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'मैत्रिपाला सिरिसेना को रखना होगा तमिल अल्पसंख्यकों का ख्याल'

शेषाद्री चारी | Updated on: 13 January 2016, 8:22 IST
QUICK PILL
  • मैत्रिपाल सिरिसेना पिछले साल महिंद्रा राजपक्षे को हराकर श्रीलंका के राष्ट्रपति बने. उनकी जीत में तमिल और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के समर्थन की प्रमुख भूमिका रही थी.
  • सिरिसेना ने श्रीलंका में लोकतांत्रिक सुधार के लिए सराहनीय कदम उठाए हैं लेकिन तमिल अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा के लिए उन्होंने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उटाया है.
महिंद्रा राजपक्षे ने उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में वोटरों से अपील की थी कि 'परिचित शैतान' को चुनना बेहतर होता है लेकिन लोगों ने 'देवदूत' को चुन लिया. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है.

चुनाव के बाद जिस तरह शांतिपूर्ण तरीके से श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन हुआ उससे एक बार फिर लोकतंत्र की शक्ति प्रमाणित हुई.

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे के राजनीतिक अनुभव को देखते हुए ये मानना मुश्किल है कि चुनाव परिणामों से वो चकित हुए होंगे लेकिन बाहरी दुनिया के लिए परिणाम अनपेक्षित थे.

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राजपक्षे ने श्रीलंका के संविधान में अपने लाभ के लिए कुछ परिवर्तन किए थे. उन्होंने अचानक ही चुनाव कराने की घोषणा कर दी. उन्हें उम्मीद थी कि वो तीसरी बार देश के राष्ट्रपति बन जाएंगे. अगर ऐसा होता तो वो अगले छह सालों के लिए राष्ट्रप्रमुख बन जाते. यानी वो साल 2020 तक देश के राष्ट्रपति रहते.

सिरिसेना की छवि एक ईमानदार और स्पष्टवादी नेता की थी जो पक्के बौद्ध हैं

मैत्रिपाल सिरिसेना राजपक्षे के सबसे करीबी मंत्रियों में से थे. वो यूनाइटेड पीपल्स फ्रीडम अलायंस (यूपीएफए) की गठबंधन सरकार का सबसे बड़े घटक श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) के महासचिव भी थे. सिरिसेना कई मुद्दों पर राजपक्षे से सहमत नहीं थे.

उन्होंने राजपक्षे को चुनौती देने का निर्णय लिया. राजपक्षे की छवि अपने परिवार की मदद से एक भ्रष्ट सरकार चलाने वाले राजनेता की बन गयी थी. सिरिसेना की छवि एक ईमानदार और स्पष्टवादी नेता की थी जो पक्के बौद्ध हैं. लोगों को लगता था वो श्रीलंका की बहुसंख्यक सिंहला आबादी की वाजिब चिंताओं को समझते हैं. सिंहला समुदाय के समर्थन से वो राजपक्षे का किला भेदने में सफल रहे.

सिरिसेना को जीत कैसे मिली?


सिरिसेना (51.3 प्रतिशत) को राजपक्षे (47.6 प्रतिशत) से 3.7 प्रतिशत ज्यादा वोट मिले थे. उन्हें जीत को बहुत बड़ी जीत नहीं कहा जा सकता लेकिन इससे देश की राजनीतिक दिशा का संकेत जरूर मिलता है.

सिरिसेना की अनपेक्षित जीत के लिए कई कारण जिम्मेदार थे. सबसे बड़ा कारण न्यू डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम का नया गठबंधन बनना. इस गठबंधन में पूर्व में एक दूसरे के विरोधी समझे जाने वाले कई दलों की साझेदारी थी. इसमें देश की पूर्व राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा और यूनाइटेड नेशनल पार्टी(यूएनपी) के नेता रानिल विक्रमसिंघे शामिल थे.

कहा जाता है कि बौद्ध भिक्षुओं के एक बड़े तबके ने राजपक्षे को 'सबक सिखाने के लिए' अपनी पूरी ताकत लगा दी थी. चुनाव के दौरान प्रशासन और सुरक्षा बल राजनीतिक रूप से तटस्थ रहा इसके पीछे ये भी एक कारण था. और इसीलिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव हो पाए.

