोध में कार्यक्रकम स्थल से वापस लौट गए. ऐसा प्रतीत हुआ कि परेड ग्राउंड में आयोजित हुई तमाम गतिविधियों को प्रतिभागियों और दर्शकों के बेहद कम उत्साह और ऊर्जा के चलते सिर्फ परंपराओं के निर्वहन के लिये पूरा किया गया हो.

प्रचंड के नाम से जाने जाने वाले दहल शायद सबसे अधिक हताश और निराश राजनेता के रूप में सामने आए

यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस युवा गणराज्य की वर्षगांठ पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिय. यहां तक कि गूगल ने भी इस मौके पर कोई डूडल प्रदर्शित नहीं किया और इस मौके पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को विदेशी गणमान्यों के नाम पर सिर्फ सिर्फ चीनी राष्ट्रपति शी जिंपनिंग ने ही बधाई दी.

डीपीआरके की सुप्रीम पीपल्स एसेम्बली की प्रेसिडियम के राष्ट्रपति किम यांग नाॅम ने भी बधाई संदेश भेजा लेकिन उसमें भी गलती से अवसर को राष्ट्रीय दिवस कहा गया था. प्रोटोकाॅल का उल्लंघन करते हुए असेंबली के अध्यक्ष ने अपने समकक्ष विधायिका के अध्यक्ष के बजाय अपना संदेश राष्ट्रपति के नाम कर दिया. इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं कि सरकार और मीडिया ने प्योंगयांग की इस बधाई को अधिक तवज्जों नहीं दी.

इन सब भ्रमित कर देने वाली स्थितियों के बीच प्रचंड के नाम से जाने जाने वाले दहल शायद सबसे अधिक हताश और निराश राजनेता के रूप में सामने आए. सशस्त्र विद्रोह के जरिये एक जनवादी गणराज्य के लिये प्रतिबद्ध प्रचंड ने फरवरी 2000 में गरजते हुए कहा थाः ‘‘मेरा सबसे बड़ा भरोसा यही है कि मैं संशोधनवाद से नफरत करता हूं. वास्तव में मुझे संशोधनवाद से गंभीर नफरत है और मैं कभी संशोधनवाद से समझौता नहीं कर सकता. मैं बारंबार इसके खिलाफ ही लड़ता रहा हूं और पार्टी का सही रास्ता भी संशोधनवाद से लड़ने में ही है. मुझे संशोधनवाद से गंभीर नफरत है.’’

प्रीमियर खड्ग प्रसाद शर्मा ओली का संशोधनवादी शासन अब पूरी तरह से लगभग दहल के कंधों पर टिका है और कभी ऊर्जा से भरा रहने वाला लेकिन अब शांत हो गया यह माओवादी इस स्थिति को बदलने में खुद को नाकाम पा रहा है.

नक्सल संबंध

ओली उन प्रारंभिक नेपाली माओवादियों में से हैं जिन्होंने सीमापार स्थित पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी स्थित झापा के अधिकतर मासूम और निर्दोषों के खून से अपने हाथ गंदे किये थे. नवंबर 1969 में चारू मजूमदार ने खुलेआम घोषणा की थीः ‘‘चीन का नेता हमारा नेता है और चीन का रास्ता हमारा रास्ता है.’’

उनका यह नारा नेपाल के ‘‘राष्ट्रवादी वामपंथियो’’ के बीच खासा मशहूर हुआ जिनका इस्तेमाल 1980 के दशक के अंत तक राजतंत्रवादी सामान्य नेपालियों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को कुचलने के लिये करते थे. इसी वास्तविकता के चलते नेपाली कांगेेस के पूर्व नेता गिरिजा प्रसाद कोईराला ने कहा कि राजतंत्रवादी, मार्क्सवादी, लेनिनवादी और माओवादी, सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं.

