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पेरिस हमलाः बदलना होगा आतंकवाद से लड़ने का तरीका

वाईल अव्वाद | Updated on: 17 November 2015, 16:32 IST
QUICK PILL
  • खाड़ी मुल्कों से हुए व्यापक हथियार सौदों के चलते पश्चिमी देश दुनिया भर में फैल रहे चरमपंथी इस्लाम के उभार की अनदेखी करते रहे.
  • इराक में अमेरिकियों पर हुए आत्मघाती हमलों में करीब आधे सऊदी नागरिक थे. लेकिन अमेरिका ने उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की.

जहां फ्रांस सरकार पेरिस में हमला करके 129 से ज़्यादा लोगों की मारने वाले आतंकियों की पहचान करने की कोशिश में जुटी हुई है, वहीं आतंकी हमलों के शिकार लोग अपने रिश्तेदारों की खोजबीन कर रहे हैं.

हमले में फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, ट्यूनीशिया, मिस्र, मोरोक्को और अमेरिका समेत 12 मुल्कों के लोगों की जानें गईं हैं. अंधाधुंध गोलियां चलाने वालों ने न तो इस बात की परवाह की कि वो किस देश के लोगों की जान ले रहे हैं और न ही उन्हें चेहरा ढंककर अपनी पहचान छिपाने की फिक्र थी. वो केवल मारने और मरने के लिए आए थे.

निस्संदेह, इस आतंकी वारदात को अंजाम देने वाले कट्टरपंथी भी अफगानिस्तान में चलने वाले अल-कायदा की पाठशाला से निकले थे. उन्होंने भी इब्न तैमिया और मोहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब की शिक्षाओं का अनुसरण किया.

विडंबना यह है कि इन्हें भी कभी उन्हीं देशों ने समर्थन दिया था जो स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मानव मूल्यों को बनाए रखने की बात करते हैं. ये वहशियाना हरकत है कि बदला लेने के नाम पर निर्दोषों को मौत के घाट उतार दिया गया.

हमें जॉर्ज डब्लू बुश की शैली नहीं अपनानी चाहिए और इसकी तुलना 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए हमले से नहीं करनी चाहिए. हमें बाहरी लक्षणों के बजाय इस समस्या के मूल कारणों का पता लगाने की जरूरत है.

अच्छा अल कायदा बनाम बुरा अल कायदा


अमेरिकी नेता हिलेरी क्लिंटन ने माना था कि अमेरिका-आईएसआई-सऊदी अरब गठबंधन ने सोवियत रूस को हराने के लिए "अच्छे अल कायदा" को तैयार किया था. उसके बाद कई अरब मुसलमानों ने इस आतंकी संगठन से जुड़कर सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई लड़ी.


जब सोवियत संघ अफगानिस्तान से हट गया तो अल कायदा ने अपने मालिकों के खिलाफ ही हथियार उठा लिया

जब 9/11 का हमला हुआ तब उन्हें "बुरा अल कायदा" नाम देते हुए एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया. इसके बाद बहुत सारे अरबवासी अपने-अपने मुल्कों में वापस भाग गए. उन्होंने यमन और कुछ पश्चिमी देशों में नया नेटवर्क बनाना शुरू किया.

जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया तो इनमें से कुछ लोग उसमें शामिल हो गये ताकि इराक जाकर अल-कायदा का निर्माण कर सकें.

ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरी के अनुयायी अबू मसाब अल जरकावी को इराक में अल-कायदा का प्रमुख बनाया गया. उसने हिंसा के शिकार इराकियों को अपने समूह में भर्ती करना शुरू कर दिया.

ये इस्लाम को ही मानने वाले थे लेकिन उसपर अमल करने का उनका तरीका बिल्कुल अलग था

ये संगठन जिहादी सालाफी-वहाबी विचारधारा से प्रेरित था. उन्होंने इस्लाम की वहाबी विचारधारा को बढ़ावा देने में दिलचस्पी रखने वाले नए संगठनों में भी घुसपैठ शुरू की. वहाबी उपदेशक यूरोप समेत दुनिया भर के मस्जिदों में फैलने लगे. उन्होंने अपनी मान्यताओं को "सच्चा इस्लाम" बताते हुए बाकि सबको काफिर घोषित कर दिया.

पश्चिमी देशों के हुक्मरानों को इन बातों की जानकारी थी लेकिन कतर और सऊदी अरब जैसे खाड़ी मुल्कों से किए गए हथियारों के लुभावने सौदों के चलते उन्होंने अपनी आंखें मूंदें रखीं.

