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बाजवा पर दबाव के बावजूद लश्कर और जैश पर कार्रवाई मुश्किल

सादिक़ नक़वी | Updated on: 19 February 2017, 8:43 IST
कैच न्यूज़


पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने हाल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भाई शाहबाज द्वारा शासित प्रांत पंजाब में आतंकवादियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन की घोषणा की है. पंजाब ही वह प्रांत है जहां से आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्म्द और लश्करे-ए-तैयबा अपनी गतिविधियां चलाते हैं.


भारत के सुरक्षा जानकार जनरल बावजा की इस घोषणा में ज्यादा कुछ भरोसा करने के प्रति आगाह करते हैं. जानकारों के अनुसार पाकिस्तान की सेना Let और JeM को छोड़कर कुछ सांप्रदायिक संगठनों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है. लेकिन इस कार्रवाई से भारत को क्या फायदा होगा यह देखना होगा, क्योंकि भारत में विशेषकर जम्मू—कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों के लिए मुख्य रूप से यही दो संगठन जिम्मेदार हैं.

सुरक्षा जानकारों की मानें तो वे लश्कर ए झांगवी और जमात उल अहरार, जो कि पाकिस्तानी तालिबान का ही एक हिस्सा है, जैसे संगठनों के खिलाफ तो कार्रवाई कर सकते हैं, पर Let और JeM के खिलाफ किसी कार्रवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती.


दरअसल भारत इस बात के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाता रहा है कि वह लश्करे ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद पर कार्रवाई करे, जिनको कि वह मुंबई, उड़ी और पठानकोट में आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार मानता है. लेकिन भारत विरोधी संगठनों को छोड़कर कुछ चुनिंदा संगठनों पर कार्रवाई करना भारत के लिए किसी काम की नहीं होगी.


बाजवा की घोषणा लाहौर में इस सप्ताह हुए बम विस्फोट के बाद आई है. इस बम विस्फोट में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों समेत 13 लोग मारे गए थे. इस बम विस्फोट की जिम्मेदारी जमात उल अहरार संगठन ने ली थी और इसके तुरंत बाद पाकिस्तान के आतंक विरोधी बलों ने मुल्तान में इस संगठन के छह आतंकवादियों को मारने का दावा किया था.

 

ढुलमुल रवैया


लाहौर के बम विस्फोट ने पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के उस दावे की पोल-पट्टी खोलकर रख दी है कि जनरल राहील शरीफ के बहु प्रचारित नेशनल एक्शन प्लान से घरेलू आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाने में काफी सफलता हासिल हुई है. यह हमला उस समय हुआ है जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पिछले साल क्वेटा में आतंकवादी हमले पर गठित जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय की आतंकवादी समूहों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई और उसके इरादों पर सवाल उठाया था.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कैसे नेशनल सिक्युरिटी इंटरनल पॉलिसी को अब तक क्रियान्वित नहीं किया गया है, और लगता है कि मंत्रालय के अधिकारी पाकिस्तान के लोगों की बजाय मंत्री की सेवा करने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं. रिपोर्ट के अनुसार फिर से अतिवादी समूहों के भाषणों, साहित्य और प्रोपैगेंडा पर काबू करने में भारी असफलता हासिल हुई है. एक आतंकवाद विरोधी आख्यान को निर्मित करने और उसको लोगों तक ले जाने में पूर्ण असफलता हाथ लगी है.

 

पंजाब में कोई सैनिक कार्रवाई करना आसान नहीं है, सिर्फ इसलिए नहीं कि इस प्रांत में हो आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं उन्हें सत्ताधारी वर्ग का संरक्षण मिला हुआ है, बल्कि इसलिए भी कि लश्करे ए झांगवी जैसे सांप्रदायिक संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने से भी सेना और नागरिकों के बीच पहले ही नाजुक रिश्ते में मुश्किल पैदा हो सकती है.

 

 

पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा मंत्री निसार चौधरी ने हाल में कहा है कि आतंकवादी और अतिवादी संगठनों के बीच अंतर करना जरूरी है, जो कि पाकिस्तान की उस नीति का ही एक रूप लगता है जिसमें बुरे और अच्छे आतंकवादी के बीच अंतर किया जाता रहा है.

 

बाजवा पर दबाव


फिर भी जनरल बाजवा की घोषणा से कुछ तो उम्मीद की ही जा सकती है, क्योंकि लाहौर हमले के बाद बाजवा पर अब अपनी छवि को बनाये रखने का दबाव है, विशेषकर तब जबकि बाजवा के पूर्ववर्ती सेनाध्यक्ष ने तहरीक ए तालीबान के खिलाफ कार्रवाई की थी. यह दूसरी बात है यह आपरेशन आतंकवादी हमलों को रोकने में असफल ही साबित हुआ है.

जनरल राहील शरीफ की तुलना में जनरल बाजवा के पास फिर भी एक स्पेस है कि वे पंजाब में कोई बड़ा अभियान चला सकें विशेषकर तब जबकि सत्ताधारी परिवार पनामा पेपर लीक के मुद्दे पर इन दिनों घिरा हुआ महसूस कर रहा है. लेकिन बाजवा ने पहले ही कह दिया है कि यह ऑपरेशन प्रांत की सरकार को विश्श्वास में लेने के बाद ही किया जाएगा इसलिए यह देखना होगा कि यह ऑपरेशन कितना सफल होता है.

 

First published: 19 February 2017, 8:43 IST
 
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