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फोटोग्राफिक ट्रिक्स से नए सेना प्रमुख की छवि गढ़ने में जुटे नवाज़ शरीफ़

तिलक देवाशर | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
(गवर्नमेंट ऑफ़ पाकिस्तान)
QUICK PILL
  • पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख जनरल क़मर बाजवा के नए सेना प्रमुख बनते ही प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ उनकी ख़ास छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. 
  • प्रधानमंत्री आवास से मीडिया को जारी की गई तस्वीरों में क़़मर बाजवा उन्हें सैल्यूट करते हुए नज़र आ रहे हैं. 

'इफ़ अ पिक्चर पेंट्स अ थाउजंड वर्ड्स...' (अगर एक तस्वीर हज़ार शब्दों को बयान करता है...)

फिल्म और टीवी एक्टर टेली सवालास ने कल्पना भी नहीं की होगी कि उनके मशहूर गाने की यह लाइन सबसे ज़्यादा अविश्वसनीय जगह पाकिस्तान में जीवंत हो जाएगी. मगर ऐसा हुआ है. तीन तस्वीरें पाकिस्तान के नागरिक और सैन्य संबंधों में नए आयाम को बयान करती हैं.

गवर्नमेंट ऑफ पाकिस्तान

पहली फोटो सेना प्रमुख रहील शरीफ की विदाई में रखी गई दावत की है. यह दावत प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने दी थी. फोटो में दोनों पास-पास बैठे हैं, जैसे उनका दर्जा बराबरी का हो, सरकार या देश के दो प्रमुख के तौर पर. 

गवर्नमेंट ऑफ पाकिस्तान

दूसरी फोटो में जनरल कमर जावेद बाजवा प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से नए सेना प्रमुख बनाए जाने के बाद मिल रहे हैं. दोनों एक खाली मेज पर आमने-सामने बैठे हैं. इस तस्वीर से साफ़ लग रहा है कि नवाज बॉस हैं और नामित सेना प्रमुख उनसे मिलने आए हैं. इस फोटो की पहले वाली से तुलना करें तो नवाज़ शरीफ़ के सामने दोनों सैन्य प्रमुखों की अलग-अलग हैसियत साफ उभरकर आती है. 

गवर्नमेंट ऑफ पाकिस्तान

तीसरी फोटो में जनरल बाजवा नवाज़ शरीफ़ को उस वक्त सलामी दे रहे हैं, जब उन्होंने सेना प्रमुख बनने के बाद बाजवा को बुलाया था. यह फोटो दूसरी फोटो से कुछ लम्हा पहले की है. दिलचस्प यह है कि प्रधानमंत्री निवास से जारी आधिकारिक फोटो में नवाज़ नए सेना प्रमुख बाजवा से हाथ मिला रहे हैं.

जिस तरह अक्टूबर में वहां के अख़बार ‘डॉन’ ने कुछ गोपनीय बातों का खुलासा किया था, वह फोटो भी अधिकारिक तौर पर सामने नहीं आई थी, बल्कि मीडिया में लीक हो गई थी. ज़ाहिर है कि वह तस्वीर भी प्रधानमंत्री निवास से ही लीक हुई होगी क्योंकि फोटोग्राफर पीएम के पीछे खड़े साफ नजर आ रहे हैं. 

नवाज़ का कंट्रोल ?

अगर सेना प्रमुख सरकार के मुखिया को सलाम करता है, तो इसमें कोई अनोखी बात नहीं होनी चाहिए, मगर पाकिस्तान के संदर्भ में यह बात सामान्य नहीं है. नवाज़ ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने कई मौकों पर देखा है कि सेना के अधिकारी जानबूझकर कैप्स नहीं पहनते, ताकि उन्हें उसे सलाम नहीं करना पड़ा. उनके लिए सेना प्रमुख की सलामी बहुत बड़ी बात है, इसीलिए चालाकी से तीसरी फोटो रिलीज की गई है.

इन तीनों फोटो से उस छवि का साफ खुलासा होता है, जो सरकार बनाने की कोशिश कर रही है कि बाजवा के नए सेना प्रमुख बनने पर कौन काबू में रहेगा, और अब से किसका अधिकार रहेगा. यह स्थिति पूर्व सेना प्रमुख रहील के समय से बिल्कुल उलट होगी.

सेना पर असैन्य प्रभुता को ज़ोर देने के नवाज़ के निजी कारण हैं. वे उस बात को शायद ही भूले होंगे कि उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम इश्क खान के साथ सेना प्रमुख वहीद काकर ने हटा दिया था. और बाद में एक अन्य सेना प्रमुख परवेज मुशरर्फ ने उन्हें सैन्य तख्तापलट में पद से हटा दिया था.

रहील को गिराना

पूर्व सेना प्रमुख रहील को पाकिस्तान में ज़बरदस्त लोकप्रियता मिली थी. इसी लोकप्रियता के कारण असैन्य सरकार पर उनका प्रभुत्व बना रहा और नतीजतन असैन्य और सैन्य सरकार के बीच संबंध मधुर नहीं रह सके. दिलचस्प है कि सेना प्रमुख रहील ने अपना पद अधिकारिक रूप से सौंपा भी नहीं था कि उन्हें बदनाम करने की मुहिम शुरू हो गई. हो सकता है यह आने वाले दिनों में और तेज़ हो. इस मुहिम के पीछे उनकी प्रतिष्ठा कम करने का मकसद है, खासकर उनकी लोकप्रियता, जो नवाज़ से ज़्यादा थी.

