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गिलगित-बाल्टिस्तान बनेगा पाकिस्तान का 5वां प्रांत! भारत इसे क्यों स्वीकार नहीं कर सकता?

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 March 2017, 8:50 IST

भारत ने पाकिस्तानी प्रेस की उन खबरों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है कि पड़ोसी देश गिलगित और बाल्टिस्तान को अपने पांचवें प्रांत का दर्जा देने की योजना बना रहा है.

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गोपाल बागले ने अपनी साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान इस मुद्दे पर भारत के पक्ष को स्प्ष्ट करते हुए कहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा है और बना रहेगा. पाकिस्तान की ओर से की गई किसी भी एक तरफा कार्रवाई का कोई भी वैध आधार नहीं होगा.

भारत की यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान के अंतर प्रांतीय समन्वय मंत्री रियाज हुसैन पीरजादा की मीडिया को दी गई उस टिप्पणी पर आई है जिसमें उन्होंने कहा था पाकिस्तान के डि-फैक्टो विदेश मंत्री सरताज अजीज की अध्यक्षता में गठित समिति ने गिलगित-बाल्टिस्तान को प्रांत का दर्जा देने की सिफारिश की है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पीरजादा ने कहा कि समिति ने गिलगिट-बाल्टिस्तान को एक अलग प्रांत बनाने की अनुशंसा की है.

हालांकि रिपोर्ट की बाकी चीजें सामने नहीं आ सकी है. लेकिन इन दिनों पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जिस तरह से कई मोर्चों पर घिरे हुए हैं उसकी उपेक्षा करना भी समझदारी नहीं होगी. इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा है कोर्ट में लंबित पनामा पेपर्स लीक जांच का मामला जिसका फैसला नवाज शरीफ के राजनीतिक कैरियर पर असर डाल सकता है. माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही अपना फैसला सुनाएगा.

क्षेत्र का इतिहास और भारत की स्थिति

1949 में कराची एग्रीमेंट के बाद से ही पाकिस्तान इस हिस्से को विवादित कश्मीर क्षेत्र का हिस्सा मानता रहा है. इसके पूर्व यह हिस्सा डोगरा साम्राज्य का भाग हुआ करता था जिन्होंने बाद में इसे ब्रिटेन को लीज पर दे दिया था. अंग्रेज इस इलाके को रणनीतिक सेफ्टी वॉल्व के रूप में चाहते थे.

इस क्षेत्र पर पाकिस्तान का नियंत्रण होने के बावजूद पाकिस्तान ने अब तक इस क्षेत्र को पूरी तरह से पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनाया है. इस स्थिति में किसी भी बदलाव का मतलब है कि पाकिस्तान के पास कश्मीर मसले को लेकर भारत पर आक्रमण करने का कोई मौका नहीं रहेगा.

इस क्षेत्र के प्रति पाकिस्तान के रवैए में 2009 में भारी बदलाव तब दर्ज किया गया था जब गिलगित-बाल्टिस्तान एम्पॉवरमेंट एंड सेल्फ गवर्नेंस आॅर्डर के तहत इसे लगभग प्रांतीय दर्जा दिया गया था. इस आॅर्डर के पूर्व यह क्षेत्र बस उत्तरी क्षेत्र के रूप में संबोधित किया जाता था. 2015 में इस क्षेत्र में दूसरे विधानसभा चुनाव संपन्न हुए.

इस कदम का विरोध करते हुए भारत के विदेश मंत्रालय के तत्कालीन प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा था कि पाकिस्तान द्वारा लगातार इस क्षेत्र को लोगों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित किए जाने के रवैये तथा इस क्षेत्र को समाहित किए जाने के प्रयासों से भारत चिंतित है.

चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरीडोर, जिसमें चीन 50 बिलियन डॉलर से भी अधिक निवेश एक बेल्ट-एक रोड परियोजना के अंतर्गत पाकिस्तान में कर रहा है. भारत द्वारा इसका विरोध भी इसी तथ्य पर आधारित है कि यह गिलगित-बॉल्टिस्तान से होकर गुजरता है, जिसे भारत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का भाग बताते हुए अपना ही भूभाग होने का दावा करता है.

रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तानी विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का यह कदम चीन को ही आश्वस्त करने के लिए उठाया गया हो सकता है. भारत में पाकिस्तान के मामलों पर नजर रखने वाले जानकार भी इस संभावना से इंकार नहीं करते. चीन ने इस क्षेत्र जहां से कि यह अरबों डॉलर का कॉरिडोर गुजरता है कि सुरक्षा से लेकर स्थानीय लोगों में असंतुष्टि आदि के मुद्दों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की थी.

पाकिस्तान के लिए कठिन है आगे की राह

इस काम में आने वाली अड़चनों को देखते हुए पाकिस्तान की सरकार के लिए यह कोई आसान काम नहीं होने वाला. गिलगित-बालटिस्तान को प्रांत का दर्जा देने का मतलब होगा कि इस क्षेत्र की नीति में भारी बदलाव, जिससे एक तरफ कश्मीर-समर्थक तत्वों में इस कदम का विरोध बढ़ेगा तो दूसरी तरफ स्वतंत्रता की मांग करने स्थानीय लोगों में भी इसका विरोध होना तय है.

जम्मू-कश्मीर में मौजूद अलगाववादी नेता जैसे यासीन मलिक अतीत में इस तरह के कदम के बारे में नवाज शरीफ सरकार को आगाह कर चुके हैं कि किस तरह से ऐसे किसी कदम से उनके कश्मीर पर मौजूदा स्टैंड के लिए गंभीर निहितार्थ होंगे अथवा इससे एक आजाद कश्मीर की मांग पर सर्वाधिक असर होगा.

इसके अलावा गिलगित-बाल्टिस्तान को पांचवें प्रांत का दर्जा दिए जाने के लिए यह जरूरी होगा कि इसके लिए संविधान में संशोधन किया जाए, जिस पर पाकिस्तान की संसद की मुहर लगना भी जरूरी होगा.

प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इन दिनों पनामा पेपर मामले में भारी मुश्किल का सामना कर रहे हैं और कम से कम इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक इस स्थिति में नहीं होंगे कि संविधान संशोधन के पारित होने की राह सुनिश्चित कर सकें.

पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का भी भारी दबाव है. अगर पाकिस्तानी सरकार इसकी सीमा से संचालित होने वाले अनेक आतंकी संगठनों पर कार्रवाई नहीं करती है तो इस मुद्दे पर वह पाकिस्तान की आर्थिक सहायता रोकने की पहल कर सकता है.

First published: 18 March 2017, 8:50 IST
 
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