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पाक सेना प्रमुख रहील शरीफ के रक्षा दिवस पर संबोधन की पांच अहम बातें

तिलक देवाशर | Updated on: 12 September 2016, 7:29 IST

पाकिस्तान में छह सितंबर ‘रक्षा दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है. यह सेना और मीडिया दोनों को अपनी पीठ थपथपाने का अवसर देता है. यह वह दिन है, जब लाहौर पर छल से आक्रमण करने के लिए पाकिस्तानी सेना ने 1965 में भारत को मुंहतोड़ सबक सिखाया था.

पाकिस्तानी सरकार का 1965 के युद्ध का यह अधिकारिक वर्णन, अगस्त 1965 में ऑपरेशन जिब्राल्टर और उसके सहयोगी ऑपरेशन ग्रैंड स्लेम के माध्यम से जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान के अवैध हमले को नजरअंदाज कर जाता है.

‘जीत’ का जश्न अपने शबाब पर है. सेना प्रमुख का संबोधन और पाकिस्तान के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए वे पुष्पांजलि अर्पित करने की रस्म पूरी करते हैं. हर देश में अपने शहीदों के सम्मान में इसी तरह की रस्में अदा की जाती हैं, पर पाकिस्तान में सेना प्रमुख को ज्यादा महत्व देने और आम नागरिक और सेना के बीच संदिग्ध रिश्तों के कारण, यहां इसका अतिरिक्त महत्व है.

यह जनरल रहील शरीफ का तीसरा संबोधन था और अधिकांश लोग हैरान थे कि क्या वे इस बात का संकेत देंगे कि यह उनका अंतिम संबोधन है. हालांकि शरीफ ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया. इसके विपरीत उनके हाव-भाव से लग रहा था कि उनका संबोधन राष्ट्राध्यक्ष सरीखा है जिसमें उन्होंने कई विषयों को कवर किया.

उनकी जोर-शोर से की गई घोषणाओं के अलावा, जिनकी कि ऐसे अवसरों पर उम्मीद की जाती है, पांच बातें खासतौर से महत्वपूर्ण थीं- दो पाकिस्तान की अंदरूनी स्थितियों पर और तीन पाकिस्तान से बाहर की स्थितियों पर.

1. ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब

उन्होंने घोषणा की कि दो साल पहले ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब के तहत शुरू की गई ‘आतंकवादियों के समूल उन्मूलन’ की कार्रवाई अपने निर्धारित सैन्य लक्ष्यों को पूरा कर लिया है. पहले भी कुछ अवसरों पर उन्होंने और उनके जनसंपर्क प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम बजवा ने स्पष्ट किया था कि यह सभी तरह के आतंकवादियों के खिलाफ एक व्यापक ऑपरेशन है.

पिछले दो सालों से यह स्पष्ट है कि इस ऑपरेशन ने हक्कानी नेटवर्क या लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद जैसी ‘रणनीतिक संपत्तियों’ को निशाना नहीं बनाया. दूसरे शब्दों में, या तो जनरल ‘आतंकवादियों के समूल उन्मूलन’ के बारे में गलत बोल रहे हैं या फिर सेना इन्हें आतंकवादी गुट नहीं मानती.

किसी भी स्थिति में, यदि भारत और अफगानिस्तान को कोई अतिरिक्त प्रमाण की जरूरत हो कि उन गुटों को निशाना नहीं बनाया जाएगा, तो रहील शरीफ का भाषण पक्की दलील होगा.

2- नेशनल एक्शन प्लान के क्रियान्वयन में ढील

जनरल ने यह जरूर माना कि ‘शांति के लिए भीतरी और बाहरी खतरों का पूरी तरह से उन्मूलन नहीं किया गया है’ और इसके लिए उन्होंने अपने पत्र और उत्साही संबोधन में नेशनल एक्शन प्लान के क्रियान्वयन में कमी को दोषी बताया.

इस बात को तवज्जो नहीं देने के लिए सेना ने असैन्य सरकार की हमेशा खिंचाई की है. उनकी आलोचना बड़ी सख्त और तीखी थी. उन्होंने आतंकवादियों के खिलाफ सैन्य उपलब्धियों को बनाए रखने के लिए विस्तार से कानूनी और प्रशासनिक सुधार की मांग की और कहा कि राज्य के सभी स्टेकहोल्डर्स और संस्थाओं को पूरी संजीदगी और समर्पण के साथ अपनी भूमिकाएं निभाने की आवश्यकता है.

