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इस्लामी नेता रहमान निज़ामी की फांसी पर भी कूटनीति

पिनाक रंजन चक्रवर्ती | Updated on: 14 May 2016, 19:02 IST
QUICK PILL
  • बांग्लादेश में 11 मई को ढाका सेंट्रल जेल में जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख \r\nमोतिउर रहमान निज़ामी को फांसी दी गई. उन्हें 1971 के मुक्ति संग्राम के \r\nदौरान किए युद्ध अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी.
  • निज़ामी की फांसी पर पाकिस्तान, कतर और तुर्की ने जताई नाराजगी तो भारत रहा तटस्थ. बांग्लादेश में इस्लामी चरमपंथ के बढ़ने का खतरा. भारत और अमेरिका करेंगे बांग्लादेश की खुफिया मदद.

बांग्लादेश में 11 मई को ढाका सेंट्रल जेल में जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख मोतिउर रहमान निज़ामी को फांसी दी गई. उन्हें 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान किए युद्ध अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी.

1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान किए युद्ध अपराधों के लिए मृत्युदंड पाने वाले वो पांचवें और अब तक के सबसे बड़े नेता थे.

निज़ामी को फांसी दिए जाने के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान में कूटनीतिक तनाव बढ़ गया है. क़तर और तुर्की जैसे देशों ने भी इसपर तीखी प्रतिक्रिया दी है. पाकिस्तान और तुर्की शीत युद्ध के समय से एक दूसरे के सहयोगी रहे हैं.

अपराध और दण्ड


बांग्लादेश में निज़ामी को पाकिस्तान समर्थक इस्लामी नेता माना जाता था. उन्हें 2010 में गिरफ्तार किया गया. 29 अक्टूबर 2014 को इंटरनेशनल क्राइम्स ट्राइब्यूनल(आईसीटी) ने निजामी को सामूहिक हत्या, बलात्कार और बुद्धिजीवियों की निशाना बनाकर हत्या करने का दोषी पाया था.

पढ़ेंः 1971 के युद्ध अपराधी रहमान निजामी को बांग्लादेश में फांसी

निज़ामी उस समय अल-बद्र नामक संगठन के प्रमुख थे जिसे पाकिस्तानी अधिकारियों ने अलग बांग्लादेश(तब पूर्वी पाकिस्तान) की मांग का समर्थन करने वालों को सबक सिखाने के लिए बनाया था. उस समय निज़ामी जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन इस्लामी छात्र संघ के भी प्रमुख थे.

निज़ामी बांग्लादेश में युद्ध अपराधों के लिए मृत्युदंड पाने वाले पांचवें और अब तक के सबसे बड़े नेता थे

बांग्लादेश के अलग राष्ट्र बनने के बाद सामूहिक हत्याओं और बलात्कार में शामिल रहे नेता पाकिस्तान चले गए. बांग्लादेश की आजादी के नायक माने जाने वाले शेख मुजीब की सेना के कुछ अधिकारियों द्वारा हत्या के बाद सत्ता की बागडोर जनरल ज़ियाउर रहमान के हाथ में आ गई. रहमान अपने इस्लामी झुकाव के लिए जाने जाते थे. उनकी बीवी खालिदा ज़िया बाद में देश की प्रधानमंत्री बनीं.

निज़ामी 1991 में अपनी घरेलू सीट पाबना से सांसद बने. 2001 में वो दोबारा सांसद बनकर आए. खालिदा ज़िया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी(बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी की गठबंधन सरकार में वो कृषि और उद्योग मंत्री रहे.

मंत्री रहने के दौरान उन्होंने भारतीय अलगावादी नेता परेश बरुआ को हथियार और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया. इसमें उनकी मदद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई भी करती थी. अदालत ने निज़ामी को हथियारों की तस्करी मामले में भी दोषी पाया था.

पढ़ेंः जमात-ए-इस्लामी के निजामी की फांसी पर पाकिस्तान को खेद

बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी की राजनीतिक मान्यता समाप्त कर दी थी क्योंकि पार्टी का चार्टर देश के संविधान के प्रतिकूल था.

जमात-ए-इस्लामी के नेताओं को फांसी दिए जाने पर संगठन व्यापक प्रदर्शन करता रहा है. फिर भी ढाका समेत पूरे देश में किसी बडी दुर्घटना का सामना नहीं करना पड़ा है.

शेख हसीना वाजेद की अवामी लीग 2008 में सत्ता में दोबारा आई. हसीना लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं. उसके बाद से ही जमात-ए-इस्लामी पर काफी दबाव है. उसे सार्वजनिक रैली करने की इजाजत नहीं मिलने में मुश्किल होने लगी. कई मझोले नेता अज्ञातवाश में चले गए.

अकाट्य सुबूतों और गवाहों की मौजूदगी के बावजूद जमात के नेता बांग्लादेश के मुक्तिसंग्राम में किसी तरह का अपराध करने के आरोपों से इनकार करते रहे हैं.

पनाह और मदद


बांग्लादेश में युद्ध अपराधों के लिए चलाए जा रहे मुकदमे का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिला. कई अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठनों और कुछ मानवाधिकार संगठनों ने आईसीटी की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया. इन लोगों इस कानूनी कार्रवाई को 'राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित' बताया.

जमात के कई नेता 1971 के बाद पाकिस्तान या ब्रिटेन में जाकर बस गए थे. ऐसे नेताओं ने शेख हसीना के खिलाफ पश्चिमी देशों में काफी गोलबंदी की और जमात के नेताओं को आर्थिक मदद भी मुहैया कराई.

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दक्षिण एशिया के युद्ध अपराधियों को पनाह देने के मामले में ब्रिटेन कुछ ज्यादा ही उदार है. बीएनपी के उपाध्यक्ष और खालिदा ज़िया के बेटे भी इस समय ब्रिटेन में शरण लिए हुए हैं. उम्मीद की जा रही है कि जब बीएनपी सत्ता में वापस आएगी तभी खालिदा के बेटे बांग्लादेश मेें वापस आएंगे.

परस्पर समझौते और प्रत्यर्पण संधि के बावजूद भारत भी अभी तक ब्रिटेेन से किसी भगोड़े को वापस नहीं ला पाया है.

दक्षिण एशिया के अपराधियों को पनाह देने के मामले में ब्रिटेन कुछ ज्यादा ही उदार है

जमात-ए-इस्लामी भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा इस्लामी संगठन है. जमात की बांग्लादेशी इकाई का पाकिस्तानी मूल इकाई से करीबी नाता रहा है. बांग्लादेश में भारत-विरोधी और पाकिस्तान-समर्थक गुटबंदी में जमात प्रमुख भूमिका निभाता रहा है.

जमात का मकसद बांग्लादेश को शरिया कानून से चलने वाला इस्लामी देश बनाना है. जहां इस्लामी न स्वीकार करने वाले दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यको को दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रहना होगा.


पाकिस्तान की प्रतिक्रिया


निज़ामी की फांसी के बाद पाकिस्तानी संसद ने एकमत से प्रस्ताव पारित करके खेद व्यक्त किया. पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने निज़ामी की फांसी पर नकारात्मक टिप्पणी की. पाकिस्तान में मौजूद बांग्लादेशी उच्चायुक्त को समन भी किया.

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पाकिस्तानी संसद में हुई बहस में कई सांसदों ने अपनी कम जानकारी का प्रदर्शन करते हुए कहा कि 1971 के मुक्तिसंग्राम के बाद बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान के बीच 195 पाकिस्तानी युद्ध अपराधी सैनिकों और अफसरों को माफी देने का समझौता हुआ था. इसलिए जमात के नेताओं को सजा देना सही नहीं. इन पाकिस्तानी सांसदों को नहीं मालूम के वो समझौता बांग्लादेशी नागरिकों के लिए नहीं था. 

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया पर टिप्पणी करते हुए प्रोफेसर मुंतसिर ममून ने कहा, "पाकिस्तान की प्रतिक्रिया से उसकी छोटी सोच का पता चलता है. वो हमेशा ही ऐसे जनसंहार को समर्थन देता रहा है."

तुर्की की प्रतिक्रिया


निज़ामी की फांसी पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया तो अनुमान के अनुरूप ही रही लेकिन तुर्की के रवैये ने कुछ लोगों को चौंका दिया. तुर्की ने बांग्लादेश में अपने राजदूत को वापस बुलकार उससे मंत्रणा किया.

तुर्की के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा कि निज़ामी को ऐसी सजा नहीं दी जानी चाहिए थी.

इससे साफ है कि एर्दोगान खुद को इस्लामी नेता के तौर पर पेश करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते. इस कदम से वो अपने पुराने सहयोगी पाकिस्तान को भी खुश करने में कामयाब रहे.

भारत की तटस्थता


भारत ने मुक्तिसंग्राम के दौरान हुए युद्ध अपराधों को मामले में तटस्थता बरती है. भारत इसे बांग्लादेश का आंतरिक मामला मानता है.

बांग्लादेश में आतंकवाद और उग्रवाद के उभार और सेकुलर एक्टिविस्टों और ब्लागरों की हत्या के मसले पर भारत के विदेश सचिव ने शेख हसीना सरकार को समर्थन देने का भरोसा दिलाया. 

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पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश मे इस्लामी चरमपंथ ने तेजी से सिर उठाया है. हाल ही में बांग्लादेश में हुई हत्याओं का जिम्मा आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ने लिया. बहुत संभव है कि इन हत्याओं में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने भी मदद की हो.

दूसरी तरफ खबर आ रही है कि भारत और अमेरिका इस्लामी चरमपंथ का मुकाबला करने के लिए बांग्लादेश को खुफिया मदद मुहैया कराएंगे.

ऐसा करना जरूरी भी है क्योंकि अगर बांग्लादेश में इस्लामी चरमपंथ जड़ जमाता है तो इसकी आंच से पूरा भारतीय उपमहाद्वीप अछूता न रहेगा.

First published: 14 May 2016, 19:02 IST
 
पिनाक रंजन चक्रवर्ती @catchnews

फ़ेलो, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली. भारत के पूर्व विदेश सचिव, बांग्लादेश के पूर्व भारतीय उच्चायुक्त और थाईलैंड में पूर्व भारतीय राजदूत रह चुके हैं.

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