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भारत, बाबर 3 मिसाइल परीक्षण को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं ले सकता

विवेक काटजू | Updated on: 11 January 2017, 8:11 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

पाकिस्तान ने सोमवार को ऐलान किया कि उसने 450 किमी रेंज वाली न्यूक्लियर समुद्री मिसाइल बाबर-3 का सफल परीक्षण किया है. उसका दावा है कि मिसाइल में दुश्मनों के न्यूक्लियर हमले पर पलटवार करने की प्रामाणिक क्षमता है. इस दिशा में खुद को शक्तिशाली बनाने का यह एक और कदम है. बाबर-3 के साथ ही पाकिस्तान जमीनी, हवाई और समुद्री न्यूक्लियर हथियारों की त्रयी पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा है. 

पाकिस्तान खुले आम कहता है कि उसके न्यूक्लियर हथियार भारत के लिए हैं. इसलिए बाबर-3 के परीक्षण की घोषणा करते समय वह भारत को बीच में लाने से नहीं रुका. उसने जोर देकर कहा कि ‘पाकिस्तान के पड़ोस में जिस तरह की रणनीति और रवैया है, यह उसी के जवाब में किया गया है.’ 

भारत ने चीन की धमकियों के विरुद्ध सुरक्षा की रणनीति बनाई है, तो वह पाकिस्तान को भी कभी अनदेखा नहीं करेगा, क्योंकि पाकिस्तान भारत को हमेशा से अपना दुश्मन मानता है. ज़ाहिर है, बाबर 3 का असर भारत की सुरक्षा पर पड़ेगा. 

भारत कितना गंभीर

क्या सुरक्षा की योजना बनाने वाला रक्षा मंत्रालय इस कदम को इसलिए अहमियत नहीं देगा क्योंकि भारत जमीनी, हवाई और समुद्री न्यूक्लियर हथियारों में आगे बढ़ रहा है? या बाबर-3, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की भारत के एनएफयू न्यूक्लियर सिद्धांत पर पुनर्विचार करने की इच्छा पर गंभीरता से सोचने को विवश करेगा? 

पर्रिकर की गैर-मंत्रालयी रुख के लिए आलोचना की गई थी, यहां तक कि उन पर संजीदा नहीं होने का आरोप लगाया गया था. तब जब उन्होंने पिछले नवंबर में सुझाव दिया था कि एनएफयू से जुड़ने की बजाय भारत को इस बात पर जोर देना चाहिए कि एक जिम्मेदार न्यूक्लियर पावर की हैसियत से वह अपने न्यूक्लियर हथियारों का गैरजिम्मेदारी से प्रयोग नहीं करेगा. 

चीन-कोरिया की मदद

ट्रैक सेकंड फोरम्स में पाकिस्तान के प्रतिनिधियों ने भारत के एनएफयू सिद्धांत में कम भरोसा जताया था. पाकिस्तान के नेतृत्व ने रक्षा वैज्ञानिकों को देशज एसएलसीएम विकसित करने के लिए बधाई दी है. उसने इसे ‘तकनीकी प्रगति और आत्मनिर्भरता’ की ओर बढ़ता कदम बताया. जबकि तथ्य इससे भिन्न हैं. 

चीन ने संकट की स्थितियों में पाकिस्तान के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम को विकसित करने में मदद की है. उत्तरी कोरिया ने भी पाकिस्तान के मिसाइल की प्रगति में मदद की है. इसके अलावा उन्होंने विशुद्ध देशज विकास की बजाय चोरी, तस्करी और संवेदनशील तकनीक की अवैध बिक्री से परमाणु बम और मिसाइल विकसित करने के लिए अपना वैज्ञानिक और तकनीकी कौशल बढ़ाया है. 

ध्यान दे भारत

भारत को इस पर ध्यान देना आवश्यक है कि न्यूक्लियर और मिसाइल के लिए हमारे विरोधी चीन और पाकिस्तान के ताल्लुकात बढ़ गए हैं. यह आश्वस्त करके कि पाकिस्तान ने परीक्षित और विश्वसनीय सेकंड स्ट्राइक क्षमता विकसित कर ली है, चीन भारत को और लड़खड़ाना चाहता है.

