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शाहबाज़ कलंदर धमाका: पाकिस्तानी सेना क्या इस हमले के बाद कोई सबक सीखेगी?

विवेक काटजू | Updated on: 19 February 2017, 11:57 IST
कैच न्यूज़

पाकिस्तान की सबसे बड़ी इबादतगाह मानी जाने वाली शाहबाज कलंदर दरगाह में 16 फरवरी को हुआ आतंकी हमला पिछले दो सालों में देश में हुआ सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जा रहा है. हमले में 100 के आस-पास लोगों की जानें चली गईं और करीब 200 लोग घायल हो गए. गौरतलब है कि लाहौर की दातागंज बख्श और बलूचिस्तान के खुजदार में शाह नूरानी दरगाह पर भी ऐसे ही हमले किए गए थे.

शाहबाज कलंदर दरगाह पर हुए इस हमले ने पाकिस्तान की आवाम को नस्ली हिंसा के कुचक्र में धकेल दिया है. जिस तरह से पाकिस्तान अपने जर्रे-जर्रे को समेट रहा है, उससे लगता है कि फ्रांस के बरबन राजाओं की तरह ही पाकिस्तान के शासक भी ‘कुछ नहीं सीखते और न ही कुछ भूलते हैं.’ पिछले भयवाह हमलों की ही तरह इस बार भी ‘फुर्ती’ दिखाते हुए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना प्रमुख कमर बाजवा हमले के पीड़ितों से मिलने के लिए सेहवान पहुंचे.

उन्होंने वहां घायलों से मुलाकात कर सुरक्षा इंतजामों का जायजा लिया. उन्होंने आतंकियों का खात्मा करने के आदेश दिए और जनता का आह्वान किया कि वे एकजुट रहें. पाक सेनाध्यक्ष ने भी आश्वासन दिया कि सेना किसी भी दुश्मन ताकत को हावी नहीं होने देगी. उन्होंने ट्विटर पर भी कहा, ‘देश के खून की एक-एक बूंद का बदला लिया जाएगा और जल्द ही होगा
क्योंकि अब किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा.’ पाक सेना पिछले 36 घंटों में सौ से ज्यादा आतंकियों को मार गिराने का दावा कर रही है.

शाहबाज कलंदर दरगाह पर किया गया हमला पांच दिनों में पाकिस्तान भर में होने वाले दस हमलों में से एक था. इससे पहले लाहौर की प्रसिद्ध मॉल रोड पर पंजाब प्रांतीय विधानसभा के सामने 13 फरवरी को हुआ हमला भी इसी कड़ी में किया गया था, जिसमें 14 लोगों की मौत हुई और 87 घायल हो गए. लाहौर शरीफ परिवार का गढ़ माना जाता है. नवाज शरीफ के छोटे भाई शाहबाज शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री हैं. लाहौर कई मायने में पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण है. इसलिए अगर लाहौर में कोई हमला होता है तो सरकार बेचैन हो जाती है. 

अल अहरार ने ली ज़िम्मेदारी

तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान (टीटीपी) के ही एक धड़े जमात-उल-अहरार (जेयूए) ने शाहबाज कलंदर दरगाह पर हमले की जिम्मदारी ली है. जेयूए खुद को इस्लामिक स्टेट का वफादार बताता है. पाकिस्तान का आरोप है कि यह गुट अफगानिस्तान के बाहर काम करता है. पाकिस्तान ने जेयूए की गतिविधियों को लेकर अफगानिस्तान को अपनी चिंताओं से अवगत करवा दिया है और उससे कहा है कि वह जल्द से जल्द आतंकियों का खात्मा करे.

इसलिए जनरल बाजवा ने बिना नाम लिए जिस ‘‘दुश्मन ताकत’’ की बात की है, वह जाहिर तौर पर अफगानिस्तान ही है. हमले के बाद पाकिस्तान ने अपनी सीमाएं बंद कर दी हैं. इससे पाक ने अफगगानिस्तान के लोगों की सीमा पार आवाजाही और व्यापार गतिविधियों पर लगाम लगा दी है, जिससे अफगानिस्तान दबाव में है.

