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अफगानिस्तान में छद्म युद्ध नहीं लड़ रहा भारत: अमर सिन्हा

रुचि कुमार | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • अमर सिन्हा ने न केवल भारत में नरेंद्र मोदी के उभार को देखा है बल्कि वह अफगानिस्तान के चुनाव प्रक्रिया से भी वाकिफ रहे हैं जिसके बाद वहां प्रेसिडेंट अशरफ गनी और सीईओ अब्दुल्ला अब्दुल्ला के नेतृत्व में राष्ट्रीय एकता की सरकार बनी.
  • पिछले कुछ समय में दोनों देशों की सरकारें बदल चुकी हैं लेकिन सिन्हा का कहना है कि इसके बावजूद दोनों देशों की सरकारों के नजरियों में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं आया है.

अमर सिन्हा के लिए काबुल छोड़ना बेहद तकलीफदेह है. अफगानिस्तान में भारत के राजदूत के तौर पर करीब ढाई सालों तक काम करने के दौरान सिन्हा इस कदर वहां की आबोहवा में घुल मिल गए कि वहां उन्हें किसी अफगान से भी ज्यादा अफगान कहकर बुलाया जाता है. 

सिन्हा अब विदेश मंत्रालय में आर्थिक मामलों के सचिव बन कर वापस भारत आ रहे हैं. नई जिम्मेदारियों को लेकर उन्हें खुशी तो है लेकिन उन्हें इस बात का दुख भी है कि वह ऐसे वक्त में काबुल छोड़ रहे हैं जब भारत और अफगानिस्तान के  रिश्ते नई ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं. 

सिन्हा ने दरअसल खुद काबुल की पोस्टिंग चुनी थी. 1982 बैच के आईएफएस ऑफिसर बताते हैं, 'उन्हें ऐसे लोगों की तलाश रहती थी जो वहां जाना चाहते थे. यह ऐसी जगह थी जिससे लोग परिचित नहीं थे. कई लोगों को उनकी पत्नियां काबुल जाने से उन्हें मना कर देती थीं. मेरे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी.'

काबुल के स्थानीय लोग उन्हें जरूर याद करेंगे. सिन्हा के वापस जाने की खबर सामने आते ही सोशल मीडिया पर अफगानिस्तान के लोग उन्हें बधाई संदेश देने लगे. 

काबुल में सिन्हा के कार्यकाल को कई कारणों से याद किया जाएगा. सबसे अहम बात यह कि उन्होंने ऐसे समय में काबुल में काम किया जब भारत और अफगानिस्तान के बीच के रिश्ते नए सिरे से बन रहे थे.

सिन्हा ने न केवल भारत में नरेंद्र मोदी के उभार को देखा है बल्कि वह अफगानिस्तान के चुनाव प्रक्रिया से भी वाकिफ रहे हैं जिसके बाद वहां प्रेसिडेंट अशरफ गनी और सीईओ अब्दुल्ला अब्दुल्ला के नेतृत्व में राष्ट्रीय एकता की सरकार बनी.

सिन्हा को हालांकि यह लगता है कि अब भी दोनों देशों में नजरिये को लेकर कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है. वह कहते हैं, 'साफ तौर पर कहूं तो मुझे नहीं लगता है कि दोनों देशों में सरकार बदलने के बावजूद उनके नजरिये में कोई बड़ा बदलाव आया है.'

उन्होंने कहा, 'घर वापसी के बाद मुझे लगता है कि ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होगी क्योंकि प्राथमिकताओं में बदलाव आ चुका है. अफगानिस्तान में दिल्ली की सक्रियता बहुत ज्यादा है.'

करीब ढाई सालों तक काबुल में भारत के राजदूत रहे अमर सिन्हा स्थानीय लोगों में जबरदस्त तौर पर लोकप्रिय हैं

मोदी के काबुल दौरे पर भारत की सक्रियता साफ दिखी. मोदी ने अफगानिस्तान के संसद भवन का उदघाटन किया जिसे भारत ने अफगानिस्तान को उपहारस्वरुप दिया है. काबुल में हुए इस कार्यक्रम को अफगान मीडिया में जबरदस्त कवरेज मिला और सोशल मीडिया पर यह चर्चा में रहा. उन्होंने कहा, 'मैं अफगानिस्तान के संपर्क में रहूंगा.' सिन्हा ने कहा, 'विदेश मंत्रालय की मेरी जिम्मेदारी में अफगानिस्तान के विकास प्रोजेक्ट पर नजर रखना भी शामिल है और मुझे उम्मीद है कि मैं इसे आगे बढ़ा पाऊंगा.'

हम लड़ाई के कारोबार में नहीं है

राष्ट्रपति गनी के सत्ता संभालने के बाद क्षेत्रीय राजनीति में हुए बदलाव को लेकर पूछे जाने पर सिन्हा ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. उन्होंने कहा, 'जनता के बीच की छवि को लेकर बदलाव हो सकता है लेकिन अफगानिस्तान का राजनीतिक तबका भारत को मित्र की नजर से देखता है.'