श्रीलंका के तमिल समुदाय के पास कोई नेता नहीं है लेकिन उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अभी जिंदा और अपूर्ण हैं

चुनावों में तमिल और मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. अल्पसंख्यकों के करीब 10 लाख वोट राजपक्षे के ख़िलाफ़ गये जिसकी वजह से उनके विरोधी को सात लाख से अधिक की बढ़त मिल गयी. इससे सिरिसेना ने सिंहला बहुल इलाके में राजपक्षे को मिले ढाई लाख वोटों की बढ़त को बेअसर कर दिया और उन्हें निर्णायक जीत मिली.

सिरिसेना ने तमिलों और मुसलमानों के लिए कोई ख़ास चुनावी वादा नहीं किया था फिर भी उन्होंने उनको वोट दिया. उन्होंने उत्तरी श्रीलंका में सेना को हटाने के कम करने को लेकर भी कोई आश्वासन नहीं दिया था.

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उदारवादी नेताओं, बौद्ध भिक्षुओं और आम लोगों को उम्मीद थी कि सिरिसेना देश में लोकतंत्र को मजबूत करेंगे. इसीलिए अल्पसंख्यक उनको लेकर थोड़े मुतमईन थे.

लिट्टे के दोबारा एकजुट होने और उसके स्लीपर सेल के दोबारा सक्रिय होने की आशंका थी लोकिन उन्होंने ज्यादा चिंता नहीं की. यहां तक कि कुख्यात बौद्ध बल सेना भी तमिलों और मुसलमानों को राजपक्षे के भ्रष्ट सरकार के ख़िलाफ़ वोट देने से नहीं रोक पायी. वो भी तब जब सिरिसेना ने उन्हें कोई उम्मीद नहीं दी थी.

तो क्या अल्पसंख्यकों ने अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली? इसका जवाब तो समय देगा लेकिन फिलहाल तो उन्होंने 'शैतान' पर जीत हासिल कर ली है.

ये याद रखना जरूरी है कि श्रीलंका में लिट्टे से लड़ाई जीतने और देश को एकजुट रखने के लिए एक मजबूत सरकार की जरूरत थी. शांति स्थापना के बाद देश को अब ऐसी सरकार की ज्यादा जरूरत है जो उसकी मूल भावना के अनुरूप हो.

संसदीय चुनावों के दौरान सिरिसेना के एजेंडे में कार्यकारी राष्ट्रपति की भूमिका को समाप्त करना था. लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है. इसके लिए उन्हें संविधान में बदलाव करना होगा जिसके लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी. जो उनके गठबंधन के पास नहीं है.

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श्रीलंका के उठापटक वाले राजनीतिक इतिहास को देखते हुए एक साल तक बगैर किसी झटके के सरकार चला लेना ही अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है.

गठबंधन सरकार के बनते ही  कोलंबो में सरकार की उम्र को लेकर बातें होनी लगीं. उस समय कहा जा रहा था कि राजपक्षे अपने गांव में चुपचाप नहीं बैठेंगे. वो देर सबेर वापसी करेंगे.

लोगों की अटकलों के झूठा साबित करने का पूरा श्रेय राष्ट्रपति सिरिसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की जोड़ी को जाता है. दोनों ने जनभावनाओं से निपटने में परिपक्वता का प्रदर्शन किया. राजपक्षे खेमा भ्रष्टाचार, मुकदमेबाजी, गिरफ़्तारियों और विरोध प्रदर्शनों की उम्मीद कर रहा था. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. इससे भी सरकार चलाने में सहूलियत हुई.

लेकिन एक सवाल ये भी है कि क्या सिरिसेना बहुत देर तक भ्रष्टाचार के मामलों पर चुप्पी साधे रख सकेंगे? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिरिसेना को आखिरकार ये कड़वी गोली निगलनी ही होगी और राजपक्षे के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी होगी. ऐसा हुआ तो राजनीतिक तापमान बढ़ेगा और उसकी आंच गठबंधन की एकता पर भी पड़ेगी.

