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पेरिस हमलाः पश्चिम की दोहरी नीति का नतीजा है अरब जगत की अराजकता

प्रेम शंकर झा | Updated on: 19 November 2015, 13:18 IST
QUICK PILL
  • फ्रांस ने सीरिया की असद सरकार को बदनाम करने और गृह युद्ध को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभायी थी. आज पैदा हुई समस्या को अतीत में पश्चिमी देशों द्वारा की गई गलतियों के आइने से भी देखना होगा.
  • हीला-हवाली की रणनीति के तहत पश्चिमी देश आईएसआईएस को \'\'थोड़ी खींच, थोड़ी ढील\" देेने की रणनीति अपना रहे थे. जो बुरी तरह विफल हुई. आईएसआईएस को काबू में करने की नहीं बल्कि पूरी तरह ख़त्म करने की जरूरत है.

फ्रांस में हुए हमले के बाद वहां के निवासियों ने जिस तरह अपना आक्रोश व्यक्त किया है उससे साफ पता चलता है कि फ्रांस सरकार ने शार्ली एब्दो पर हुए हमले के बाद भी सुरक्षा बंदोबस्त के लिए जरूरी इंतजाम नहीं किए थे. जो बुनियादी सुरक्षा जांच भारत में भी जरूरी बनाये जा चुके हैं, फ्रांस में उनका भी अभाव है.

रूस टुडे चैनल से बात करते हुए एक फ्रांसीसी महिला ने बताया कि वहां के रेस्तरां, होटल और सिनेमा हालों में एक्स-रे स्क्रीनिंग मशीन तक नहीं है. इससे भी ख़तरनाक बात ये है कि ट्रेन और हवाईजहाज में चढ़ने वाले यात्रियों और उनके सामान की स्क्रीनिंग नहीं की जाती.

इस हमले के बाद ये सब कुछ बदल जाएगा लेकिन इतना तो साफ़ है कि फ्रांस सरकार अपनी सुरक्षा को लेकर ख़तरनाक हद तक लापरवाह थी. वो भी तब जब लीबिया के शासक मुआमार गद्दाफ़ी के ख़िलाफ़ फ़रवरी, 2011 में एकतरफ़ा हमला करने की नैतिक ज़मीन तैयार करने में फ्रांस की अग्रणी भूमिका रही थी.

फ्रांस ब्रिटेन के साथ मिलकर सीरिया की बशर अल असद सरकार को खलनायक बताने में भी आगे रहा. फिर उन्होंने सीरिया में गृह युद्ध को बढावा देना शुरू कर दिया. जिसका नतीजा ये हुआ कि एक पूरा देश बर्बाद हो गया और उसकी आधी आबादी शरणार्थी बनने को मजबूर हो गयी.

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोला सर्कोजी ने क्या सोचकर लीबिया पर हमला शुरू किया था?

राष्ट्रपति ओलांद ने क्या सोचकर सीरिया की असद सरकार को सत्ता से बेदखल करवाने को अपनी विदेश नीति का सबसे बड़ा एजेंडा बना लिया था?

क्या सोचकर उन्होंने सीरिया में 'फ्री सीरियन आर्मी' को ज़मीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल और एंटी-टैंक मिसाइलें देने की पैरवी में अपनी आवाज़ मिलायी थी? बाद में यही 'फ्री सीरियन आर्मी' अल-क़ायदा के सीरियाई सहयोगी 'जबात अल नुस्रा' से मिल गयी.

और आखिरकार न केवल अमेरिका बल्कि पूरे यूरोप ने इस्लामिक स्टेट(आईएसआईएस) के उभार की तरफ़ आंखें क्यूं बंद रखीं?

क्या इन देशों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि अगर एक पूरा देश बर्बाद होगा तो बहुत संभव है कि उसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आएं?

क्या उन्हें ये बात नहीं समझ आ रही थी कि जिन देशों की अर्थव्यवस्था को चौपट कर रहे है वहां हज़ारों नौजवान बेरोज़गार हो जाएंगे और उन्हें भुखमरी का सामना करना पड़ेगा?

क्या उन्हें इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं था कि ये नौजवान सऊदी अरब और क़तर से मिलने वाले पैसों के लालच में सीरिया के काफ़िर शिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे कथित जिहाद में शामिल हो जाएंगे?