पाक सेना ने अफगान दूतावास के अधिकारियों को 76 लोगों की एक सूची सौंपी है और उन्हें इस्लामाबाद को सौंपने की मांग की. आम तौर पर सेना किसी विदेशी दूतावास के अधिकारियों को सीधे समन नहीं करती लेकिन पाकिस्तानी सेना कोई आम सेना तो है नहीं. जनरल बाजवा इस मौके पर यह भी दिखाना चाहते हैं कि वह पाकिस्तान के हितों के लिए सीधे कार्रवाई कर सकते हैं.

नवाज शरीफ के विदेश नीति सलाहकार सरताज अजीज ने अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हनीफ अटमार से बात कर उनसे जेयूए के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की. जेयूए ही पिछले कुछ दिनों से आतंकी हमलों को अंजाम दे रहा है. उन्होंने अफगानिस्तान द्वारा जेयूए के खिलाफ कार्रवाई न करने पर रोष जताया.

अभी भी सबक नहीं

पाकिस्तान की गतिविधियों से साफ जाहिर है कि वह देश में आतंक की समस्या को नजरंदाज कर दूसरे देशों पर ही दोष मंढ़ता रहता है. पाक 2014 में पश्चिमी वजीरिस्तान में टीटीपी के खिलाफ शुरू किए गए ऑपरेशन जर्ब-ए-अर्ज में सफलता के दावे करता है. वह यह भी कहता है कि आतंक से लड़ने के लिए वह व्यापक राष्ट्रीय कार्य योजना लागू कर रहा है. इसलिए पिछले दिनों हुई आतंकी घटनाएं शर्मसार करने वाली हैं.

दरअसल पाकिस्तान इस मामले में गंभीर है ही नहीं, इसीलिए आज हालात बिगड़े हैं. मुसलमान ही दूसरे मुसलमान को गलत क्यों बता रहे हैं, क्यों उन्हें ‘वाजिबुल कत्ल’(मौत के लायक) बता रहे हैं. पाक सरकारें कहती आई हैं कि पाकिस्तान को वे एक सभ्य इस्लामिक देश बनाना चाहती हैं, लेकिन पाक इस पर अमल नहीं कर रहा.

कट्टर इस्लाम को जगह दी

पाकिस्तान क्यों आतंक का केंद्र बन गया है? 1970 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब को अपना बड़ा भाई फरमाबरदार मान लिया. इससे अरब देशों का कट्टर इस्लामिक मजहब पैर पसारने लगा. जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1974 में अहमदियों को ‘गैर-मुस्लिम’ घोषित कर दिया. राष्ट्रपति जिया उल हक के समय कट्टरपंथी और जिहादी ताकतें और मजबूत हो गईं. हक ने अफगानिस्तान में सोवियत रूस के खिलाफ अमेरिका के अभियान के लिए पाकिस्तान को युद्ध भूमि बना दिया था. उन्होंने पाकिस्तान को कट्टर इस्लामी देश बनने की ओर धकेल दिया.

इससे यहां मुसलमान शिया और सुन्नी में बंट गए और बाहरी ताकतों की शह पर एक दूसरे से लड़ने लगे. और आखिरकार कश्मीर और अफगानिस्तान में आतंक फैलाने के लिए अपनी ही धरती पर आतंक पनपाने के पाकिस्तान के फैसले ने आतंक को पाक की नसों में बसा दिया है. इसके साथ ही पाक का पतन शुरू हो गया जो आज तक जारी है.

इनपर कार्रवाई क्यों नहीं

सुरक्षा जानकारों की मानें तो वे लश्कर-ए-झांगवी और जमात-उल-अहरार, जो कि पाकिस्तानी तालिबान का ही एक हिस्सा हैं, जैसे संगठनों के खिलाफ तो कार्रवाई कर सकते हैं, पर लश्करे तैयबा और जैशे मुहम्मद के खिलाफ किसी कार्रवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती. दरअसल भारत इस बात के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाता रहा है कि वह लश्करे ए तैयबा और जैश ए मोहम्मद पर कार्रवाई करे, जिनको कि वह मुंबई, उड़ी और पठानकोट में आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार मानता है. लेकिन भारत विरोधी संगठनों को छोड़कर कुछ चुनिंदा संगठनों पर कार्रवाई करना भारत के लिए किसी काम की नहीं होगी.