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एक साल पुरानी सरकार के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को दूर रखना भी मुश्किल होगा. सिरिसेना के चुनाव जीतने के बाद उनसे उम्मीद की गयी थी कि वो देश की राजनीतिक और आर्थिक हालात बदल लेंगे. उनसे तमिलों के मुद्दों को सुलझाने की भी उम्मीद की जा रही थी.  ये भी माना जा रहा था कि वो श्रीलंका की विदेश नीति को भी नई दिशा देंगे.

सत्ता में आने के बाद सिरिसेना ने राष्ट्रपति की शक्तियों में कटौती की. उन्होंने पुलिस, लोक सेवा, अदालत, न्यायपालिका और चुनाव आयोग को पहले से मजबूत किया.

नया संविधान


पिछला एक साल सिरिसेना के लिए भले ही सामान्य रहा हो लेकिन इस दौरान कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव भी नहीं दिखा. फिर अचानक ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने संसद को संविधान सभा में बदलकर एक सही कदम उठाया.

श्रीलंकाई संसद ने नए संविधान के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है. प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने संविधान सभा के निर्माण का प्रस्ताव पेश किया.

नए संविधान की सबसे बड़ी बात ये होगी कि इसके बाद 1978 में लागू कार्यकारी राष्ट्रपति के नेतृत्व वाला संविधान खत्म हो जाएगा. सिरिसेना ने इसे खत्म करके नए ज्यादा लोकतांत्रिक संविधान बनाने का वादा किया है.

सिरिसेना के इस फ़ैसले को अलग अलग लोग भिन्न भिन्न तरीके से देख रहे हैं. सिरिसेना ने कहा, "हमें इक्कीसवीं सदी के अनुरूप संविधान चाहिए जिससे सभी समुदायों सौहार्द्र के साथ रह सकें."

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उन्होंने ये भी कहा कि "दक्षिण(सिंहला इलाका) और उत्तर(तमिल इलाका) के चरमपंथियों की वजह से देश के हजारों नौजवानों को जान गंवानी पड़ी है." उनके इस बयान को दोनों समुदायों पर की गयी टिप्पणी के रूप में देखा गया. उन्होंने आशा व्यक्ति की कि संसद समन्वय और सौहार्द्र की भी स्थापना के लिए भी काम करेगी.

संसद के विशेष सत्र में विक्रमसिंघले ने संविदान सभा के निर्माण का प्रस्ताव किया. सभी सासंद इस सभा के सदस्य होंगे और संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए 17 सदस्यों की एक समिति बनायी गयी.

पिछले सरकार पर निशाना साधते हुए पीएम ने कहा कि नए संविधान का निर्माण पूरी संसद करेगी, न कि संसद से बाहर बैठकर कुछ लोग.

भारत का क्या लाभ है?

श्रीलंका से भारत के कूटनीति, रणनीति और सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवाल जुड़े हुए हैं. मित्रवत पड़ोसी से व्यावहारिक रिश्ते रखना बेहतर होता है. उसे रौब दिखाना या उसे अलगथलग छोड़ देना उचित नहीं. हिंद महासागर में भारत के हितों को देखते हुए दोनों देशों के संबंध और महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन (आईओआरए) में श्रीलंका का महत्वपूर्ण स्थान है. राजपक्षे ने भारत को आश्वस्त किया था कि श्रीलंका इस जलक्षेत्र में भारत के ख़िलाफ़ चीन के साथ नहीं जाएगा.

सिरिसेना को भारत को आश्वस्त करना होगा कि वो चीन के साथ संबंध बढ़ाते हुए भारत की सुरक्षा चिंताओं का ख्याल रखेंगे

सिरिसेना को भी ये रणनीति बरकरार रखते हुए भारत को आश्वस्त करना चाहिए चीन के साथ वार्ता के दौरान वो भारत की भावनाओं का ख्याल रखेगा. चीन श्रीलंका के बड़ी परियोजनाओं में भारी निवेश कर रहा है. लेकिन इस दिशा में श्रीलंका ने अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया है.

