Home » इंटरनेशनल » Pakistan can't go after all terror outfits, it simply doesn't have the capacity: Mahmud Durrani
 

महमूद अली दुर्रानी: पाकिस्तान में देश के सभी आतंकी संगठनों से निपटने की क्षमता नहीं है

सादिक़ नक़वी | Updated on: 10 March 2017, 8:00 IST
कैच न्यूज़

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार महमूद अली दुर्रानी का बयान कि 2008 का मुंबई हमला पाक आतंकी संगठन ने किया था, इस हफ्ते सुर्खियों में रहा. उन्होंने यह बात दिल्ली में आयोजित 19वीं एशियाई सुरक्षा कांफ्रेस में कही. जब उन्होंने यही बात पहली बार 2009 में कही थी, तो उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद से हटा दिया गया था. हालांकि उन्होंने 2008 के नरसंहार के लिए आईएसआई को जिम्मेदार नहीं बताया. लश्कर-ए-तैयबा के आदमियों को जिम्मेदार माना. पर भारतीय जांचकताओं का कहना है कि उसे आईएसआई ने मदद की.

दुर्रानी के साथ कैच न्यूज़ की दिल्ली में बात हुई. उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान में देश के सभी आतंकी संगठनों से निपटने की क्षमता नहीं है, इसलिए उन पर ध्यान ज्यादा है, जो पाकिस्तान के भीतर अशांति पैदा कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘जैश के खिलाफ कुछ भी उम्मीद नहीं करें.’ वे यह भी कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान को हर हाल में इस संदर्भ में बात फिर से शुरू करनी चाहिए.

सवाल-जवाब

सीमा पार से आतंकी संगठनों के सक्रिय होने का भारत सरकार पाकिस्तान को बराबर प्रमाण देती रही है, जिन्होंने भारत में कई हमले किए हैं. जैसे उरी में फौजी ठिकानों पर हमला, या पठानकोठ में, या इससे पहले मुंबई में. पाकिस्तान इन आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करता?

शुरुआत सबसे पुराने, मुंबई हमले से करते हैं. यह पाकिस्तान के एक संगठन ने किया था, वे यहां आए और काफी लोगों को मारा. भारत के लोगों और सरकार का परेशान होना लाजिमी था. भारतीयों का मानना था कि ऐसा वृहद स्तर पर ऑपरेशन पाकिस्तान प्रतिष्ठान के सहयोग के बिना संभव नहीं है. यहीं वे गलती पर हैं. और मेरे पास इसके पुख्ता प्रमाण हैं. मैं सुरक्षा कारणों से बता नहीं सकता. मेरे पास ठोस प्रमाण हैं कि इसमें देश का, आईएसआई का, किसी का हाथ नहीं था.

सच तो यह है कि उस वक्त इंटलिजेंस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा था, ‘यह गलत बात है, बुरा वक्त है. हम यह नहीं चाहते थे. हम मारे जाएंगे.’ मैंने पूछा, जब आतंकी संगठन इस ऑपरेशन को अंजाम दे रहे थे, आप क्या कर रहे थे? उन्होंने कहा, हम फाटा में अपनी लड़ाई में व्यस्त थे. इन संगठनों के सदस्यों को पाकिस्तान सरकार ने अलग-थलग कर दिया है और कैंप्स में रखा है. उनका (एजेंसी) कसूर यह है कि जब इन संगठनों ने अपनी इच्छा से ये हमला किया तब उन्होंने ध्यान नहीं दिया.

पर इस तरह का हमला प्रतिष्ठान के सहयोग के बिना संभव नहीं है. ऐसे काम के लिए प्रशिक्षण और विषेज्ञता केवल सेना से ही मिल सकती है.