आईएसआईएस पश्चिमी सभ्यता की बुनियाद पर हमला कर रहा है, राष्ट्रपति ओलांद को ये समझाने के लिए क्या 132 लोगों की जानें जानी जरूरी थीं?

पिछले 17 महीनों में 10 हज़ार इराक़ी-कुर्द और अनगिनत सीरियाई आईएसआईएस के हाथों मारे जा चुके हैं. क़रीब सात हज़ार महिलाओं और बच्चों का बलात्कार हुआ है. उन्हें यौन दास बनाकर रखा गया. क्या ये सब आईआईएस के मूल चरित्र को समझने के लिए काफ़ी नहीं था?

क्या ब्रितानी और अमरीकी बंधकों के गले काटने के वीडियो, सीरिया के कबायलियों और बंधक सैनिकों की सामूहिक हत्या के वीडियो आईएसआईएस की वहशी सोच का पर्याप्त सबूत नहीं थे? या फिर ये मान लिया जाए कि फ्रांस को 'दूसरों' की जान की उतनी चिंता नहीं जितनी 'अपनों' के जान की हैै?

सच तो ये है कि पेरिस में 132 लोगों की जान नहीं जानी चाहिए थी. न ही आईएसआईएस के हाथों मारे गए हज़ारों लोगों की जान जानी चाहिए थी. न ही सीरिया के एक लाख 70 हज़ार आम नागरिकों और 60 हज़ार सैनिकों की जान जानी चाहिए थी. न ही लीबिया के क़रीब 50 हज़ार लोगों की जान जानी चाहिए थी. इसके अलावा इन इलाक़ों में भूख, बीमारी, कुपोषण और जीवनरक्षक दवाओं के अभाव से जिन लोगों की जानें गईं वो भी नहीं जानी चाहिए थीं.

लेकिन लोगों की जानें गयीं और उनके देश बर्बाद हो गये. उनका भविष्य ख़त्म हो गया क्योंकि पश्चिमी देशों को लगता है कि ईश्वर ने उन्हें इन लोगों को 'क्रूर तानाशाहों' से आज़ाद कराकर लोकतंत्र का उपहार देने की दैवीय जिम्मेदारी दे रखी है.

पश्चिमी देशों को लगता है कि ईश्वर ने उन्हें इन लोगों को 'क्रूर तानाशाहों' से आज़ाद कराकर लोकतंत्र का उपहार देने की दैवीय जिम्मेदारी दे रखी है.

हो सकता है कि आपको ये पश्चिम-विरोधी विचार लगे लेकिन मेरा ऐसा मक़सद नहीं है. पिछले पांच सालों में दुनिया में बर्बरता इस स्तर तक पहुंच गयी है जितनी आखिरी बार शायद तब देखी गयी थी जब चंगेज ख़ान ने यूरोप पर आक्रमण किया था.

हमें ये समझना होगा कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ. हम इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करनी होगी. ताकि हम इससे अपना बचाव कर सकें. लेकिन ये एक ऐसा बड़ा सवाल है जिसपर पेरिस हमले पर दिनरात कार्यक्रम चला रहे टीवी वाले भी बात नहीं करना चाहते.

सीरिया का गृह युद्ध


हर बार की तरह ये कहानी इस तरह शुरू होती है. बशर अल-असद गद्दाफ़ी ही की तरह अपने ही लोगों को मार रहे थे. ऐसे गृह युद्ध में पश्चिमी देशों के पास 'मारे जा रहे' लोगों का पक्ष लेने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता. चूंकि असद ने सत्ता छोड़ने से इनकार कर दिया इसलिए युद्ध बढ़ गया. असद की क्रूरताओं के कारण पूरी इस्लामिक दुनिया में ग़ुस्से की लहर फैल गयी. जिसके कारण हज़ारों जिहारी लड़ाके सीरिया पहुंच गये. अमेरिका को ये समझ में नहीं आ रहा था कि वो किस सीमा तक विद्रोहियों का साथ दे, जिसका नतीजा ये हुआ कि जिहादियों की कट्टरता बढ़ती गयी. इस सबका आखिरी फल है, आईएसआईएस.