अफगानिस्तान और पाकिस्तानी नेताओं के बीच बढ़ती घनिष्ठता को लेकर पूछे जाने पर उन्होंने कहा, 'हम इसे समझते हैं. यह स्वाभाविक है कि वह ऐसा करेंगे. आप इसे हमारे नजरिये से देखने की कोशिश कीजिए. क्या भारत की सरकार पाकिस्तान के साथ संपर्क बनाने की कोशिश नहीं करती है.'

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बढ़ती घनिष्ठता पर भारत की नाराजगी को लेकर लेकर मीडिया में आई खबरों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, 'हमें नहीं लगता है कि हमारा रिश्ता नफा-नुकसान पर आधारित है. क्योंकि पाकिस्तान के साथ उनका रिश्ता सुधर रहा है इसका यह मतलब नहीं कि यह सब कुछ भारत के रिश्तों की कीमत पर हो रहा है. क्या हमारे देशों के साथ बहुपक्षीय संबंध नहीं है? इसलिए हमें अफगानिस्तान नेतृत्व को थोड़ी जगह देने की जरूरत है.'

हालांकि अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान की नीति के बारे में सिन्हा को कोई संदेह नहीं है. उन्होंने कहा, 'अफगानिस्तान में भारत की बढ़ती भूमिका को लेकर पाकिस्तान के नजरिये का अफगान सरकार या जमीनी हकीकतों से कोई लेना देना नहीं है.'

सिन्हा के कार्यकाल के दौरान भारत और अफगानिस्तान में सरकार बदल गईं लेकिन इससे नजरिये में कोई फर्क नहीं पड़ा

सिन्हा अफगानिस्तान में भारत और पाकिस्तान के बीच की छद्म लड़ाई के आरोपों को खारिज करते हैं. वह पूछते हैं, 'हम इस छद्म लड़ाई में आखिर किस प्रॉक्सी की मदद ले रहे हैं?' 'तालिबानी किसे मार रहे हैं? अफगान सुरक्षा बल और वहां के लोग हताहत हो रहे हैं. इसलिए जब तक कोई यह न कहे कि ये सभी भारत के प्रॉक्सी हैं तब तक मैं यह नहीं मानूंगा. हम इस तरह के किसी भी काम में शामिल नहीं है.'

आतंकवाद में तेेजी भारत की चिंता

सिन्हा को नहीं लगता कि अफगानिस्तान में तालिबान मजबूत हुआ है. न ही उन्हें यह लगता है कि वहां आईएस ऐसी कोई ताकत है.

तालिबानी संस्थापक मुल्ला उमर के मारे जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 'आज के समय में तालिबान एक कमजोर ताकत है. पिछले तीन सालों से वह एक मरे हुए व्यक्ति के नाम से जिहाद कर रहे हैं.'

हालांकि उग्रवाद की बढ़ती घटनाओं को लेकर उन्हें चिंता है. उन्होंने कहा, 'आतंकी समूहों की तरफ से की गई हालिया वारदात अपने आप को प्रासंगिक बनाए रखने की है. अफगान युवाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था का खस्ताहाल होना है. उन्हें कहीं जाना होगा. मुझे नहीं पता कि उनकी प्रेरणा धर्म है या फिर विशुद्ध आर्थिक आजीविका.'

अफगानिस्तान में भारत की भूमिका

अफगानिस्तान के विकास में भारत की भूमिका को लेकर सिन्हा कहते हैं कि यह एक जारी रहने वाली प्रक्रिया है. उन्होंने कहा, 'अभी तक हमारा सहयोग उन इलाकों में रहा है जहां अफगान सरकार हमसे मदद मांगती है. हमने अभी तक कोई खास समाधान की दिशा में काम करना शुरू नहीं किया है. मुझे लगता है कि हम कृषि, ग्रामीण विकास और उससे जुड़े उद्योग में भागीदार हो सकते हैं.'

भारत शिक्षा के क्षेत्र में समर्थन जारी रखेगा. 1,000 सालाना छात्रवृत्ति के अलावा मोदी ने शहीद अफगान सैनिकों के परिवारों के लिए 500 अतिरिक्त छात्रवृत्ति की घोषणा की है. सिन्हा ने कहा, 'हम देश के भविष्य में निवेश कर रहे हैं. हम न केवल पुनर्विकास के कार्यों में सहयोग कर रहे हैं बल्कि हम उनकी अगली पीढ़ी को भी सशक्त कर रहे हैं.' 

First published: 30 December 2015, 4:48 IST
 
रुचि कुमार @@ruchikumar

रुचि कुमार भारत की पत्रकार हैं और काबुल में रहती हैं.

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