ज्यादातर मामलों में आप सही हैं, पर इस मामले में आप गलत हैं. जहां तक पाकिस्तानी प्रतिष्ठान का सवाल है, उनके लिए गलत समय था और गलत ऑपरेशन. जैसा कि मैंने कहा, मेरे पास ठोस वजह और प्रमाण हैं कि वे इसमें शामिल नहीं थे. उदाहरण के तौर पर, पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे आतंकी संगठन कश्मीर में भारतीय सेना के ठिकानों पर हमले करते रहे हैं.

यह कैसे संभव है कि उन्हें प्रतिष्ठान का संरक्षण नहीं है?

जहां तक मुझे जानकारी है, हाल की घटनाओं में पाकिस्तानी प्रतिष्ठान की कोई भूमिका नहीं है. आप एक बात पर ध्यान नहीं देना चाहते कि यह अशांति क्यों पैदा हुई? क्या वह पाकिस्तान था? यदि आप ऐसा सोचते हैं, तो मुझे डर है कि आप घाटी को नहीं जानते. ये कश्मीरी ही थे, और बाहरी ताकतों का कोई लेना-देना नहीं था.

पर बुरहान वानी के एंकाउंटर के बाद कई हमले हुए, खासकर सेना पर. जांच एजेंसियों का कहना है कि उन हमलों में जैश और लश्कर-ए-तैयबा का हाथ है.

मैं शुरुआती दिनों की बात कर रहा हूं, जब उस शख्स के मारे जाने के बाद लोग प्रतिष्ठान के खिलाफ हो गए थे और पैलेट गन इस्तेमाल की गई थीं. यह कश्मीर की प्रतिक्रिया थी. बेशक दूसरे लोग भी शामिल हो सकते हैं. यह संभव है. पर यह भारतीय सरकार की बदइंतजामी थी. यदि आपने उन्हें सही ढंग से संभाला होता, तो कश्मीरी आपका कहना मानते. अशांति के शुरुआती दौर में भी, पाकिस्तान को इसका भान नहीं था और वे झुंझलाए युवा ही थे. और अब भी अलगाववादी नेताओं से ज्यादा झल्लाए हुए युवा हैं.

पर इन आतंकी गुटों ने अशांति का लाभ उठाने की कोशिश की...

क्या आप उरी के बारे में बात कर रहे हैं? मुझे बताया गया था कि वे कश्मीरी युवा थे और हो सकता है पाकिस्तानी आतंकी नेटवर्क से जुड़े अन्य लोग हों. पर मैं नहीं सोचता कि उसकी पहल पाकिस्तान ने की होगी.

पाकिस्तानी प्रतिष्ठान इन आतंकी नेटवर्क के खिलाफ कदम क्यों नहीं उठाना चाहता? क्या इसलिए कि पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान अपनी उपयोगिता समझते हैं?

नहीं, इन इडियटों की कोई उपयोगिता नहीं है. आप पाकिस्तानी अखबार देखें, रोजाना आलेख छप रहे हैं कि इन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए वरना वे पाकिस्तान को बर्बाद कर देंगे. सुरक्षा एजेंसियां, पुलिस लगातार उनका मुकाबला कर रही हैं. इन दिनों में ही काफी लोग मारे गए. महज 5 दिनों में 5 हमले हुए, जिसमें शेहवान शरीफ पर हुआ हमला शामिल है. हम नहीं कहते कि वे भारत में प्रशिक्षित हैं. वे हमारे लोग हैं. और हमारी 70 फीसदी सेना उनके साथ सवेरे से रात तक लड़ रही है. उनको लगातार निशाना बनाया जा रहा है. पर सैन्य और असैन्य दोनों नेतृत्व को साथ काम करने की आवश्यकता है. समुचित समन्वय की आवश्यकता है.

क्या आप मानते हैं, जर्ब-ए-अज्ब विफल रहा? जब इन संगठनों से निपटने की बात आती है, तो क्या सैन्य-असैन्य नेतृत्व एक हैं?