एक बदले हुए ओली ने 1990 के बाद से अंतिम क्षण तक रिपब्लिकन आकांक्षिओं से लड़ाई जारी रखी. उन्होंने इस अभियान को बैलगाड़ी से चांद तक की यात्रा कहते हुए इसका मजाक उड़ाया. और देश के पुनर्गठन से संबंधित प्रत्येक प्रस्ताव का विरोध किया. वे सत्तारूढ़ गठबंधन के सर्वोपरि हैं और उनके क्रियाकलापों से इस बात का स्पष्ट संदेश मिलता है कि वे संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से मधेशियों, जनजातियों या महिलाओं की आकांक्षाओं को संबोधित करने के लिये अपने राजनीतिक एजेंडे से टस से मस नहीं होंगे.

ओली की सिर्फ एक ही चिंता है और वह है भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनिश्चितता

ओली को इस बात की पूरी उम्मीद है कि वे भी 1990 से पहले के सैन्य समर्थित राजशाही शासन की ही तरह सिर्फ राष्ट्रवादी नारेबाजी के दम पर शासन कर सकते हैं.

वे अक्सर बड़ी चतुरता से इस दांव को भारत-विरोधी चाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं जैसे दशकों से राजतंत्रवादी और माओवादी करते आए हैं. हालांकि इस बार तेवर में एक बेहद महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है, चीनी इस बार उनका सहयोग करने में शर्मा नहीं रहे हैं.

अध्यक्ष ओली को यह भलीभांति पता है कि जितने लंबे समय तक उनकी पार्टी सत्तरूढ़ गठबंधन का हिस्सा रहेगी जमीन पर वह उतना ही प्रभाव खोएगी. लेकिन उनके पास काफी सीमित विकल्प हैं. यहां तक कि अगर चीनी भी उनसे पीछा छुड़ा लेते हैं तो भी अब पार्टी में माओइस्ट सेंटर के नाम एक ऐसा केंद्र विकसित हो चुका है जो उन्हें किसी भी हालत में सुप्रीमो नहीं बना रहने देगा. लंबे समय से वे अपनी पार्टी और सीपीएन-यूएमएल के ओली के साथ हुए ‘‘जेंटलमैन एग्रीमेंट’’ की ओर इशारा करते आए हैं. हालांकि प्रधानमंत्री ने ऐसे किसी दावे को सिरे से खारिज किया है.

काठमांडू में चल रहा प्रतिगामी शासन फिलहाल अजेय लग रहा है. राजतंत्रवादियों और स्टालिनिस्टों का गठबंधन अधर में फंसे गणतंत्र के साथ जैसे चाहे वैसे खेल रहा है. अगर किसी आंतरिक या बाहरी कारण के चलते माओवादी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेते हैं तो सीपीएन-यूएमएल किसी भी क्षण नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर निर्णायक भूमिका निभा सकती है.

उनकी सिर्फ एक ही चिंता है और वह है भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनिश्चितता. प्रमोद थापा को नई दिल्ली में हिंदुत्ववादी ताकतों को साधने का काम सौंपा गया है और वे हाल के दिनों में इस काम को सफलतापूर्वक अंजाम देते आए हैं.

अपने दिल्ली प्रवास के दौरान थापा चीनी हस्तक्षेप, इसाई मिशनरियों, वामपंथी आतंकियों, मुसलमान जिहादियों का डर दिखाते हुए अपने वार्ताकारों को यह समझाने का प्रयास करेंगे कि इस समय काठमांडू में सत्तारूढ़ गठबंधन ही हिंदुत्व के हितों की गारंटी देने वाला इकलौता माध्यम है.

वे इस हद तक भी जा सकते हैं कि अगर भारत नेपाल की सरकार को उसके अपने हाल पर छोड़ने का भरोसा दे तो वे नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने का वायदा भी कर सकते हैं.

अगर वे छल-कपट के अपने इस खेल में सफल हो जाते हैं तो भारत और नेपाल के संबंध वापस 1980 के दशक के स्तर पर पहुंच जाएंगे जब दुनिया के दो सबसे अच्छे दोस्त माने जाने वाले पड़ोसी एक दूसरे से इतने दूर हो गए थेे कि वे अंतरराष्ट्रीय मंचों तक भी एक दूसरे से बात करना पसंद तक नहीं करते थे.

First published: 13 June 2016, 7:34 IST
 
सीके लाल @CatchNews

The writer is a noted journalist and political columnist from Nepal.

पिछली कहानी
अगली कहानी