इन कट्टरपंथी इमामों ने इन देशों को चरमपंथी नौजवानों की भर्ती के लिए बिल्कुल मुफीद पाया ताकि उन्हें सीरिया, इराक, लीबिया, अल्जीरिया और यमन में आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के लिए भेजा जा सके. इन लोगों ने नौजवानों को समझाया कि ओटोमन साम्राज्य के पतन के बाद "इस्लामी उम्मा" (मुसलमानों) की सत्ता वापस लाने के एकमात्र तरीका यही है.

इराक में कब्जा जमाने वाली अमेरिकी सेना ने वहां चरमपंथी लड़ाकों को बढ़ावा दिया

अमेरिकी फौजों को वहां बने रहने के लिए और अमेरिकी शैली के लोकतंत्र की स्थापना के लिए एक वजह की जरूरत थी. क्योंकि अमेरिका को वहां 'व्यापक विनाश वाले हथियार' तो नहीं मिले थे लेकिन 'व्यापक भ्रम रचने वाले हथियार' जरूर मिल गये.

सीआईए के मुताबिक इराक पर कब्जे के दौरान उनपर आत्मघाती हमला करने वालों में 45-50 फीसदी सऊदी अरब के नागरिक थे. फिर भी अमेरिकी सेनाओं ने सऊदी नागरिकों को निशाना नहीं बनाया. उनके निशाने पर इराकी ही रहे.

बस ये कह देना कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) समर्थक 'मुसलमान' नहीं हैं और हर आतंकी घटना के समय अपने मजहब के बचाव में उतर आना इस बुराई का इलाज नहीं है. अरब मुल्कों में अब भी चरमपंथी विचारधारा वाली किताबें पढ़ाई जा रही हैं. वो अपनी बातों को साबित करने के लिए कुरआन की गलत व्याख्या करते हैं.

इसलिए, बहुत देर हो जाए उससे पहले ही हमें इस संकट से निपटने के लिए हमें अपने रास्ते और यकीन को सही करने की जरूरत है.

आईएसआईएस एक हकीकत है और इसे मिटाने के लिए हमें एकजुट होकर इसका सामना करना पड़ेगा.आईएसआईएस का गठन हमारी पहचान और इंसानियत को खत्म करने के लिए किया गया है.

अब जागने का समय आ चुका है. किसी धर्म और उसके समर्थकों की छवि को खराब करने वालों को अगर हम हरा नहीं पाए तो बड़े शर्म की बात होगी.

नतीजा

इस आतंकी हमले और उसके बाद की गतिविधियों से फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद की गिरती लोकप्रियता शायद सुधरने लगे लेकिन इससे फ्रांस में लोगों की निजी स्वतंत्रता में कमी आ सकती है.

इसके बाद फ्रांस एक पुलिस स्टेट में बदल सकता है. हो सकता है इन हमलों से पैदा डर के कारण एक बड़ा तबका एकजुटता और बहादुरी दिखाने के लिए चुपचाप आतंकवाद के खिलाफ चलाए रहे कथित युद्ध का समर्थन करने लगे.

फ्रांसीसी सरकार द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई का 9/11 घटना के बाद बुश और उनके अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों से अलग न होना मुझे चिंता में डालता है. अमेरिका ने तब सीधे अल कायदा पर इसका दोष डालते हुए सऊदी सम्राटों और बिन लादेन के परिवार को घटना के अगले दिन न्यूयार्क से बाहर जाने दिया था.

हो सकता है इन हमलों से पैदा डर के कारण एक बड़ा तबका चुपचाप आतंकवाद के खिलाफ चलाए रहे कथित युद्ध का समर्थन करने लगे

इसमें कोई शक नहीं है कि आईएसआईएस ने यह हमला किया. लेकिन क्या चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई की शुरुआत तुर्की के किसी अस्पताल में इलाज करवा रहे अल बगदादी को पकड़ने से नहीं शुरू की जानी चाहिए?

क्या हमें सबसे पहले आतंकवाद की जड़ को समझते हुए चरमपंथियों के बुनियादी ढांचे को नहीं नष्ट करना चाहिए?

हमले का वक्त


इस समय पेरिस पर आतंकी हमला होना महज संयोग नहीं है.

जब रूस के काकेशस क्षेत्र के एक बड़े आतंकी समूह ने सीरिया में अल कायदा के साथ अपनी वफादारी की घोषणा की तो रूस को लगा कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगा है. तब रूस ने सीरिया में सक्रिय आतंकी संगठनों के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने का फैसला लिया.

रूसी वायु सेना ने तुरंभ अभियान शुरू करते हुए एक महीने के भीतर आईएसआईएस के 80 फीसदी गोला बारूद को नष्ट कर दिया. इन हमलों में 3000 आतंकवादी मारे गए. वहीं आईएसआईएस के मजबूत पकड़ वाले सीरिया के रक्का प्रांत से सैकड़ों चरमपंथी भाग खड़े हुए. कई आतंकवादी जिस तरह तुर्की के रास्ते सीरिया में घुसे थे उसी रास्ते से वापस जाने लगे.

