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भोपाल गैस त्रासदीः आरोपियों को सज़ा दिलाने के लिए ह्वाइट हाउस वेबसाइट पर याचिका

निहार गोखले | Updated on: 30 May 2016, 12:59 IST
QUICK PILL
1984 में यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित संयंत्र में हुए गैस रिसाव से 25 हजार लोग मारे गए थे और लाखों लोग प्रभावित हुए थे. 32 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड और उसकी मौजूदा मालिक डाउ केमिकल्स भारतीय अदालत में नहीं हाजिर हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय की वेबसाइट पर दोषी कंपनियों को अदालत में हाजिर होने के लिए ऑनलाइन मुहिम चलाई जा रही है.

अमेरिका के राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस की वेबसाइट पर यूनियन कार्बाइड पर मुकदमा चलाने की ऑनलाइन मुहिम चलाई जा रही है. 

यूनियन कार्बाइड कॉर्प के भोपाल स्थित संयंत्र में गैस रिसाव से हजारों लोगों की मौत हुई थी. घटना के 32 साल बाद भी हादसे के दोषियों पर मुकदमा नहीं चला है. 

याचिका पर दस्तखत करने के लिए यहां क्लिक करें

ऑनलाइन याचिका में अमेरिकी सरकार से यूनियन कार्बाइड के मालिक डॉउ केमिकल को नोटिस देने की मांग की जा रही है ताकि 13 जुलाई को भारतीय अदालत में सुनवाई के दौरान कंपनी हाजिर हो.

15 मई को शुरू की गई इस मुहिम को अब तक नौ हजार वोट मिल चुके हैं. 

ऑनलाइन अभियान

व्हाइट हाउस की वेबसाइट 'वी द पीपल' पेज पर अगर किसी याचिका पर 30 दिन में एक लाख लोग दस्तखत कर दें तो उसपर आगे कार्रवाई की जाती है.

इसके बाद दो महीने के अंदर व्हाइट हाउस याचिका पर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है.

इस याचिका पर 13 साल से अधिक उम्र का कोई भी अमेरिकी या गैर-अमेरिकी हस्ताक्षर कर सकता है.

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याचिका में कहा गया है, "हम अमेरिकी सरकार से अंतरराष्ट्रीय कानून और समझौते के तहत मांग करते हैं कि वो डाउ केमिकल्स को भोपाल में 13 जुलाई 2016 को अदालत में हाजिर होने के लिए नोटिस दे."

याचिका में ये भी कहा गया है कि जब अमेरिकी तट पर तेल कंपनी बीपी की पाइप लइन में रिसाव हुुआ था तो सरकार ने कंपनी पर चार अरब डॉलर का हर्जाना लगाया था.

इतिहास के सबसे बड़े हादसों में एक

दो-तीन दिसंबर 1984 को भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के संयंत्र से जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट लीक हो गई थी. 

भोपाल गैस त्रासदी के रूप में चर्चित इस हादसे में करीब 25 हजार लोग मारे गए थे. सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार हादसे से करीब पांच लाख लोग प्रभावित हुए थे. 

इसे दुनिया के सबसे भयावह औद्योगिक हादसों में माना जाता है. इसके बावजूद कंपनी पर इसके लिए कोई मुकदमा नहीं चल पाया.

यूनियन कार्बाइड पर कल्पेबल होमीसाइड (गैर इरादतन हत्या) का मामला दर्ज किया गया. लेकिन कंपनी भोपाल की अदालत में 20 दिसंबर 2015 को हुई सुनवाई में शामिल नहीं हुई. 

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सीबीआई ने विदेश मंत्रालय के सहयोग से अमेरिकी कंपनी को समन भेजा था. लेकिन ये तीसरा मौका था जब कंपनी भारतीय अदालत में नहीं हाजिर हुई.

अब इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को है और डाउ केमिकल्स को कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

इससे पहले अमेरिका यूनियन कार्बाइड के भोपाल संयंत्र के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को भारत प्रत्यर्पित करने से मना कर दिया था. एंडरसन का 2014 में निधन हो गया.

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2001 में डाउ केमिकल ने यूनियन कार्बाइड का अधिग्रहण कर लिया था. डाउ ने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को किसी तरह का हर्जाना देने से इनकार कर दिया था.

सीबीआई ने विदेश मंत्रालय के सहयोग से अमेरिकी कंपनी को समन भेजा था. लेकिन ये तीसरा मौका था जब कंपनी भारतीय अदालत में नहीं हाजिर हुई.

अब इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को है और डाउ केमिकल्स को कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

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इससे पहले अमेरिका यूनियन कार्बाइड के भोपाल संयंत्र के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन को भारत प्रत्यर्पित करने से मना कर दिया था. एंडरसन का 2014 में निधन हो गया.

2001 में डाउ केमिकल ने यूनियन कार्बाइड का अधिग्रहण कर लिया था. डाउ ने भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को किसी तरह का हर्जाना देने से इनकार कर दिया था.

याचिका को समर्थन

इस याचिका को हॉलीवुड स्टार मार्टिन शीन ने भी समर्थन दिया है. शीन ने भोपाल गैस त्रासदी पर बनी फिल्म 'भोपालः ए प्रेयर फॉर रेन' में एंडरसन की भूमिका निभाई थी.

शीन ने याचिका के समर्थन में एक वीडियो संदेश जारी किया है. इस संदेश में उन्होंने कहा है "अमेरिकी सरकार डाउ पर सही कदम उठाने का दबाव बना सकती है लेकिन अमेरिकी कानूनी मंत्रालय ढाई दशक से डाउ और यूनियन कार्बाइड को बचा रहा है. "

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शीन ने वीडियो में कहा है, "डाउ और डुपॉन्ट के बीच विलय की खबरें आ रही हैं यानी अगर हम नहीं बोले तो एक बार फिर इस मामले की जिम्मेदारी किसी और के सिर पर डाल दिया जाएगा."

ये ऑनलाइन मुहिम इंटरनेशनल कैंपेन फॉर जस्टिस इन भोपाल की उत्तरी अमेरिकी इकाई ने शुरू की है.

संस्था की कैंपेन प्रमुख एड्रिएने कॉर्विन ने कहा है, "अमेरिकी सरकार की मदद के बिना यूनियन कार्बाइड और डाउ भारतीय अदालत को तीन दशकों तक धता नहीं बता सकते थे."

कॉर्विन के अनुसार इन कंपनियों को बचाकर अमेरिकी सरकार अंतरराष्ट्रीय कानून और समझौतों का उल्लंघन कर रही है.

First published: 30 May 2016, 12:59 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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