जर्ब-ए-अज्ब विफल नहीं रहा. काफी सफल रहा. इसने फाटा का सफाया किया. पर वह इलाका पूरी तरह चौकबंद नहीं है इसलिए वे भागने में सफल रहे. अधिकांश आतंकी संगठनों के सरगना अभी अफगानिस्तान में हैं. हमने हाल ही में अफगानिस्तान में बैठे पाकिस्तानी आतंकियों पर भारी हमला किया था. जर्ब-ए-अज्ब काफी सफल रहा, पर अकेली सेना कुछ नहीं कर सकती. सैन्य कार्रवाई सफल रही, पर यह काफी नहीं है. नेशनल एक्शन प्लान देखें, करीब 80 फीसदी काम असैन्य सरकार को करने हैं.

और पंजाब के संगठन?

ऐसे कोई संगठन नहीं हैं, जो लोगों को मार रहे हों. पंजाब में मदरसे ज्यादा हैं.

पर वहां संगठन सक्रिय हैं, जो भारत पर हमले के लिए जिम्मेदार हैं?

हां, बहावलपुर में जैश-ए-मोहम्मद है. पर दक्षिण पंजाब की मुझे चिंता होती है कि किसी दिन यह नष्ट हो सकता है. मदरसे काफी संकुचित नजरिया बना रहे हैं. हो सकता है, वे आतंकी नहीं हों, पर चरमवाद और आतंकवाद के बीच बहुत कम फासला है.

पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री ने हाल ही में कहा कि संप्रदायवाद और आतंकवाद के बीच भेद करने की जरूरत है.

नहीं, मैं इससे सहमत नहीं हूं. जो भी मासूमों की हत्या कर रहे हैं, वे आतंकी है.

क्या नवाज शरीफ दक्षिण पंजाब में सैन्य कार्रवाई करेंगे? नए सेना प्रमुख जनरल बजवा ने कहा था कि पाकिस्तान का सुरक्षा प्रतिष्ठान दक्षिण पंजाब में संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई करेगा.

उम्मीद करता हूं कि वे ऐसा करें वरना उन्हें बाद में भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. वे कह सकते हैं कि हमारी सरकार को परेशान नहीं करें, पर यह अदूरदर्शितापूर्ण नीति होगी.

पर क्या इससे कश्मीर के हालात बदलेंगे, खासकर उन हमलों में जो सीमा पार के संगठन कर रहे हैं.

मेरा दृढ़ विश्वास है कि किसी भी देश को अपने यहां से दूसरे देश पर आक्रमण करने की बाहरी लोगों को अनुमति नहीं देनी चाहिए. ऐसा मुंबई हमले में हुआ है. नहीं होना चाहिए. पर सेना अकेली नहीं रोक सकती. आतंकियों से मुकाबले के लिए पुलिस को अपनी क्षमताएं मजबूत करने की जरूरत है. आपको मदरसों पर नजर रखनी होगी, भले ही वे शांति पसंद हैं या नहीं हैं, क्योंकि वे इस्लाम का संकुचित नजरिया सिखा रहे हैं. न्यायिक व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है. कोर्ट जीएचक्यू पर हमले के मुख्य आरोपी को छोड़ देती है. जांच करने की योग्यता में कमी है.

क्या पेरिस में हुई एफएटीएफ बैठक में आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान पर दबाव डाला गया?

पाकिस्तान काफी समय से दबाव में है. पर ध्यान उन संगठनों पर है, जिनसे आसन्न खतरा है.

आपका मतलब उन संगठनों से है, जो देश के भीतर सक्रिय हैं?

हां, हाल ही में देश के दक्षिण से लेकर उत्तर तक कई आक्रमण हुए. क्या आप सोचते हैं कि वे उन पर कार्रवाई करने की बजाय जैश जैसे संगठनों को निशाना बनाएंगे? नहीं, ऐसा नहीं होगा. हमारी वैसी क्षमताएं नहीं हैं.

क्या भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता तुरंत शुरू होगी?