बाजवा की घोषणा लाहौर में इस सप्ताह हुए बम विस्फोट के बाद आई है. इस बम विस्फोट में कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों समेत 13 लोग मारे गए थे. इस बम विस्फोट की जिम्मेदारी जमात उल अहरार संगठन ने ली थी और इसके तुरंत बाद पाकिस्तान के आतंक विरोधी बलों ने मुल्तान में इस संगठन के छह आतंकवादियों को मारने का दावा किया था.

लाहौर और शहबाज़ कलंदर के बम विस्फोट ने पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के उस दावे की पोल-पट्टी खोलकर रख दी है कि जनरल राहील शरीफ के बहु प्रचारित नेशनल एक्शन प्लान से घरेलू आतंकवादी संगठनों पर लगाम लगाने में काफी सफलता हासिल हुई है. यह हमला उस समय हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पिछले साल क्वेटा में आतंकवादी हमले पर गठित जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय की आतंकवादी समूहों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई और उसके इरादों पर सवाल उठाया था.

ढुलमुल रवैया

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कैसे नेशनल सिक्युरिटी इंटरनल पॉलिसी को अब तक क्रियान्वित नहीं किया गया है, और लगता है कि मंत्रालय के अधिकारी पाकिस्तान के लोगों की बजाय मंत्री की सेवा करने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं. रिपोर्ट के अनुसार फिर से अतिवादी समूहों के भाषणों, साहित्य और प्रोपैगेंडा पर काबू करने में भारी असफलता हासिल हुई है. एक आतंकवाद विरोधी आख्यान को निर्मित करने और उसको लोगों तक ले जाने में पूर्ण असफलता हाथ लगी है.

पंजाब में कोई सैनिक कार्रवाई करना आसान नहीं है, सिर्फ इसलिए नहीं कि इस प्रांत में हो आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं उन्हें सत्ताधारी वर्ग का संरक्षण मिला हुआ है, बल्कि इसलिए भी कि लश्करे ए झांगवी जैसे सांप्रदायिक संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने से भी सेना और नागरिकों के बीच पहले ही नाजुक रिश्ते में मुश्किल पैदा हो सकती है.

पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा मंत्री निसार चौधरी ने हाल में कहा है कि आतंकवादी और अतिवादी संगठनों के बीच अंतर करना जरूरी है, जो कि पाकिस्तान की उस नीति का ही एक रूप लगता है जिसमें बुरे और अच्छे आतंकवादी के बीच अंतर किया जाता रहा है.

बाजवा पर दबाव

फिर भी जनरल बाजवा की घोषणा से कुछ तो उम्मीद की ही जा सकती है, क्योंकि लाहौर हमले के बाद बाजवा पर अब अपनी छवि को बनाये रखने का दबाव है, विशेषकर तब जबकि बाजवा के पूर्ववर्ती सेनाध्यक्ष ने तहरीक ए तालिबान के खिलाफ कार्रवाई की थी. दूसरी बात है यह ऑपरेशन आतंकवादी हमलों को रोकने में असफल ही साबित हुआ है.

जनरल राहील शरीफ की तुलना में जनरल बाजवा के पास फिर भी एक स्पेस है कि वे पंजाब में कोई बड़ा अभियान चला सकें विशेषकर तब जब सत्ताधारी परिवार पनामा पेपर लीक के मुद्दे पर इन दिनों घिरा हुआ महसूस कर रहा है. लेकिन बाजवा ने पहले ही कह दिया है कि यह ऑपरेशन प्रांत की सरकार को विश्वास में लेने के बाद ही किया जाएगा इसलिए यह देखना होगा कि यह ऑपरेशन कितना सफल होता है.

First published: 19 February 2017, 11:57 IST
 
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