अग्नि-4 मिसाइल के सफल परीक्षण के मद्देनजर ग्लोबल टाइम्स के मार्फत चीन ने भारत को खुली चेतावनी दी है कि वह चीन के विरुद्ध रणनीति से स्पर्धा करने की सोचे भी नहीं. उसने यह भी साफ कहा कि अगर पश्चिम भारत को न्यूक्लियर मुद्दे पर मदद करता है, तो ‘चीन पाकिस्तान का साथ देगा’. यह कहकर उसने जोर दिया कि उसे भारत जैसी ही सुविधा मिलेगी. 

भारत के पास 3 लॉन्च की हुई समुद्री मिसाइलें हैं, जिनमें से एक प्राक्षेपिक मिसाइल है और दो क्रूज. 750 किमी. रेंज की सागारिका प्राक्षेपिक मिसाइल में भारत ने समुद्री लॉन्च सिस्टम विकसित किया है. उसकी परीक्षण प्रक्रिया सफल रही है और अब इसे नौसेना में शामिल किया जाएगा.

रूस के साथ मिलकर भारत ने जमीनी ब्रह्मोस सिरीज और हवाई क्रूज मिसाइलें बनाई हैं. समुद्री मिसाइल को मार्च 2013 में लॉन्च किया गया था. इसकी रेंज 290 किमी है और यह सुपरसोनिक मिसाइल है. एमटीसीआर की सदस्यता के साथ ही मिसाइल की रेंज बढक़र 600 किमी हो जाएगी. 

आनन-फानन में परीक्षण?

भारत ने अभी स्वदेशी 1000 किमी रेंज की निर्भय समुद्री क्रूज मिसाइल बनाने में सफलता हासिल नहीं की है. उसके अब तक  5 परीक्षण किए गए हैं, जो सफल नहीं रहे. बाबर-3 के बाद इस काम को करने की आवश्यकता है, जिसे प्रधानमंत्री निर्भय मिसाइल्स में सफलता के लिए ‘मिशन मोड’ कहते हैं. बाबर 3 को पाकिस्तान की न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा विकसित करने की बेताबी के संदर्भ में देखना चाहिए. 

व्यापक रूप से माना जाता है कि पाकिस्तान के पास विश्व में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ने वाला न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा है. इसने थिएटर न्यूक्लियर हथियार (टीएनडब्ल्यू) बनाने का फैसला लिया है, जो स्वाभाविक रूप से अस्थिर है. इस उद्देश्य से उसने हत्फ-9 (एनएएसआर) कम रेंज की प्राक्षेपिक मिसाइल विकसित की है, जो छोटे परमाणु बम के साथ जुड़ सकती है. 

पाकिस्तान दावा करता है कि टीएनडब्ल्यू का औचित्य भारत की पारंपरिक सैन्य श्रेष्ठता और पारंपरिक बलों को इस्तेमाल करने के आक्रामक सिद्धांत के विकास को देखते हुए है. हालांकि यह महज बहाना है क्योंकि पाकिस्तान के लगभग तीन दशक से आतंक फैलाने के बावजूद भारत ने बेहद संयम बरता है.

फिलहाल भारत बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई के सिद्धांत पर अड़ गया है. अगर भारत की सैन्य टुकड़ी के खिलाफ विश्व में कहीं भी किसी भी साइज के न्यूक्लियर, केमिकल या जैविक हथियार इस्तेमाल किए गए या उस पर उसका कोई प्रभाव पड़ा तो जिस न्यूक्लियर सिद्धांत की घोषणा 2003 में की गई थी और न्यूक्लियर और मिसाइल विकास में पाकिस्तान को चीन की लगातार मिल रही मदद और नए हथियार को देखते हुए उसमें बदलाव की जरूरत है. समय आ गया जब उस सिद्धांत पर पुनर्विचार किया जाय, जिससे देश उपमहाद्वीप में शक्ति संतुलन को लेकर आश्वस्त हो सके.

First published: 11 January 2017, 8:11 IST
 
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