मैं नहीं कह सकता कि वे जल्द शुरू करेंगे. भारत के चिंतकों और मीडिया को लगता है कि सारे आतंकी पाकिस्तान में छिपे हैं और जैसे ही पाकिस्तान प्रतिष्ठान उन्हें मारेगा, समस्या हल हो जाएगी. मुझे नहीं लगता, पाकिस्तान ऐसा कर सकता है. उसमें आंतरिक कलह नहीं है. हमले रोज हो रहे हैं. फिर भी कहूंगा कि भारत और पाकिस्तान को बात करनी चाहिए, भले ही दस बम विस्फोट हों. यदि आप उन विस्फोटों पर प्रतिक्रिया करते हैं, तब तो आप उन बुरे लोगों के हाथों में खेल रहे हैं.

पर ऐसा लगा, खासकर पीएम मोदी की पाकिस्तान यात्रा के बाद कि भारत को लेकर सैन्य-असैन्य नेतृत्व एकमत नहीं था?

सैन्य और असैन्य नेतृत्व इसे लेकर एकमत नहीं हैं कि क्या पैरामीटर होने चाहिए और कुछ इसी तरह की अन्य बातों को लेकर. पर आज वे एकमत हैं. आप केवल पाकिस्तान को देख रहे हैं, भारत को भी देखें. जब तक नरेंद्र मोदी और उनके समर्थक हैं, वे हर चीज पर राजनीति करेगे.

पर उन्होंने पाकिस्तान जाने की पहल की, नवाज शरीफ को अपने शपथ समारोह में आमंत्रित करने के लिए...
पर अभी उनकी ही सरकार बातचीत के लिए मना कर रही है. उम्मीद करता हूं कि यह रवैया बदले और दोनों की तरफ से बदले. दोनों सरकारें बात करना चाहती हैं. वीजा व्यवस्था में उदारता बरती जाए. एक दूसरे को खास स्टेटस नहीं दें, पर कम से कम उस आधार पर तो हो, जिस तरह से विश्व के अन्य देशों के लिए वीजा की व्यवस्था है. मीडिया हाइप के इन दिनों में सारी बातें पहले से खुल जाती हैं. गुप्त चैनल खोलने, बैक चैनल से बात करने की आवश्यकता है. फिलहाल एसा चैनल नहीं है. उसे फिर से शुरू करना चाहिए.

दूसरी तरफ के पड़ोस में अफगानिस्तान पर क्वेड प्रकिया विफल हो गई लगती है.

मैं अब अधिकारी नहीं हूं. पर मेरा केवल यही कहना है कि तालिबान उनमें क्यों शामिल हो? जब वे वहां थे, अमेरिकीयों से लड़ रहे थे, अब अमेरिकी भी गए. संवाद के लिए तालिबान आगे क्यों आएगा? वे तभी समझौता करेंगे, जब उन्हें कुछ फायदा होगा.

आपका मतलब सरकार का हिस्सा बनने से है?

हां, वे थोड़ा नहीं, अच्छा-खासा फायदा चाहेंगे.

पर तालिबान को सरकार में फिर से लेना खतरनाक प्रस्ताव है, जोखिम भरा?

हो सकता है जोखिम हो, पर इसके अलावा तालिबान समझौते के लिए आगे क्यों आएगा?

क्या पाकिस्तान उनके साथ बातचीत करने में विफल रहा?

मेरे खयाल से पाकिस्तान ने कोशिश की. पर लगता है जरूरत से ज्यादा वादे किए. तालिबान पर बात करने का दबाव डालने की सामर्थ्य पाकिस्तान में नहीं है. जब वे बामियान के बुद्ध की मूर्ति नष्ट कर रहे थे, हम उनके नजदीकी संपर्क में थे, उन्हें ऐसा नहीं करने का अनुरोध किया, यह कहते हुए कि वे समाज से निकाल दिए जाएंगे, पर उन्होंने हमारी नहीं सुनी. अब वे हमारी क्यों सुनेंगे? सच तो यह है कि वे अब भी पाकिस्तान पर संदेह करते हैं. कहते हैं, हमारी अमेरिका से नजदीकी है.

