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'भारत पाक का अतीत है और पाक का भविष्य भी'

अश्विन अघोर | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST

एक पल के लिए पिछले सात दशकों से चली आ रही दुश्मनी को भुला दिया जाए तो अब भारत और पाकिस्तान कहे जाने वाले देश में 1947 से पहले क्या अंतर था? ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषाई रूप से क्या दोनों देशों में कोई अंतर किया जा सकता है?

ये बातें पाकिस्तान के सबसे बड़े मीडिया समूह डॉन के सीईओ हमीद हारून ने 'भारत और पाकिस्तान: द्विपक्षीय बातचीत में हालिया सफलता को टिकाऊ कैसे बनाया जाए' विषय पर आयोजित एक परिचर्चा के दौरान कहा. इस परिचर्चा का आयोजन मुंबई प्रेस क्लब और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा गुरूवार को किया गया था.

हारून ने कहा अगर भारत और पाकिस्तान की सरकारें द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं करती तो लोगों और खासकर युवाओं को पहल करनी चाहिए.

दाउद पाकिस्तान का नागरिक नहीं लेकिन यहां आते-जाते रहता है

उन्होंने कहा, '' इस क्षेत्र में परिवर्तन लाने के लिए मीडिया के पास एजेंडे को आगे बढ़ाने की क्षमता है. मीडिया जनता की राय को बना सकती है. युवा पीढ़ी के सहयोग से शांति की राह पर आगे बढ़ा जा सकता है.''

दाउद पाक का नागरिक नहीं

दाउद इब्राहीम से जुड़े एक सवाल पर उन्होंने कहा, ''जहां तक मुझे पता है, दाउद इब्राहिम पाकिस्तान का नागरिक नहीं है. मुझे बताया गया कि वह नियमित पाकिस्तान आता है. मुझे बताया गया कि वह दुबई और दक्षिण अफ्रीका में ज्यादा वक्त बिताता है.

उन्होंने कहा, ''दाउद हत्यारा है. सरकार को सभी हत्यारों के खिलाफ कदम उठाने चाहिए. मैं दाउद को कतई नापसंद करता हू. मैंने उसे कभी नहीं देखा.''

भूत और भविष्य

पाकिस्तान में पढ़ाए जाने वाले इतिहास में यह कोशिश रहती है कि भारत के साथ ऐतिहासिक संबंधों को कमतर दिखाया जाए. लेकिन पांच हजार साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता का उदाहरण देकर दोनों क्षेत्रों को सांस्कृतिक रूप से एकसमान बताया जाता है.

'भारत-पाक के बीच संबंधों को फिर से स्थापित करने के लिए हिंद महासागर के जरिए रास्ता खोलना चाहिए'

हारून कहते हैं, ''भारत पाकिस्तानी सभ्यता की जननी है. सिंध के धार्मिक स्थल और भारत के मंदिरों के बीच इसका लिंक मिल सकता है. देवी काली का मूल बलूचिस्तान में है. पूरी सभ्यता सिंधु नदी के किनारे विकसित हुई है.''

हारून ने उम्मीद जताई कि भारत-पाक के बीच एक साझा भविष्य के सपने के साथ साझा इतिहास जोड़ने का कार्य आपसी व्यापार के माध्यम से किया जा सकता है. इससे दोनों देशों के बीच दोस्ती और शांति कायम हो सकती है. उन्होंने कहा, ''पाक भारत के अतीत का हिस्सा रहा है और अब भारत के भविष्य हिस्सा है. आज तकनीक संस्कृति और व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. अब एक-दूसरे के साथ बातचीत करने के लिए रास्ता बनाने का समय है.''

बंदरगाह वाले शहर कैसे मदद कर सकते हैं

हारून के मुताबिक कराची और मुंबई जैसे समुद्री केंद्र पुराने सहयोगी रहे हैं. ये बंदरगाह नई दिल्ली और इस्लामाबाद की नीतियों में परिवर्तन ला सकते हैं. मुंबई और कराची शहर दोनों देशों के रिश्तों में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.

इसके अलावा उन्होंने भारत-पाक के बीच संबंधों को फिर से स्थापित करने के लिए हिंद महासागर वाले मार्ग को

खोलने पर जोर दिया. उन्होंने बताया कि हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित कराची और अहमदाबाद में एकसमान समुद्री संस्कृति है. दोनों शहरों के बीच संबंधों का एक विशाल सांचा मौजूद है.

दोनों देशों द्वारा एक दूसरे के मछुआरों को अकसर पकड़ने और छोड़ने के बारे में हारून ने कहा कि मछुआरे भारत और पाकिस्तान की उदारता के प्रतीक बन गए हैं. भारत बहुत से मछुआरों को रिहा करता है और पाकिस्तान बहुत से मछुआरों को रिहा करता है.

हिंद महासागर क्षेत्र में स्थित कराची और अहमदाबाद में एकसमान समुद्री संस्कृति है

उन्होंने दोनों देशों द्वारा एक दूसरे की देखा देखी एक दूसरे के मछुआरों को रिहा करने की प्रवृत्ति को गलत बताते हुए कहा कि दोनों देशों को एकतरफा कदम के तहत मछुआरों को रिहा करना चाहिए, जो समाज के सबसे गरीब वर्ग के होते हैं.

इसके अलावा हारून ने कहा कि नागरिक समाज, गैर सरकारी संगठन और मीडिया 21वीं सदी का हिस्सा हैं और ये रिश्तों को जीवित रखना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई की तरह जन आंदोलन चलाना होगा ताकि भारत-पाकिस्तान के संबंधों को आगे बढ़ाया जा सके.
First published: 26 December 2015, 8:23 IST
 
अश्विन अघोर @catchnews

मुंबई स्थित स्वतंत्र पत्रकार

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