साल 2014 में तत्कालीन श्रीलंका सरकार ने चीन के एक प्रस्ताव को हरी झंडी दी. जिसके तहत चीन को त्रिनकोमली स्थिति श्रीलंकाई बेड़े में शामिल चीनी एयरक्राफ्टों के लिए रखरखाव और मरम्मत केंद्र स्थापित करने की अनुमति दी गयी. श्रीलंकाई बेड़े में चीन के चेंगड़ु एफ-7 एयरक्राफ्ट और वाई-12 तथा एमए60 ट्रांसपोर्टर शामिल हैं.

चीन को जो जगह दी गयी है वो भारत के नेशनल थर्मल पावर कॉर्प को एक बिजली घर बनाने के लिए दी गयी जमीन के बहुत करीब है. भारत ने चीन की योजना पर अपनी चिंता जतायी तो श्रीलंका ने आश्वासन दिया कि प्रस्तावित परिसर की सुरक्षा केवल एसएलएएफ के हाथ में रहेगी. हालांकि सरकार बदलने के बाद वो योजना रद्द कर दी गयी.

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पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के हालिया श्रीलंका दौरे में दोनों ने 40 करोड़ डॉलर का सैन्य समझौता किया. जिसके तहत पाकिस्तान श्रीलंका को जेएफ-17 थंडर फाइटर एयरक्राफ्ट देगा. माना जाता है कि ये एयरक्राफ्ट चीन में बने हुए हैं पाकिस्तान में बस उनकी असेंम्बलिंग की गयी है.

विदेश नीति के मसले पर श्रीलंका को स्पष्ट रूख रखना होगा. उसे भारत को ये भरोसा दिलाना होगा कि उसके किसी कदम से भारत के सुरक्षा हितों को धक्का नहीं लगेगा.

एक साल पुरानी सरकार के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को लंबे समय तक दूर रखना मुश्किल होगा खासकर तब जब उसे अल्पसंख्यकों के वोटों की मदद से जीत मिली है. लेकिन पश्चिमपरस्त एनजीओ और चर्च के एक खास तबके से समर्थन प्राप्त संगठनों को ज्यादा ढील देने  से उन्हें लाखों बौद्ध भिक्षुओं की आलोचना का सामना करना होगा. उन्हें सहयोग दे रहे कुछ राजनीतिक दल भी ऐसी स्थिति में उनसे रंज हो सकते हैं.

सिरिसेना को पश्चिम के संग कारोबार करते समय सामाजिकक और धार्मिक मुद्दों पर व्यावहारिक नजरिया अपनाना होगा. उन्हें चीन और भारत के संग कारोबार में भी संतुलन बैठाना होगा. एक की कीमत पर दूसरे से संबंध सराहनीय नहीं होगा.

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साल 2009 में समाप्त हुए युद्ध के बाद श्रीलंका में होने वाले पुनर्निमाण में भारत की प्रमुख भूमिका रही है. भारत ने विस्थापितों को आवास उपलब्ध कराने, बिजली घर बनाने और रेलवे ढांचा तैयार करने में मदद की है. साथ ही उसने श्रीलंका सरकार पर उत्तरी प्रांतों के प्रति ज्यादा समावेशी रवैया अपनाने के लिए प्रेरित भी किया है.

श्रीलंका के तमिल सुमदाय के पास फिलहाल शायद कोई नेता नहीं है लेकिन उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अभी जिंदा और अपूर्ण हैं. श्रीलंका सरकार को इसका अहसास है. ताज्जुब की बात ये है कि न तो तमिल समुदाय न ही सरकार एक दूसरे तक प्रभावशाली और निष्पक्ष ढंग से अपनी बात पहुंचा पाए.

सिरिसेना के सैकड़ों वादों पर एक नजर डालने से भी ये साफ हो जाता है कि उनमें अल्पसंख्यकों के लिए कुछ नहीं है. खास तौर पर उन्हें बड़ी संख्या में वोट देने वाले तमिलों के लिए. इससे पहले कि श्रीलंका की राजनीति में कोई बड़ी उलटपलट हो उन्हें इस मुद्दे पर कुछ करके दिखाना होगा.

First published: 13 January 2016, 8:22 IST
 
शेषाद्री चारी @seshadrichari

Seshadri Chari is a strategic and security analyst, commentator, and former UN consultant on governance. He also heads the BJP's Foreign Policy Cell.

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