इसके बाद दुनिया भर के आईएसआईएस समर्थकों ने रूस की यह कहकर आलोचना शुरू कर दी कि वो नागरिक ठिकानों और दूसरे संगठनों पर हमले कर रहा है. ये लोग नहीं चाहते कि रूस को सफलता मिले. इससे पश्चिमी देशों का दोहरापन ही बेनकाब होता है जिन्होंने चरमपंथियों का खात्मा करने के बजाय बस वहां के हुक्मरानों को बदलते रहे.

पेरिस हमला, आईएसआईएस द्वारा किए जा रहे हमलों की श्रृंखला की ही एक कड़ी है. इससे पहले सीरिया में 200 बच्चों के नरसंहार, रूसी नागरिक हवाई जहाज को सिनाई प्रायद्वीप में मार गिराना और बेरूत में आत्मघाती हमला किया गया था.

फ्रांसीसी पुलिस पहले से ही हाई अलर्ट पर थी फिर भी पेरिस में छह जगहों पर एक साथ हमला हुआ.

यह हमले जी-20 शिखर सम्मेलन और जिनेवा शांति वार्ता से ठीक पहले हुए. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और सीरिया संकट के राजनीतिक समाधान खोजना अब शिखर सम्मेलन के दो मुख्य मुद्दे हैं.

इसमें पहली समस्या जहां वैश्विक है तो दूसरी को सीरिया के लोगों पर ही छोड़ देना चाहिए.

आगे की चुनौतियां

इन हमलों के बाद यूरोप के सामने तीन चुनौतियां हैं. एक, नए यूरोपीय आईएसआईएस मुजाहिदिन से निपटना, दो, बहुतलावादी समाज के खिलाफ उठते फासीवादी गुटों से निपटना, तीसरा, सामाजिक और आर्थिक कल्याण प्रणाली को बेहतर बनाना ताकि इनका लाभ सभी नागरिकों तक पहुंच सके. यूरोपीय अर्थव्यवस्था को देखते हुए ये सभी काम काफी चुनौतीपूर्ण होंगे.

इन मुश्किल का मुकाबला अकेले करने के बजाय एकजुट होकर करना होगा. जिहादी उपदेशक अपने देशों में वापस लौट रहे हैं. वो यूरोपीय समाज में अव्यवस्था पैदा करने की कोशिश करेंगे.

अब हम एक चलते-फिरते और स्वयंभू आतंकवाद के दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जिसमें कोई अकेला व्यक्ति या कुछ लोगों का समूह मनमाने तरीके से किसी आतंकी घटना को अंजाम दे सकता है.

प्रभावी आपसी सहयोग और खुफिया जानकारियों की साझेदारी के बगैर इनसे निपटना मुश्किल होगा.

जेवियर पवन के अनुसार फ्रांसीसी राष्ट्रपति ओलांद ने उनको दिए इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि फ्रांस ने "मॉडरेट विद्रोहियों" को हथियार मुहैया कराया था, जो बाद में अल कायदा से जुड़े नुसरा फ्रंट में शामिल हो गए थे.

अमेरिकी जनरल ऑस्टिन के मुताबिक अमेरिका ने 32500 करोड़ रुपये खर्च किए और 500 लड़ाकुओं को प्रशिक्षित किया, जिनमें से 495 सीरिया में अल कायदा से जुड़ गए.

फ्रांस पर हमले की पहले से ही आशंका थी. रिपोर्टों के अनुसार बीते अक्तूबर में फ्रांसीसी सरकार को इसकी चेतावनी दी गई थी और तब से वह हाई अलर्ट पर थी. तो वास्तव में क्या हुआ?

क्या यह एक खुफिया चूक थी? वो अपराधी कहां थे जिनकी जानकारी अधिकारियों को पहले से ही थी?

न ही मैं कोई झूठा मुद्दा उठा रहा हूं, न ही मैं किसी षड्यंत्र के सिद्धांत में विश्वास रखता हूं लेकिन मुझे लगता है कि फ्रांस के लोगों समेत हम सब को इन सवालों का जवाब पाने का हक है.

जब आप सुरक्षा के नाम पर अपनी निजी आजादी का बलिदान दे देते हैं तो आखिरकार आप दोनों ही चीजें खो देते हैं.

First published: 17 November 2015, 16:32 IST
 
वाईल अव्वाद @catchnew

वरिष्ठ पत्रकार और पश्चिम एशिया विशेषज्ञ.

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