इस कहानी से उन सभी तथ्यों को बाहर रखा गया है जिससे पश्चिमी देशों के 'हमने सही किया' के तर्क को झटका लग सकता है. इससे ये नहीं पता चलता कि अरब क्रांति की आग महज दो हफ़्ते में ट्यूनिशिया, फिर मिस्र, जॉर्डन और यमन तक पहुंच गयी लेकिन उसे सीरिया पहुंचने में दो महीने लगे. और सीरिया में विरोध प्रदर्शन दूसरे देशों की तरह उसकी राजधानी दमिश्क में शुरू होने के बजाय सीमा से लगे जॉर्डन के उस इलाके में शुरू हुए जहां मुस्लिम ब्रदरहुड का गहरा प्रभाव है.

इससे ये नहीं पता चलता कि अरब लीग ने गृह युद्ध शुरू होने के कारणों पर अपनी ही रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि विद्रोहियों को सीमापार के हथियारबंद दस्तों से मदद मिली थी.

16 दलों के सीरिया मूवमेंट फॉर डेमोक्रेसी ने विरोध प्रदर्शनों में हथियारों के प्रयोग का विरोध किया था. वो चाहते थे कि मामला बातचीत से सुलझाया जाए

ये बात भी नज़रअंदाज कर दी गयी कि 16 दलों के सीरिया मूवमेंट फॉर डेमोक्रेसी ने विरोध प्रदर्शनों में हथियारों के प्रयोग का विरोध किया था. वो चाहते थे कि मामला बातचीत से सुलझाया जाए और शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता का हस्तांतरण हो सके. ये भी भुला दिया गया कि असद ने खुद विरोध प्रदर्शन शुरू होने के कुछ ही हफ़्तों के अंदर लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी. जुलाई, 2011 में दमिश्क में हुए सम्मेलन में नए संविधान का ब्लूप्रिंट पेश किया गया था. फ़रवरी, 2012 और मई, 2012 में नए संविधान के अनुसार जनमत संग्रह और चुनाव हुए थे. ये बातें भी नजरअंदाज कर दी गईं.

सीरिया में चल रही संघर्ष को जानबूझकर बार-बार शिया और सुन्नी के बीच के सामुदायिक संघर्ष के रूप में पेश किया गया. असलियत में ये संघर्ष तुर्की, सऊदी अरब, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात समर्थित सलफ़ी इस्लाम और अरब जगत के एकमात्र लोकतांत्रिक सरकार के बीच था. सीरिया के गृह युद्ध में इसराइल ने जिस तरह आग में घी डाला उसकी अनदेखी कर दी गयी. इसराइल को लगा था कि इससे पश्चिमी देश उसके नए दुश्मन ईरान पर हमला कर देंगे.

सच ये है कि अमेरिका और यूरोपीय यूनियन जिन मूल्यों की अपने देशों में पैरवी करते हैं, गर्व करते हैं उन्हीं मूल्यों की इन देशों में अनदेखी करते हैं.

सच ये है कि अमेरिका और यूरोपीय यूनियन जिन मूल्यों की अपने देशों में पैरवी करते हैं, गर्व करते हैं उन्हीं मूल्यों की इन देशों में अनदेखी करते हैं. आईएसआईएस को अब नियंत्रित करने की जरूरत नहीं है. उसे पूरी तरह ख़त्म करने की जरूरत है.

ये अजीब उलटबांसी है कि इस समय रूस एकमात्र देश है जो शांति बहाली और सभ्यता की रक्षा की दिशा में सही क़दम उठाता दिख रहा है. वही रूस जिसे एक समय दुनिया का सबसे प्रतिगामी मुल्क कहा जाता था. रूस द्वारा की जा रही लगातार बमबारी से असद के नियंत्रण वाले दक्षिण इलाक़ों से उत्तर के अलेप्पो तथा उत्तर-पूर्व के दैर-एज-ज़ोर और रक्का तक ज़मीनी रास्ता खुल रहा है. अब सीरियाई सेना पीछे से अचानक होने वालों हमलों के बेफिक्र होकर आगे बढ़ सकती है.

इस पूरे इलाक़े में ये एकमात्र सेना है जिसके पास आईएसआईएस को हराने के लिए जरूरी सैन्यबल, प्रशिक्षण और इच्छाशक्ति है. दूसरी तरफ़ पश्चिमी देशों के नेता अब भी मानने को तैयार नहीं हैं कि उन्होंने सीरिया पर हमला करके ग़लती की थी. पश्चिमी मीडिया भी एकमत से इस सच पर पर्दा डाले हुए है.

First published: 19 November 2015, 13:18 IST
 
प्रेम शंकर झा @catchnews

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार और वरिष्ठ स्तंभकार

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