उन्होंने कहा, चूंकि सेना अपने दायरे से बाहर जाकर काम कर रही है, इससे साफ है कि सरकार का काम ढीला-ढाला है, और यह आतंकवाद के उन्मूलन में बाधक बन रहा है. जनरल ने एक कदम आगे बढ़कर इसकी मांग की कि भ्रष्टाचार और आतंकवाद के बीच की मिलीभगत खत्म होनी चाहिए, ताकि ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब की सफलता को मजबूत किया जा सके.

पनामा पेपर लीक के मामले में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का नाम आना और इस मुद्दे पर इमरान खान का आंदोलन शुरू करने को लेकर भ्रष्टाचार का उल्लेख प्रधानमंत्री को दिया गया सीधा संदेश है कि उन्हें अपने घर में ही व्यवस्था बनानी है.

3- कश्मीर का समाधान

‘आजादी के आंदोलन को हर स्तर पर’ पाकिस्तान के राजनयिक और नैतिक सहयोग का आश्वासन देते हुए कश्मीर समस्या के समाधान के बारे में जनरल ने कहा कि इसका समाधान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों में है.

सभी तरह के पाकिस्तानी नेताओं के लिए कश्मीर से जुड़ा संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव जादू की छड़ी बन गया है, जिन्हें लगता है कि यूएन प्रस्ताव कश्मीर को उनकी गोद में रख देगा. जीत और 1965 में भारत के आक्रमण जैसे मिथ की तरह कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव, कश्मीर मुद्दे पर रामबाण की तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी पाकिस्तानियों को ‘बेच’ दिए गए हैं.

असल चर्चा इस विषय पर होनी चाहिए कि क्या पाकिस्तान के आम लोगों ने यूएन के प्रस्ताव को पढ़ा है और उसके लिए जरूरी एक्शन लिए हैं, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह हटाने की मांग की गई है, साथ में उनको भी जो आमतौर पर वहां के मूल निवासी नहीं हैं.

क्या जनरल शरीफ इसका संकेत दे रहे थे कि पाकिस्तान इन क्षेत्रों से सेना हटाने को तैयार है? जब उन्हें अपने कहे के परिणाम समझ में आएंगे, तो उन्हें वाकई धक्का लगेगा.

4. चीन के साथ संबंध

उन्होंने अपने सबसे प्रिय शब्द पाकिस्तान-चीन मैत्री के लिए बचा कर रखे थे, जिसे वे क्षेत्र में आपसी सम्मान और समानता के सिद्धांतों पर आधारित रिश्तों का सबसे बड़ा उदाहरण मानते हैं. उन्होंने चीन-पाक आर्थिक गलियारे को इस रिश्ते का सबसे बड़ा प्रमाण बताया. 

उन्होंने चीन-पाक आर्थिक गलियारे के खिलाफ षडयंत्रों को खत्म करने का वादा किया और जिन मुद्दों को लेकर चीन ने चिंता व्यक्त की है, उन्हें समय पर पूरा करने और हिफाजत करने का आश्वासन दिया.

5. अमरीका के लिए संदेश

राहील शरीफ ने अपने संबोधन में यह कहकर अमरीका की ओर इशारा किया कि क्षेत्र में शांति की सबसे सशक्त गारंटी शक्ति का संतुलन बनाए रखने से है. बेशक संदर्भ भारत के साथ अमरीका के बढ़ रहे रक्षा सहयोग का था, जिससे पाकिस्तानियों को लगता है कि क्षेत्रीय शक्ति के समीकरण गड़बड़ाएंगे.

अंत में जनरल ने जो धमाका किया, वह था, ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए वे किसी भी हद तक जाएंगे.’ यह कथन शायद सीधा-सादा लगे, पर पाकिस्तान के वर्तमान हालात में इनके दो अर्थ हो सकते हैं.

चीन-पाक आर्थिक गलियारे के क्रियान्वयन में ढील, जो चीनियों को निराश कर रहे हैं, नेशनल एक्शन प्लान के क्रियान्वयन में ढील, पनामा पेपर लीक में सरकार द्वारा जांच में बाधक बनना, इमरान खान और ताहिर-उल-कादरी का समूह में आंदोलन, असैन्य सरकार के प्रधानमंत्री शरीफ नवाज को और संगठित होने का कथन, स्थानीय हालात की ओर संकेत करते हैं.

First published: 12 September 2016, 7:29 IST
 
तिलक देवाशर @catchhindi

Tilak Devasher retired as Special Secretary, Cabinet Secretariat, to the Government of India. His book Pakistan: Courting the Abyss is releasing shortly.

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