27 नवंबर को ‘न्यूज़’ में उनके खिलाफ एक लेख में लिखा है- ‘नए सेना प्रमुख को सेना के संस्थागत फैसलों और योजना तंत्र को फिर से दुरुस्त करना है, जो जनरल रहील के खुद के अंतहीन प्रोजेक्शन और आत्मकेंद्रितता के कारण बहुत ज्यादा बिगड़ गया है.’‘उन्होंने अपने नाम को संवैधानिक रूप से विदेशी क्षेत्रों में बदनाम होने दिया.’ ‘उन्होंने जानबूझकर ऐसे किस्से गढ़े कि जनरल रहील को ‘महानतम जनरल’ माना जाने लगा, जबकि उन्होंने देश के लिए ऐसा कुछ नहीं किया.’

लेख में आर्थिक पहलू पर भी सवाल उठाए गए हैं. उत्तरी वज़ीरीस्तान ऑपरेशन दो महीने के लिए था और इस पर खर्च 25 बिलियन रुपए आना था. पर यह ढाई साल तक कैसे खिंच गया और इस पर 200 बिलियन रुपए का बिल कैसे आ गया?  रहील ने सेना की सफलता का बड़ा दावा करते हुए ऑपरेशन जर्ब-ए-अज़्ब को ‘उपलब्धियों की शानदार परेड’ बताया था. 

और बाजवा को उठाना

बाजवा की छवि रहील के ठीक उलट बनाई जा रही है कि वे राजनीतिक परिदृश्य में अपना प्रभुत्व बनाने की कोशिश नहीं करेंगे, या लगातार मीडिया में नहीं रहेंगे. कहा गया है कि वे अपने पूर्व जनरल से ज़्यादा संजीदा हैं और सरकार के साथ बेहतर संबंध बनाए रखना चाहते हैं. साफ़ शब्दों में कहें तो वे जनरल रहील की तरह मीडिया का ध्यान नहीं खींचना चाहेंगे. हालांकि जनरल बजवा के इर्द-गिर्द भी किस्से बनने लगे हैं. अटकलें तेज़ हैं कि क्या पीएम की मीडिया सेल कोई सिक्रेट प्रोग्राम करवाने वाली है? 

बाजवा की दो अहम बातें

1. जनरल बाजवा की प्रजातंत्र में पूरी निष्ठा है और वे असैन्य कर्मचारियों को उनका हक देने में यकीन करते हैं. इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि उन्होंने 2014 में पूर्व सेना कमांडर के तौर पर रावलपिंडी में इमरान खान और ताहिरुल कादरी के धरने को सहयोग किया था. 

2. उनके मन में भारत के लिए किसी तरह की नफ़रत नहीं है. उनका कहना है कि नॉन-स्टेट एक्टर्स देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.

फिर भी जो मुद्दे रहील के दौरान असैन्य सरकार के सामने थे, वे महज कमांड बदल जाने से दूर नहीं हो जाएंगे. नेशनल एक्शन प्लान को पूरी तरह से लागू करने में असैन्य सरकार की विफलता, पंजाब में ऑपरेशन की आवश्यकता, ‘डॉन’ में लीक हुई खबरें आदि वे मुद्दे हैं, जिनकी वजह से जनरल बाजवा की प्रधानमंत्री नवाज के साथ तनातनी हो सकती है. 

इस तरह जनरल बाजवा असैन्य सरकार के साथ सहजता से काम करना चाहेंगे, पर नहीं कर पाएंगे, अगर उन्हें जिस संस्था का वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, उसे बचाना है तो.

टकराव होना ही है

यह नहीं भूलें कि जनरल रहील की सेना प्रमुख के तौर पर नियुक्ति तीन साल पहले हुई थी. प्रोफेशनल फौजी के तौर पर उनका भी सम्मान था. उनका राजनीति में कोई झुकाव नहीं था. हालात ही ऐसे बने कि सरकार के साथ उनकी तनातनी हुई. कोई ज़रूरी नहीं कि जनरल बाजवा के समय ऐसे हालात नहीं बनें. 

नवाज़ इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि उन्होंने बाजवा को भले ही ‘अपना बंदा’ समझकर सेना की कमान सौंपी हो, पर पाकिस्तान का सेना प्रमुख किसी का सगा नहीं होता बल्कि खुद को तरजीह देता है. सेना प्रमुख के तौर पर उनके लिए उनकी संस्थागत जिम्मेदारियां प्राथमिक हो सकती हैं. वह असैन्य प्रभुता का तब तक साथ दे सकता है, जब तक कि सेना के साथ उसका मतभेद नहीं हो, जिसे वह सुरक्षा की लक्ष्मण रेखा मानते हों. भारत की सैन्य नीति सब जानते हैं और नवाज की अलग हुई, तो उसका विरोध होगा.   

आख़िर में, नवाज़ भूल रहे हैं कि पाकिस्तान में सेना के प्रभुत्व का मुख्य कारण असैन्य सरकार के शासन की विफलता रही है. सेना ने नेतृत्व किया है और जरूरत पड़ने पर संभाला भी है. जब तक नवाज़ यह करना सीख नहीं जाते, ‘अपने बंदे’ को लाने की नवाज़ की कोशिश या फोटोग्राफिक ट्रिक्स से कोई मदद नहीं मिलने वाली. 

First published: 3 December 2016, 8:23 IST
 
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