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पाकिस्तान: सूफ़ी दरगाह लाल शाहबाज़ क़लंदर में धमाल के दौरान धमाका, 88 की मौत

कैच ब्यूरो | Updated on: 18 February 2017, 9:38 IST
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पाकिस्तान में मशहूर सूफ़ी दरगाह लाल शाहबाज़ क़लंदर में हुए आत्मघाती धमाके में मरने वालों की तादाद 88 पहुंच गई है. यह दरगाह सिंध प्रांत के सहवान क़स्बे में स्थित है. ब्लास्ट में 250 ये ज्यादा लोग ज़ख़्मी बताए जा रहे हैं.

हमले के पीछे आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) का हाथ बताया जा रहा है. लाल शाहबाज़ कलंदर की दरगाह को शिया मुसलमानों की मशहूर इबादतगाह भी माना जाता है. कराची पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक सहवान क़स्बे के डीसीपी ने करीब 100 मौतों की बात कही है. 

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पुलिस के मुताबिक लाल शाहबाज़ क़लंदर दरगाह में यह धमाका सूफ़ी रस्म 'धमाल' के दौरान हुआ. ब्लास्ट के वक़्त दरगाह परिसर के अंदर सैकड़ों की तादाद में जायरीन मौजूद थे.

तालुका अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक मोइनुद्दीन सिद्दीकी के मुताबिक कम से कम 50 से ज्यादा शवों और 250 से ज्यादा घायलों को अस्पताल लाया गया. इलाके के अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है. दरगाह के सबसे करीब अस्पताल 40 से 50 किलोमीटर की दूरी पर है.

पुलिस अधिकारी तारिक विलायत के मुताबिक शुरुआती रिपोर्ट से पता चलता है कि यह फिदायीन हमला है. दरगाह में महिलाओं के लिए आरक्षित इलाके में ब्लास्ट हुआ. बचाव अधिकारियों का कहना है कि पर्याप्त एंबुलेंस नहीं होने की वजह से मरने वालों की तादाद बढ़ सकती है. गुरुवार का दिन होने के चलते बड़ी तादाद में लोग दरगाह में मौजूद थे. 

सिंध प्रांत के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने तत्काल बचाव अभियान चलाने का आदेश दिया और सरकार ने हैदराबाद एवं जमशुरू जिलों के अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित की है.

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12वीं सदी के सूफ़ी संत लाल शाहबाज़

सूफी दार्शनिक और संत लाल शाहबाज कलंदर का असली नाम सैयद मुहम्‍मद उस्‍मान मरवंदी (1177-1275) था. कहा जाता है कि वह लाल कपड़ा पहनते थे, इसलिए उनके नाम के साथ लाल जोड़ दिया गया.बाबा कलंदर के पुरखे बगदाद से ताल्‍लुक रखते थे लेकिन बाद में ईरान के मशद में जाकर बस गए. हालांकि बाद में वे फिर मरवंद चले गए. बाबा कलंदर गजवनी और गौरी वंशों के समकालीन थे. वह फारस के महान कवि रूमी के समकालीन थे और मुस्लिम जगत में खासा भ्रमण करने के बाद सहवान में बस गए थे. यहीं पर उनका इंतकाल हुआ.

वह मजहब के खासे जानकार थे और पश्‍तो, फारसी, तुर्की, अरबी, सिंधी और संस्‍कृत के जानकार थे. उन्‍होंने सहवान के मदरसे में भी पढ़ाया था और यहीं पर कई किताबों की रचना की. उनकी लिखी किताबों में मिज़ान-उस-सुर्फ, किस्‍म-ए-दोयुम, अक्‍द और जुब्‍दाह का नाम लिया जाता है. मुल्‍तान में उनकी दोस्‍ती तीन और सूफी संतों से हुई जो सूफी मत के 'चार यार' कहलाए.

First published: 18 February 2017, 9:38 IST
 
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