आप यह कहना चाहते हैं कि पाकिस्तानी एजेंसियों का तालिबान के किसी भी गुट पर नियंत्रण नहीं है?

मैं ऐसा नहीं सोचता. हो सकता है, वे किसी से बात कर रहे हों, पर नियंत्रण का प्रश्न नहीं उठता.

हक्कानी नेटवर्क की तरह?

सवाल ही नहीं. उन्होंने हक्कानी को छोड़ दिया था क्योंकि वे परेशान नहीं कर रहे थे. हम अपनी लड़ाई लड़ रहे थे. यदि हक्कानी हमारे साथ मिल जाते, तो गंभीर समस्या हो जाती. किसी समय अमेरिकी इसकी काफी आलोचना कर रहे थे कि हम हक्कानियों को निकाल नहीं रहे. मैंने उन्हें कहा, हमारी मजबूरियां हैं. सामर्थ्य की समस्या है. हम टीटीपी से लड़ाई करने में लगे हुए हैं.

पर आप जब जानते हैं कि हक्कानी कहां हैं, तो आप क्यों नहीं निकालते?

मैंने कहा, हम चिल्ला सकते हैं कि आपने हमारे क्षेत्र को हानि पहुंचाई. पर वास्तव में हम खुश होंगे कि वे अभी हमारे दुश्मन नहीं हैं, पर हमारे दुश्मन हैं. मैंने उनसे पूछा कि वे पाकिस्तान के अभ्यारण्यों से जाते हैं, अफगानिस्तान में हमले करते हैं और प्रसन्नता से लौटते हैं. आप यह क्या कर रहे हैं? आप विश्व में सबसे विकसित देश हैं, उन्हें पकड़ें, मार दें. हम अपनी आंखें मूंद लेते हैं. अफगानिस्तान की समस्या जस की तस है.

अमेरिकियों के पास बचाव का तर्क है कि इसके लिए पाकिस्तान के अभ्यारण्य जिम्मेदार हैं. वे सालों से अभ्यारण्यों पर बम विस्फोट कर रहे हैं. 400 से ज्यादा हमले हो चुके हैं. उसका क्या नतीजा हुआ? पाकिस्तान को भूल जाएं, उन्हें अफगानिस्तान में क्या मिला? आप पाकिस्तान में बैठे एक दर्जन, दो दर्जन या तीन दर्जन हक्कानियों पर आरोप नहीं लगा सकते.

अब जब चीन और रूस अफगानिस्तान के मुद्दे में दिलचस्पी ले रहे हैं, तो क्या हालात जल्द बदलेंगे?

नहीं, मैं ऐसा नहीं सोचता. समझ की बात है, पाकिस्तानी और अफगान तालिबानी एक हैं. उनके विचार एक हैं, उनके संबंध हैं, वे एक दूसरे को साथ देते हैं. दूसरी ओर काबुल और इस्लामाबाद की सरकार आपसे में बोलती भी नहीं. पाकिस्तानी कहते हैं कि भारतीय अफगान की पूंछ मरोड़ रहे हैं. मैं ऐसा नहीं कहूंगा. पाकिस्तान के बिना अफगान कैसे जिएगा? हम ही उनके लिए खुला मार्ग हैं.

हाल ही में कई आतंकी हमलों के बाद, हमने अफगानिस्तान से सटी सीमा बंद कर दी. इससे हल्ला मच गया. हम उन्हें सीमा सील करने के लिए कह रहे हैं, आदमियों को तैनात करें. पर वे कहते हैं, यह विवादास्पद डुरंड रेखा है. इसलिए उन्हें उसकी रक्षा करनी चाहिए. पर मैं जानता हूं, उनमें क्षमता नहीं है, यहां तक अमेरिका भी यह नहीं कर सकता.

First published: 10 March 2017, 8:00 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी